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मकर संक्रांति को पतंग उडाना क्यों शुभ है?

मकर संक्रांति को पतंग उडाना क्यों शुभ है?

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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।सूर्य के अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश के अवसर पर मनाया जाता है सकर संक्रांति का पावन पर्व. सूर्य और शनि में पिता-पुत्र होने के बाद भी संबंध अच्छे नहीं है. शनि सूर्य से सबसे ज्यादा दूरी बनाए रखते हैं परंतु सूर्यदेव अपनी चमक प्राप्त करने के पश्चात सबसे पहले पुत्र की राशि में मिलने जाते हैं.

मकर संक्रांति को पतंग उडाने की परंपरा क्यों है. पतंग इस बात का संकेत देती है कि पिता-पुत्र के संबंध यदि असहज हो रहे हैं तो आगे बढ़कर उसे सहजता की ओर ले जाना चाहिए.

पतंग को लोग ज्यादा से ज्यादा ऊंचा ले जाने का प्रयास करते हैं. यह प्रतीक है भगवान सू्र्य के सबसे दूरी पर बैठे अपने पुत्र के घर मिलने जाने और वहां एक माह व्यतीत करने का. भगवान श्रीराम ने भी पतंग उड़ाई था संक्रांति को.

रामचरितमानस में एक प्रसंग आता है जिससे संकेत मिलता है कि संभवतः भगवान श्रीराम ने अपने भाइयों और हनुमानजी के संग पतंग उड़ाई थी। इस संदर्भ में ‘बालकांड’ में एक छोटा सा उल्लेख मिलता है.

बालकांड का यह प्रसंग बड़ा ही रोचक है, उसी के आधार पर ऐसा आंकलन किया जाता है।

‘राम इक दिन चंग उड़ाई।
इंद्रलोक में पहुँची जाई॥’

प्रसंग कुछ इस प्रकार से है. भगवान सूर्य के उत्तरायण होने से देवताओं की शक्ति विशेष रूप से जागृत हुई है. भगवान इसका आनंद मनाना चाहते हैं. पंपापुर से हनुमानजी को विशेष रूप बुलवाया गया है. तब हनुमानजी बाल रूप में थे.

सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ‘मकर संक्रांति’ का पर्व कोशलपुरी में मनाया जा रहा है. श्रीराम भाइयों और मित्र मंडली के साथ पतंग उड़ाने लगे. वह पतंग उड़ते हुए देवलोक तक जा पहुँची.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उस पतंग पर इंद्र के पुत्र जयंत की पत्नी की दृष्टि गई. उन्हें उस पतंग ने बड़ा आकर्षित किया. वह उसे कौतूहल से देखने लगीं. इसी बीच उन्हें ध्यान आय़ा कि आखिर किसकी पतंग इतनी शक्तिशाली है जो देव लोक तक आ पहुंची है. उसे देखना चाहिए.

वह उस पतंग और पतंग उड़ाने वाले के प्रति सोचने लगती हैं. इसके लिए चौपाई आती है.

‘जासु चंग अस सुन्दरताई।
सो पुरुष जग में अधिकाई॥’

इस भाव के मन में आते ही जयंत की पत्नी ने पतंग को हाथ में पकड़ लिया और सोचने लगी कि पतंग उड़ाने वाला अपनी पतंग लेने के लिए अवश्य आएगा, तब उससे भेंट होगी. इसी सोच में वह प्रतीक्षा करने लगी.

उधर पतंग पकड़ लिए जाने के कारण भगवान को पतंग दिखाई नहीं दे रही. वह कुछ व्याकुल हुए. तब बालक श्रीराम ने बाल हनुमान को कहा कि आप तो उड़ने की शक्ति रखते हैं. आप जरा इसका पता लगाएं कि आखिर मेरी पतंग कहां रह गई.

पवनपुत्र हनुमान पतंग को खोजते आकाश में उड़ते हुए इंद्रलोक पहुँच गए, वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि एक स्त्री उस पतंग को अपने हाथ में पकड़े हुए है. उन्होंने उस पतंग की उससे माँग की.

उस स्त्री ने पूछा- “यह पतंग किसकी है?” हनुमानजी ने श्रीरामचंद्रजी का नाम बताया. इस पर उसने उनके दर्शन करने की अभिलाषा प्रकट की और कहा आप मेरा संदेश पहुंचाएं कि यदि दर्शन देंगे तो पतंग को मैं मुक्त कर सकती हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हनुमानजी यह सुनकर लौट आए और सारा वृत्तांत श्रीराम को कह सुनाया. श्रीराम ने यह सुनकर हनुमान को वापस वापस भेजा कि वे उन्हें चित्रकूट में अवश्य ही दर्शन देंगे.

हनुमानजी ने यह उत्तर जयंत की पत्नी को कह सुनाया, जिसे सुनकर जयंत की पत्नी ने पतंग छोड़ दी. कथन है कि-

‘तिन तब सुनत तुरंत ही, दीन्ही छोड़ पतंग।
खेंच लइ प्रभु बेग ही, खेलत बालक संग।’]

यह प्रसंग इस बात का संकेत देता है कि मकर संक्रांति के दिन पतंग उडाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है.

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