पार्वतीजी का शिवजी से प्रश्नः करोड़ों करते हैं गंगास्नान, फिर स्वर्ग में क्यों नहीं मिलता सबको स्थान?
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सोमवती स्नान का पर्व था. गंगा घाट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लग रही थी. शिव-पार्वती विचरण को निकले थे. आकाश से गुजरते समय पार्वतीजी की नजर भीड़ की ओर गई.
पार्वतीजी ने इतनी ज्यादा भीड़ का कारण शिवजी से पूछा. शिवजी ने बताया- आज सोमवती पर्व है. आज गंगा स्नान करने वाले लोग स्वर्ग जाते है. उसी लाभ के लिए स्नानार्थियों की भीड़ जमा है.
पार्वतीजी का भीड़ को लेकर कौतूहल तो शान्त हो गया पर इस उत्तर से उनके मन में नया संदेह उपज पड़ा. यदि इतने सारे लोग जो स्नान की भीड़ में हैं ये स्वर्ग चले गए तो क्या होगा?
स्वर्ग में इतना स्थान कहां है? फिर लाखों वर्षों से लाखों लाख लोग इस तरह गंगास्नान करके स्वर्ग पहुंच रहे हैं तो वे हैं कहां. स्वर्ग में उन्हें कहां स्थान मिला है. मुझे तो नहीं दिखे इतने. पार्वतीजी के मन में द्वंद्व चलता रहा.
भगवती ने अपना नया सन्देह शिवजी से प्रकट किया और समाधान चाहा. भगवान शिव बोले- हे शिवे! शरीर को गीला करना एक बात है. स्वर्गप्राप्ति के लिए तो मन की मलिनता धोने वाला स्नान जरूरी है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जिनका इस स्नान से मन निर्मल होता है बस वही लोग स्वर्ग जाते हैं. इतने सारे कहां जाने वाले हैं? यह उत्तर सुनकर सुनकर पार्वतीजी के मन का सन्देह घटने की बजाय और बढ़ ही गया.
पार्वतीजी बोलीं – यह कैसे पता चले कि किसने शरीर धोया और किसने मन को पवित्र किया. शिवजी ने बताया कि यह उसके कर्मों से समझा जाता है. पर्वतीजी की शंका अब भी नहीं मिटी.
शिवजी ने इस उत्तर से भी समाधान न होते देखकर कहा- चलो मैं तुम्हें अब सारी बात एक प्रत्यक्ष उदाहरण के माध्यम से समझाने का प्रयत्न करता हूं. हमें एक स्वांग करना होगा.
शिवजी ने बहुत कुरूप कोढ़ी का रूप लिया और राह में एख स्थान पर लेट गए. पार्वतीजी को अत्यंत रूपवती स्त्री का शरीर धरने को कहा. पार्वतीजी कुरुप कोढ़ी बने शिवजी के साथ स्नान के लिए जाते मार्ग के किनारे बैठ गईं.
स्नानार्थियों की भीड़ उन्हें देखने के लिए रुकती. ऐसी अलौकिक सुंदरी के साथ ऐसा कुरूप कोढ़ी! कौतूहल में सभी इस बेमेल जोड़ी के बारे में पूछताछ करते. पार्वतीजी शिवजी द्वारा रटाया विवरण सुनाती रहतीं.
यह कोढ़ी मेरा पति है. गंगा स्नान की इच्छा से आए हैं. गरीबी के कारण इन्हें कंधे पर रखकर लाई हूँ. बहुत थक जाने के कारण थोड़े विराम के लिए हम लोग यहाँ बैठे हैं.
अधिकाँश दर्शकों की नीयत डिगती दिखती. वे सुन्दरी को प्रलोभन देते और पति को छोड़कर अपने साथ चलने की बात कहते. पार्वतीजी को क्रोध आता लेकिन शिवजी ने शांत रहने का वचन लिया था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वह यह सब बाते सुनकर सोच रही थीं कि भला ऐसे भी लोग गंगा स्नान को आते हैं? ये स्वर्ग जाने की कामना रखते हैं. उनके चेहरे की निराशा देखते बनती थी. संध्या हो चली.
तभी एक सज्जन आए. पार्वतीजी ने रटा-रटाया विवरण उन्हें भी सुना डाला तो उनकी आँखों में आँसू भर आए. उन्होंने सहायता का प्रस्ताव किया और कोढ़ी को कंधे पर लादकर गंगा तट तक पहुँचाया. जो सत्तू साथ लाए थे उसमें से उन दोनों को भी खिलाया.
साथ ही सुन्दरी को बार-बार नमन करते हुए कहा– आप जैसी देवियां ही इस धरती की स्तम्भ हैं. धन्य हैं आप जो इस प्रकार अपना धर्म निभा रही हैं. प्रयोजन पूरा हुआ. शिव-पार्वती उठे और कैलाश की ओर चल पड़े.
शिवजी ने रास्ते में कहा- पार्वती, इतनों में एक ही व्यक्ति ऐसा था जिसने अपना मन धोया और स्वर्ग के लिए सुगम रास्ता बनाया. गंगा स्नान का महात्म्य तो सही है पर उसके साथ मन भी धोने की शर्त लगी है.
पार्वती तो समझ गई कि आखिर क्यों इतनी संख्या में गंगा स्नान करने के बाद भी औऱ गंगा का निर्मल महात्म्य होने के बाद भी स्वर्ग नहीं पहुंच पा रहे. क्यों गंगास्नान के पुण्यफल से वंचित हो जाते हैं.
यह दंत कथा है. ये कथाएं शिक्षा देने के लिए भक्तों द्वारा बनाई जाती हैं. इनका अस्तित्व पुराणों में तलाशने से अच्छा है, इनमें स्पष्ट संदेशों को समझकर लोक-परलोक दोनों को सुधार लेना.
संकलनः देवकीनंदन गंगावत
संपादनः राजन प्रकाश
यह कथा रानीगंज पश्चिम बंगाल के देवकीनंदन गंगावतजी के माध्यम से प्राप्त हुई. देवकीनंदनजी धार्मिक-आध्यात्मिक कार्य व चर्चा में गहरी रूचि रखते हैं.
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