बुद्धि ठीक न हो तो साक्षात ईश्वर और उनका वरदान भी कल्याण नहीं करा सकता
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तीसरा उनका पुत्र था जो स्वस्थ तो था लेकिन मां-बाप के साथ भिक्षा मांग रहा था. शायद पारिवारिक कार्य था तो साथ दे रहा था.
उस मंदिर में बसने वाले एक देवता की पत्नी पूरे परिवार को इस तरह की हालत में काफी दिनों से देख रही थीं. दैवयोग से एक दिन उन्हें उन तीनों भिक्षुकों की दशा पर बहुत दया आ गई.
उन्होंने अपने स्वामी से कहा- स्वामी मेरे मन में एक विचार बार-बार कौंध रहा है. जब जीवन का ज्यादातर समय मंदिर के समक्ष बैठने वाले इस परिवार का कल्याण नहीं हुआ तो कहीं ऐसा न हो कि लोगों की मंदिरों से आस्था मिटने लगे.
देवता ने हंसते हुए पूछा- ऐसी शंका क्यों आई आपके मन में.
देवी बोलीं- जो सदा मंदिर के द्वार पर हैं, मंदिर की पुण्य छाया के शरण में हैं उनका जीवन नहीं बदल रहा तो फिर कभी-कभार दर्शन कर लेने से क्या हो जाएगा, यदि ऐसा विचार भक्तों में मन में आने लगे तो! इसलिए आप इनका तत्काल कल्याण करिए.
देवता ने कहा-देवी मंदिरों की आस्था और दर्शन के फल को लेकर आपका संदेह निर्मूल है. सच्चे भक्त निराश नहीं होते, यह उन्हें समय-समय पर पता चलता रहता है.
रही बात इन भिखारियों की तो इनका कल्याण नहीं हो सकता क्योंकि इनका मन मैला है. इनकी सोच छोटी है.परंतु देवी न मानीं. वह भिक्षुकों का कल्याण हर हाल में देखना ही चाहती थीं. उनकी जिद के आगे देवता विवश हो गए. पत्नी को साथ लिया और चले.
देवता भिक्षुकों के सामने प्रकट हुए और बोले- तुम बहुत समय से इस मंदिर के समक्ष बैठते हो. आज कोई ऐसा वरदान मांग लो जिससे तुम्हारे कष्ट दूर हो जाएं.
भिक्षुक परिवार प्रसन्न हो गया. सबसे पहले स्त्री बोल पड़ी- हे देव! आप प्रसन्न हैं तो मुझे 20 वर्ष की परम सुंदर नवयुवती बना दें जिसके बराबर के सौंदर्य का आसपास कोई न हो.
देवता ने तथास्तु कहा और वह देखते ही देखते परम सुंदर युवती बन गई. स्वयं को फटेहाल और पत्नी को रूपवती देखकर उसका पति जल-भुन गया.
वह चिढ़कर कोसने लगा- मुझे तेरे मन की आकांक्षाएं पहले ही पता थीं. तू मेरे अशक्त होने पर साथ छोड़ देगी. इसी कारण मैंने कोई धन सहेज कर नहीं रखा वरना तो उसे लेकर किसी के साथ भाग जाती.
देवी यह सब देखकर हैरान थीं. देवता को तो उनके मन की कुटिलता का प्रमाण देना था सो वह अभी वहां से गए नहीं थे.
देवता ने फिर कहा- तुम इसे कोसना बंद करो. मैं तुम्हें भी एक वरदान दे सकता हूं. बोलो क्या चाहिए.
वह पत्नी को देखकर क्रोध से तमतमा रहा था. उसने गुस्से में मांग लिया- मेरी पत्नी सुअरी बन जाए.
देवता ने उसकी इच्छा पूरी कर दी और वह परम रूपवती स्त्री से तुरंत सुअरी बन गई.यह सब देखकर अब उनका पुत्र छाती पीटकर रोने लगा.
देवता ने उससे कहा- विलाप बंद करो, चाहो तो तुम भी कोई वरदान मांग लो.
पुत्र ने मांगा- हे देव, मेरी माता को वापस पहले जैसी वृद्धा स्त्री बना दीजिए. देवता ने उसकी इ्च्छा पूरी कर दी.
तीनों फिर से पूर्व की अवस्था में आकर मंदिर के सामने भीख मांगने लगे.
देवता ने पत्नी से कहा- तीन वरदान में यह त्रिभुवन के सारे ऐश्वर्य सुख-साधन मांग सकते थे लेकिन इनकी बुद्धि इतनी बिगड़ चुकी है कि तीनों आपस में भी द्वेष रखते हैं. इस सोच का परिणाम आपने देख ही लिया.
कितनी सही बात है. संसार के ज्यादातर लोगों के दुख का कारण उनकी अपनी परेशानी नहीं है बल्कि औरों की तरक्की से द्वेष है. पहले तो वह स्वयं भी उसी होड़ में पड़कर तमाम छल प्रपंचों का सहारा लेते हैं.
यदि सफल नहीं हो पाते तो फिर इस प्रयास में जुट जाते हैं कि किसी प्रकार उस व्यक्ति को नीचा दिखाया जाए. दूरे के ह्रास में भी उन्हें अपनी तरक्की की सुख मिलने लगता है.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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