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रघुनंदन का कटा शीश देख मूर्च्छित हो गईं जनकदुलारी: रावण के मायाजाल की कथा

रघुनंदन का कटा शीश देख मूर्च्छित हो गईं जनकदुलारी: रावण के मायाजाल की कथा

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श्रीराम-रावण का संग्राम आरंभ हो चुका था. श्रीराम सेना के आगे रावण की त्रिकालजयी असुर सेना टिक नहीं पा रही थी.

रावण इससे आश्चर्य में था कि जिस सेना के आगे इंद्र की देवताओं की सेना नहीं टिकती उसके सामने वानर-भालू कैसे डटे हैं. रावण ने अपने नाना सुमाली से इस विषय में विचार किया.

सुमाली ने बताया- सीता कोई सामान्य स्त्री नहीं. रामसेना को सीता के सतीत्व और विश्वास की अतिरिक्त योग शक्ति मिल रही है जिससे तुम पराजित होते हो.

रावण ने सीताजी का अटल विश्वास और सतीत्व तोड़ने की एक चाल चली. उसने मायावी विद्युजिह्व को बुलाकर माया से दो ऐसे सिर बनाने को कहा जो श्रीराम और लक्ष्मण ने हूबहू मिलते हों.

विद्युतजिह्व ने चतुराई से दो ऐसे सिर बनाए जो राम और लक्ष्मण के लगते थे. दोनों खून से लथपथ थे. ऐसा प्रतीत होता था उन्हें अभी-अभी काटकर लाया गया है.

उन दोनों मस्तकों को बाण की नोक पर रखकर रावण सीताजी के पास अशोक वाटिका में पहुंचा.

उसने सीताजी से कहा- तूने राम की शक्ति पर अगाध विश्वास करके मेरा कहना नहीं माना. देखो, राम-लक्ष्मण दोनों मारे गए. इन सिरों को देखकर अपने अभिमान पर आंसू बहाओ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रावण कहता रहा- वानरों के भरोसे मुझसे युद्ध करने आया था. रात्रि को जब वानर सेना सहित राम और लक्ष्मण दोनों सो रहे थे, तब सेनापति प्रहस्त ने विशाल सेना लेकर आक्रमण किया. और सोते हुए राम और लक्ष्मण के सिर काट लिए.

रावण ने बताया कि इस आक्रमण में सभई वानरवीरों के साथ विभीषण भी मारा गया. अब वहां श्रीराम औऱ लक्ष्मण के अंतिम संस्कार करने को भी कोई नहीं बचा.

रावण ने कहा- तुम्हारे लिए ऐसा भयंकर संहार करना पड़ा. अब तुम्हारा कोई आश्रय नहीं बचा इसलिए अब मुझे पति रूप में स्वीकार कर लो तो सहारा मिल जाएगा.

रावण ने दोनों मायारचित सिर सीताजी के सामने रख दिए और चला गया. सीताजी ने सब प्रकार से देखा. उनकी आकृति, मुद्रा आदि सब राम-लक्ष्मण जैसे थे.

एक तो रावण घोर मायावी, दूसरे सीताजी इतने दिनों तक उसकी कैद में फंसी थीं. विपत्ति काल ने देवी की मति भी हर ली. सीताजी बिलखने लगीं.

विलाप करती हुई कैकेयी को कोसने लगी कि पुत्र को सिंहासन दिलाने के स्वार्थ में रघुकुल का नाश कर दिया. विलाप करती हुई वह मूर्च्छित हो गईं.

जब चेतना लौटी तो फिर विलाप करने लगीं. वह कभी कैकेयी को तो कभी स्वयं को इसके लिए कोसतीं. कभी रावण का नाम लेकर चिल्लातीं कि मेरे शीश भी काट दे.

विलाप करते-करते मूर्च्छित हो जातीं. रावण यह सब देखकर बड़ा प्रसन्न हो रहा था. उसे अपनी चाल सफल होती दिखती थी.

जब सीताजी विलाप कर रही थी उसी समय किसी ने आकर रावण को सूचना दी कि प्रहस्त आवश्यक कार्य से अभी आपके दर्शन करना चाहते हैं.

यह सुनते ही रावण दोनों सिरों को लेकर वहां से चला गया. इस घटना की सूचना विभीषण की पत्नी को मिली. वह अशोक वाटिका में आईं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उन्होंने सीताजी की मूर्च्छा दूर की और समझाया- रावण ने तुमसे जो कहा, वह झूठ है. राम और लक्ष्मण जैसे परमवीरों को ये दुष्ट मार ही नहीं सकते.

रावण ने माया से दोनों सिर बनवाए हैं. आप इसके भ्रम में पड़कर यह भी भूल गईं कि लक्ष्मण दिन रात श्रीराम की सेवा में रहते हैं. वे रात को कभी नहीं सोते.

फिर सोते में उनके सिर कैसे काटे जा सकते हैं? ध्यान से सुनो. राक्षस सेना रण की तैयारी कर रही है. यदि राम-लक्ष्मण सेना समेत मारे गए तो फिर तैयारी किसलिए?

विभीषण की पत्नी के तर्कयुक्त वचन सुनकर सीताजी को भरोसा हुआ. अशोक वाटिका में सीताजी की प्रहरी त्रिजटा जो उनसे स्नेह रखती थी, उसने भी इस सहमति जताई तो सीताजी को राहत मिली.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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