क्या महादेव ने महाभारत युद्ध के अंत में दिया था पांडवों को पुनर्जन्म का शाप?
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हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे आपको प्रभु शरणम् के पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.महाभारत के युद्ध का यह अंतिम दिन था. द्वापर युग के अंत में कुरुक्षेत्र का महायुद्ध समाप्ति की ओर था. दुर्योधन मरणासन्न पड़ा था तो उसने अश्वत्थामा को कौरवसेना का सेनापति नियुक्त कर दिया.
अंतिम सांसे गिनते समय दुर्योधन ने अश्वत्थामा से वचन ले लिया था कि नीति से हो या अनीति से उसे पांडवों का शव देखना है. पांडवों का शव देखे बिना उसे मित्रऋण से मुक्ति न होगी.
अश्वत्थामा ने वचन दिया और बचे-खुने सेनानायकों के साथ घृणित योजना बनाने लगा.
भगवान् श्रीकृष्ण को ज्ञात था कि अंतिम दिन काल कुछ चक्र चलाएगा जरूर. इसके निवारण हेतु श्रीकृष्ण ने आदिदेव भगवान शिव की विशेष स्तुति आरंभ कर दी.
श्रीकृष्ण ने शिवजी की स्तुति करते हुए कहा- हे जगत के संरक्षक, सब भूतों के स्वामी, सभी प्रकार के पापों से मुक्ति दिलाने वाले रूद्र! मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ. भगवन! आपकी कृपा से ही पांडवों ने यह धर्मयुद्ध जीता है. आपने युद्धकाल में इनकी सब प्रकार से रक्षा की.
हे भोलेनाथ, ये पांडव मेरे आश्रय में हैं. आप मेरे भक्त पांडवों की हर प्रकार से रक्षा कीजिये.
भगवान श्रीकृष्ण जब स्वयं पुकारें और भोलेनाथ न सुनें, ऐसा कैसे संभव था! भगवान् शंकर नंदी पर सवार हो हाथ में त्रिशूल लिए पांडवों के शिविर की रक्षा के लिए आ गए.
उस समय महाराज युधिष्ठिर की आज्ञा से भगवान् श्रीकृष्ण हस्तिनापुर गये थे. अन्य पांडव सरस्वती के किनारे शिविर में थे.मध्यरात्रि में अश्वत्थामा, भोज (कृतवर्मा) और कृपाचार्य– ये तीनों पांडव शिविर के पास आए.
उन सभी ने भगवान् रूद्र को तैनात देखा तो ठिठके. आगे बढ़ने की हिम्मत ही न हुई. परंतु फिर उन सभी ने भगवान शिव की तरह-तरह से स्तुति आरंभ कर दी.
जल्दी ही प्रसन्न हो जाने वाले भगवान शिव प्रसन्न हो गए. अश्वत्थामा को उन्होंने वरदान मांगने को कहा.
अश्वत्थामा ने मांगा- प्रभु मुझे दो वरदान दीजिए. एक तो आपकी कृपा से मुझे एक ऐसा खड़ग मिले जिसके साधारण प्रहार से भी संसार का सबसे बड़ा महारथी भी दो भाग हो जाए.
दूसरा वरदान यह दीजिए कि मैं और मेरे साथी आज रात विजयी पांडवों के शिविर को अपनी इच्छानुसार निर्भय होकर देख सकें.
भगवान् शंकर ने अश्वत्थामा को एक विशेष तलवार प्रदान की और उन तीनों को ही पांड़वों के शिविर में प्रवेश करने की आज्ञा दे दी.
अश्वत्थामा ने महादेव द्वारा प्राप्त तलवार से धृष्टद्युमन और पांडवों के भ्रम में पांडव पुत्रों की हत्या कर दी.
फिर वह कृपाचार्य और कृतवर्मा के साथ वापस चला गया. शिविर में एकमात्र बचे पार्षद सूत ने इस जनसंहार की सूचना पांडवों को दी.
जब शिवजी स्वयं रक्षा कर रहे थे तो फिर कोई और ऐसा दुस्साहस कर ही नहीं सकता. भीम सहित सभी पांडवों के मन में आया कि यह कार्य तो शिवजी ने ही किया होगा.विजय का दंभ और पुत्रों के अंत का दुख, पांडव आपे से बाहर हो गए. क्रोध में वे मर्यादा भूल कर भगवान शंकर से युद्ध को तैयार हो गए.
युदध शरू हो गया. पांडवों द्वारा जो भी अस्त्र-शस्त्र चलाये गये वे शिवजी के शरीर में जा कर जाने कहां विलीन हो गये.
चूंकि पांडव श्रीकृष्ण की शरण में थे और महादेव हरिभक्तों की रक्षा को स्वयं तत्पर रहते हैं.
