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मन चंगा तो कठौती में गंगा- भक्त संत रविदास

मन चंगा तो कठौती में गंगा- भक्त संत रविदास

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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। इस लाइऩ के नीचे फेसबुकपेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलती रहे.आज महान भक्त रविदासजी की जयंती है. संत रविदास जी को नमन. उनके जीवन का एक सुंदर प्रसंग है, आप आनंद लें.

रविदासजी का पारिवारिक कार्य था जूते गांठना. रविदास जी तो भक्त आदमी ठहरे. व्यवसाय कारोबार में क्या मन लगता.

किसी ने पैसे दिए तो ठीक न दिए तो भी ठीक. पिता को लगा कि इस तरह तो घर लुट जाएगा.

उन्होंने विवाह कर दिया ताकि रविदासजी पर जिम्मेदारी आए तो कुछ सामाजिक व्यावहारिता सीख लें.

पिता जी ने अपने से अलग कर दिया क्योंकि भक्त जी गरीबों और साधू संतों को जूते मूफ्त में बनाकर दे देते थे.

पिता ने रविदास जी को एक छत बनाकर दे दी और दुकान के लिए स्थान भी दे दिया. रविदास जी का काम अपने पिता से अलग हो गया परन्तु उन्होंने प्रभुनाम भजने में कोई ढील नहीं होने दी.

हरिद्वार में कुम्भ का मेला हुआ. कुंभ के लिए जाने वाले लोगों का काफिला उनकी दुकान के रास्ते से निकला. इसमें एक गरीब ब्राह्मण गंगाराम भी थे. उनका जूता टूटा तो भक्त रविदासजी पास बैठकर बनवा लिया.

गंगाराम ने एक दमड़ी कीमत दी तो रविदास जी ने वह दमड़ी यह कहकर लौटा दी कि यह हमारी तरफ से आप माता गंगाजी को भेंट कर देना.

किनारे पर खड़े होकर विनती करना. जब मां अपने हाथ निकाले तभी देना. ऐसे ही पानी में नहीं फेंक देना. मां जो कहें वह आकर वह मुझे बता देना.गंगाराम ने स्नान के बाद सोचा क्यों न रविदास की बात भी आजमा ली जाए. हालांकि उसे विश्वास नहीं था कि मांं स्वयं आएंगी.

भक्त जी की दमड़ी निकालकर विनती की- हे माता! तेरे भक्त रविदास जी ने एक दमड़ी भेजी है, अपने भक्त की भेंट को हाथ निकालकर स्वीकार करो.

पण्डित जी के साथ में आए हुए लोग यह सोच रहे थे कि आज तक अरबों संत साधू कुम्भ पर आए हैं पर गंगाजी का हाथ किसी ने नहीं देखा. भला वह उस जूते बनाने वाले की भेंट लेने के लिए अपने हाथ क्यों आगे करेगी.

पर तभी ऐसा अचंभा हुआ जिसकी किसी को आशा न थी. मां गंगा ने अपना सीधा हाथ जल से ऊपर किया और दमड़ी ले ली.

दमड़ी लेकर मां गंगा ने कहा- मेरे भक्त के लिए मेरी तरफ से कुछ भेंट ले जाओ. गँगा मां ने अपने बाएं हाथ से हीरों से जड़ा हुआ कंगन निकालकर पण्डितजी के हाथ पर रखा और कहा यह रविदास को दे देना.

गंगाराम इस हीरे के कंगन को देखकर अपना धर्मकर्म भूल गया और लोभ के कारण सोचने लगा कि मैं इसे रविदास को नहीं दूँगा. इसे किसी जौहरी को दिखाकर बेच दूंगा और सारी जिन्दगी ऐश से गुजारूंगा.

कुछ समय पण्डित बाजार में गया और कंगन जौहरी को दिखाया. जौहरी हैरान कि ऐसी अद्भुत चीज इस कंगले के पास कहाँ से!जौहरी सोचने लगा कि जरूर राजमहल में कथा करते समय रानी का कंगन चुराया होगा या फिर किसी दुराचरण रानी ने प्रेमवश आप ही कंगन दिया होगा.

चोरी के माल को लेना खतरे से खाली नहीं. उसने सिपाहियों को चुपके से खबर कर दी. नगर कोतवाल ने कंगन समेत चोर को पकड़ा लिया और चालान गाजीपुर की अदालत में राजा चन्द्रप्रताप के पास भेज दिया ताकि वह शाही माल पहचानकर फैसला करें.

राजा ने कंगन देखकर पण्डित से कहा- तुमने एक कंगन ही अभी निकाला. इसका दूसरा कंगन भी लाओ. जहां से चुराया है वहां का पता दो.

पण्डित ने कहा कि चोरी नहीं की है और कंगन कैसे मिला इसकी राजा को पूरी कथा सुना दी. पंडित ने कहा यह सब काशी के रविदास जी की महिमा है. दूसरा कँगन लाने की ताकत तो केवल रविदास जी में ही है.

राजा को बात मनगढ़ंता लगी और आगबबूला हो गया. उसने सोचा दोनों मिलकर चोरी और हेराफेरी करते हैं. थानेदार को हुक्म भेजा कि जल्दी से काशी में रहने वाले रविदास को लेकर आओ.

चोरी के माल का असली पता केवल उसी के पास है. अगर दूसरा कँगन भी ला दें तो मैं उनकी करामात समझूँगा वरना इन दोनों को ही फाँसी पर चढ़ा दूंगा.

कोतवाल ने श्रीरविदास जी को सारी बात बताई. रविदास जी अपना जूते बनाने वाला सामान लेकर पहुँचे और जुते बनाने बैठ गए और राजा को वहां आने के लिए कोतवाल को कह दिया. राजा रानी समेत रविदास जी के पास पहुंचा.रविदास जी बोले- कहो आपका क्या हुक्म है? आप क्या चाहते हो? राजा ने कहा- इस कंगन के साथ दूसरा कंगन मिलाओ तो ठीक है, नहीं तो चोरी का माल जानकर पड़ताल की जाएगी और सजा दी जाएगी.

रविदास जी राजा की धमकी सुनकर मुस्कराए और उन्होंने “राग मारू” में भजन गाना शुरू कर दिया. भजन के बाद रविदासजी ने जूती बनाने की शिला उठाई तो उसके नीचे से गंगा का प्रवाह चल निकला.

तब रविदास जी ने राजा से कहा- मन चंगा तो कठौती में गंगा. इस कंगन से पहचान कर दूसरा कंगन उठा लो. वहां कई कंगन तैरते दिखे. राजा उनके चरणों में गिर पड़ा और दूसरा कंगन गंगा से निकालकर दोनों कंगनों रविदास जी के चरणों में रख दिया.

रविदास जी ने कहा- राजन! यह पण्डित बड़ा निर्धन है, कंगन इसे दान कर दो क्योंकि दान देते समय यह देखना चाहिए कि दान लेने वाले को उसकी आवश्यकता है कि नहीं.

इस पण्डित को इसकी आवश्यकता है और यह उचित भी है, ताकि यह अपने परिवार के साथ सुख से जिन्दगी के दिन व्यतीत करे. राजा ने दोनों कंगन तुरन्त उस पण्डित को दान कर दिए.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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