जानिए क्यों बारह वर्ष तक की आयु के बच्चे रहते है शनि के साढे साती से मुक्त

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त्रेतायुग में एक बार बहुत भयंकर अकाल पड़ा. अकाल इतना भीषण था कि कौशिक ऋषि जैसे तेजस्वी भी उसकी पीड़ा से नहीं बच सके.
कौशिक पत्नी-बच्चों समेत सुरक्षित स्थान की खोज में निकले. परिस्थिति ऐसी बन गई कि कौशिक को अपने एक पुत्र को बीच रास्ते में ही छोड़ना पड़ा.
अकेला रह जाने के कारण वह बालक बड़ा दुखी था. बालक को बहुत भूख लगी थी. उसने आसपास नजर दौड़ाई मगर कुछ भी न मिला.
उसे बस एक पीपल का पेड़ दिखा. पेड़ के नजदीक ही एक तालाब भी था जिसमें कुछ जल अभी बचा था
भूख से बेचैन उस बालक ने पीपल के पत्ते खाए. इसी तरह वह पीपल के पत्ते खाकर और तालाब का पानी पीकर अपने दिन काटने लगा.
एक दिन नारदजी की नजर उस पर पड़ी. वह दयालु हो गए. उस बालक के साहस से प्रभावित होकर उन्होंने उसे विष्णुमंत्र की दीक्षा दी और साधना करने को कहा.
बालक ने अपनी भक्ति से भगवान विष्णु को प्रसन्न कर लिया. उनसे योग एवं ज्ञान की शिक्षा लेकर महर्षि बन गया. पीपल के पत्ते खाकर जीवित रहने के कारण नारद ने उसका नाम पिप्पलाद रखा.
एक दिन महर्षि पिप्पलाद ने नारदजी से अपने बचपन के कष्टों का कारण पूछा. नारदजी ने बताया कि शनि के प्रकोप के कारण उन्हें दुख झेलना पड़ा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.नारदजी ने पिप्पलाद को बताया कि शनि मनमानी करते हैं. आत्म अभिमान में भरकर वह किसी का भी अहित कर देते हैं जिससे सभी देवता उनसे डरते हैं.
नारद की बात सुनकर पिप्पलाद को बड़ा गुस्सा आया. उन्होंने शनि को सबक सिखाने के लिए अपने तप से प्राप्त धर्मदंड को शनि पर चला दिया.
धर्मदंड शनि का पीछा करने लगा. भयभीत शनि देवताओं की सहायता मांगने पहुंचे लेकिन सभी ने सहायता करने में असमर्थता जताई.
शनिदेव शिवजी के पास पहुंचे और उनसे रक्षा की प्रार्थना की. महादेव शनि की प्रार्थना से पिघल गए. उन्होंने पिप्पलाद से कहा कि शनि को क्षमा कर दो.
महादेव ने पिप्पलाद को बताया कि उनके पिता की मृत्यु के लिए शनि उत्तरदायी नहीं है बल्कि उनकी आयु ही कम थी.
शनि को मैंने ही ग्रहों का दंडाधिकारी बनाया है और मनुष्य के कर्मों के मुताबिक उसके जीवनकाल में ही दंड देने का अधिकार दिया है.
पिप्पलाद ने कहा- यह धर्मदंड है, जिसपर लक्ष्य करके चलाया गया बिना उसे दंड दिए नहीं लौट सकता. शनि ने पिप्पलाद से इसका कोई सरल उपाय पूछा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पिप्पलाद ने कहा यदि शनि वचन दें कि वह 12 वर्ष तक की आयु के बच्चों को पीड़ित नहीं करेंगे तभी इस पर विचार हो सकता है.
शनि ने हामी भर दी. महादेव ने कहा- शनि दंड का आघात अपने पैर पर झेल लें. मैं प्रहार की शक्ति को कम कर देता हूं.
उसी दंड के प्रहार से शनिदेव का एक पैर घायल हो गया और वह लंगड़ाने लगे. उनकी गति मंद हो गई.
पिप्पलाद ने कहा- भगवान शिव के कारण शनि की रक्षा हुई है इसलिए जो भी पिप्पलेश्वर महादेव की पूजा करेगा शनि उस पर कुपित नहीं होंगे.
तब से शनिवार के दिन शनि ग्रह की शांति के लिए शनिदेव के साथ-साथ पीपल वृक्ष की पूजा का भी विधान बन गया.
कई स्थानों पर पिप्पलाद की जन्मकथा कथा में थोड़ा अंतर दिखता है. उसमें पिप्पलाद को दधीचि का पुत्र बताया गया है.
दधीचि ने इंद्र के वज्र के लिए अस्थियां दान कर दीं. उस समय उनकी एक पत्नी गभस्तिनी गर्भवती थीं.
पति संग सती होने के लिए गभस्तिनी ने अपना पेट चीरकर गर्भ निकाला और एक पीपल वृक्ष के नीचे रख दिया. वृक्षों ने ही उस बालक का पोषण किया और उसका नाम पिप्पलाद पड़ा.
संकलन व संपादन: राजन प्रकाश
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