इसलिए शांत स्वरूप भगवान शिव ने कहा- तुम श्रीकृष्ण के उपासक हो, उनके शरणागत हो इसलिए मैंने तुम्हें आज क्षमा कर दिया अन्यथा सभी इसी समय वध के योग्य हो.
परंतु मुझ पर आक्रमण के इस अपराध के परिणाम भोगने से नहीं बचोगा. तुम्हें कलियुग में जन्म लेकर इसका दंड भोगना पड़ेगा.
ऐसा कहकर भगवान शंकर अदृश्य हो गए. दुखी पांडव पापमुक्ति की राह पूछने भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में आए.अपने सभी अस्त्र-शस्त्र गंवा चुके,निराश तथा दुःखी पांडवों ने श्रीकृष्ण के साथ एकाग्र मन से शंकरजी की स्तुति आरंभ कर दी. भगवान शिवजी का क्रोध शांत हो चुका था. प्रसन्न हो भगवान शंकर प्रकट हुए और उनसे वर मांगने को कहा.
पांडवों की ओर से भगवान् श्रीकृष्ण बोले– हे भगवन, पांडवों के जो शस्त्रास्त्र आपके शरीर में विलीन हो गए हैं, उन्हें वापस कर दीजिए. इन्हें आपने जो श्राप दे दिया है उससे भी मुक्त कर दीजिए.
आदिदेव भगवान शिवजी ने कहा– हे श्रीकृष्ण! उस समय मैं आपकी माया से मोहित था. उसी माया में पड़कर ही मैंने यह शाप दे दिया. मेरा वचन तो नहीं बदल सकता, पर मुक्ति का मार्ग बताता हूं.
पांडव तथा कौरव अपने अपने अंशों से कलियुग में जन्म लेकर अपने पापों का फल भोगकर अपने पापों और मेरे शापों से मुक्त हो जायेंगें. युधिष्ठिर वत्सराज का पुत्र बनकर पैदा होगा.
उसका नाम बलखानि (मलखान) रखा जाएगा. वह शिरीष नगर का राजा होगा. भीम वीरण के नाम से बनारस पर राज करेगा. अर्जुन के अंश से जो जन्म लेगा, उसका नाम होगा ब्रह्मानंद होगा. वह महान बुद्धिमान और मेरा भक्त होगा.
महाबलशाली नकुल का जन्म कान्यकुब्ज में रत्नभानु के पुत्र के रूप में होगा और नाम होगा लक्षण. सहदेव भीमसिंह का पुत्र देवसिंह होगा. धृतराष्ट्र के अंश से अजमेर में पृथ्वीराज जन्म लेगा.द्रोपदी पृथ्वीराज की कन्या के रूप में वेला नाम से प्रसिद्ध होगी. महादानी कर्ण तारक नाम से जन्मेगा. यह सब बातें सुनकर भगवान श्रीकृष्ण मुस्कराए.
श्रीकृष्ण ने कहा- मैं भी अवतार लेकर पांडवों की सहायता करूँगा. माया देवी द्वारा निर्मित महावती नाम की नगरी में देशराज के पुत्र-रूप में मेरा अंश उत्पन्न होगा.
मेरे इस कृष्णांश को जगत उदयसिंह (ऊदल) के नाम से जानेगा. उसे जो जन्म देंगी वह भी देवकी की ही अंश होंगी. मेरे वैकुण्ठ धाम का अंश आह्राद नाम से जन्म लेगा.
आह्लाद ही इस जन्म में मेरा गुरु होगा. अग्निवंश में उत्पन्न राजाओं का विनाश कर मैं धर्म की स्थापना करूँगा. श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर शिवजी अंतर्धान हो गए. (संदर्भ: भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व का तीसरा खंड के पहले अध्याय से व अन्य)
सभी प्रभु प्रेमियों को नमस्कार. मित्रों, हमने पहले भी कहा है कि वेद-पुराण-उपनिषद आदि ग्रंथ हमारे पूर्वजों की धरोहर हैं. मैं खुद को इतना सक्षम नहीं पाता हूं कि पूर्वजों के ज्ञान को चुनौती दे सकूं. आस्था और भक्ति तर्क से ऊपर की चीज है. प्रभु की लीला तो प्रभु ही जानें.
पिता, अपने पुत्र को बचपन में कोई ज्ञान देता है और पुत्र इसे स्वीकारने पहले यह नहीं पूछता कि पिताजी आप मेरी डीएनए रिपोर्ट दिखाइए. वह तो पिता-पुत्र के बीच स्नेह का बंधन है. ईश्वर से हमारा भी बंधन ऐसा ही हो.
हम पुराणों में जो गूढ़ बातें कही गई हैं, जो कथाएं हैं उन्हें आपके समक्ष रखते हैं. आप उन्हें किस रूप में लेते हैं यह आपके विवेक पर छोड़ता हूं. मैं तो इसे सादर भाव से स्वीकार करता हूं, इसलिए आपके समक्ष रखता हूं.
-राजन प्रकाश
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