May 3, 2026

बुद्धि ठीक न हो तो साक्षात ईश्वर और उनका वरदान भी कल्याण नहीं करा सकता

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तीन लोग एक मंदिर के सामने भिक्षा मांग रहे थे. उनमें दो अत्यंत वृद्ध थे जो अपने बल पर खड़े भी नहीं हो सकते थे.

तीसरा उनका पुत्र था जो स्वस्थ तो था लेकिन मां-बाप के साथ भिक्षा मांग रहा था. शायद पारिवारिक कार्य था तो साथ दे रहा था.

उस मंदिर में बसने वाले एक देवता की पत्नी पूरे परिवार को इस तरह की हालत में काफी दिनों से देख रही थीं. दैवयोग से एक दिन उन्हें उन तीनों भिक्षुकों की दशा पर बहुत दया आ गई.

उन्होंने अपने स्वामी से कहा- स्वामी मेरे मन में एक विचार बार-बार कौंध रहा है. जब जीवन का ज्यादातर समय मंदिर के समक्ष बैठने वाले इस परिवार का कल्याण नहीं हुआ तो कहीं ऐसा न हो कि लोगों की मंदिरों से आस्था मिटने लगे.

देवता ने हंसते हुए पूछा- ऐसी शंका क्यों आई आपके मन में.

देवी बोलीं- जो सदा मंदिर के द्वार पर हैं, मंदिर की पुण्य छाया के शरण में हैं उनका जीवन नहीं बदल रहा तो फिर कभी-कभार दर्शन कर लेने से क्या हो जाएगा, यदि ऐसा विचार भक्तों में मन में आने लगे तो! इसलिए आप इनका तत्काल कल्याण करिए.

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देवता ने कहा-देवी मंदिरों की आस्था और दर्शन के फल को लेकर आपका संदेह निर्मूल है. सच्चे भक्त निराश नहीं होते, यह उन्हें समय-समय पर पता चलता रहता है.

रही बात इन भिखारियों की तो इनका कल्याण नहीं हो सकता क्योंकि इनका मन मैला है. इनकी सोच छोटी है.

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