जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ- जीवन की निराशा से उबरने का बुद्ध का सुंदर उपदेश

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक बार एक नवयुवक गौतम बुद्ध के पास पहुंचा और बोला- महात्मा जी, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूं. कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं.
एक नौजवान को इतना हताश देखकर बुद्ध को चिंता हुई. उन्होंने उसके मन से निराशा का भाव निकालने के लिए उससे बात आरंभ की. बुद्ध ने उसके सामने एक गिलास पानी रखा.
फिर बुद्ध ने नमक के थैले की ओर इशारा करके कहा- वहां से एक मुट्ठी नमक निकालकर इस पानी के गिलास में डालो और फिर उसे पी जाओ. युवक ने आदेश का पालन किया.वह पानी तो पी गया लेकिन उसके चेहरे पर तरह-तरह के भाव दिख रहे थे. बुद्ध ने पूछा- इसका स्वाद कैसा लगा? उसने मुंह में बचा-खुचा पानी जमीन पर थूक दिया.
अजीब से मुंह बनाते हुए वह बोला- भगवन! यह तो बहुत ही खराब था. एकदम कड़वा. बुद्ध उसके चेहरे की ओर देखकर मुस्कराते रहे. फिर उठे और कहा- एक मुट्ठी नमक ले लो और मेरे पीछे-पीछे आओ.
बुद्ध तेजी से चलने लगे और युवक मुठ्ठी में मनक लिए उनके पीछे-पीछे चलता रहा. कुछ और चलकर दोनों एक स्वच्छ और मीठे पानी की झील के सामने पहुंचे तो बुद्ध ने रुकने का इशारा किया.बुद्ध ने उससे कहा कि वह अपने साथ लाए नमक को झील के पानी में मिला दे. आदेश पाकर उसने एक मुठ्ठी नमक झील में फेंक दिया. फिर बुद्ध ने अपने थैले में से एक लोटा निकाला.
लोटा देकर युवक से कहा- झील में से लोटा भर लाओ. वह लोटा भर लाया तो बुद्ध ने उस पानी को पीने का निर्देश दिया. युवक ने ऐसा ही किया. उस पानी को आनंदपूर्वक प्रेम से पी गया.
एक बार फिर बुद्ध ने पूछा- बताओ अब तुम्हें पानी का स्वाद कैसा लगा? एक मुट्ठी नमक पहले भी मिलाया था, एक मुठ्ठी नमक अब भी मिलाया. क्या अभी भी तुम्हें ये खारा लग रहा है?युवक ने उत्तर दिया- नहीं. यह पानी तो मीठा और बहुत स्वादिष्ट है. बुद्ध फिर पहले की ही तरह मुस्कुराने लगे. उन्होंने युवक को बैठने का इशारा किया फिर स्वयं भी पास में बैठ गए.
स्नेहपूर्वक बुद्ध बोले- जीवन के दुःख बिलकुल नमक जैसे हैं. जीवन में दुःख की मात्रा वही रहती है बस फर्क इस बात का होता है कि हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं. यह इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं.
इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद के मन को बड़ा कर लो, गिलास मत बने रहो, झील बन जाओ. तुम्हारे दुख और हताशा उस झील में घुल भी जाएंगे और स्वाद भी कड़वा न होगा.
यह कथा हमें बहरीन में रह रहे प्रवासी भारतीय आशुतोषजी के सौजन्य से प्राप्त हुई.
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