क्या पिता की एक आज्ञा मानकर कभी पछताए थे भगवान श्रीराम?
पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे आपको प्रभु शरणम् के पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.जब लंका युद्ध में मेघनाद ने लक्ष्मणजी को शक्ति मार दी और लक्ष्मणजी अचेत पड़ गए तो भगवान श्रीराम भाई का कष्ट देखकर विलाप करने लगे. विलाप करते हुए वह अपने बचपन की एक घटना स्मरण करते हैं जब लक्ष्मणजी ने मेघनाथ को बंदी बना लिया था.
भगवान श्रीराम भावुक होकर विलाप करते हुए कहते हैं कि अगर उस दिन पिता के वचन न माना होता तो आज यह दशा न आती. प्रभु की वेदना का वर्णन करते हुए तुलसीदासजी ने एक चौपाई लिखी है-
जो जनतेउ वन बंधु बिछोहू।
पिता बचन मनतेउ नहिं ओहू॥
पिता के वचन की लाज रखने के लिए वनवास में चले आए भगवान श्रीराम पिताजी के किस वचन के मानने पर दुख प्रकट कर रहे हैं. इसकी एक कथा है, उसका आप आनंद लीजिए.
एक बार रावण को समुद्र किनारे शिव-आराधना के समय एक कमलपुष्प की पंखुडी कहीं से बहकर आती दिखाई दी. पंखुडी अद्वितीय सुन्दर थी. रावण ने ऐसा सुंदर कमलदल नहीं देखा था.
उसे देखकर विचार करने लगा कि पंखुडी जिस कमल पुष्प का हिस्सा है वह पुष्प कितना सुन्दर होगा? काश पूरा कमलपुष्प पा जाऊँ तो अपने आराध्य भगवान भोलनाथ को अर्पित करके उन्हें प्रसन्न करता.
रावण बस यही विचार करते हुए वहीं बैठा रहा. रावण पूजा के बाद समय से वापस नहीं आया तो मंदोदरी को चिंता हुई.पुत्र मेघनाद को पिता की खोज-खबर लेने हेतु भेजा. मेघनाद पिता को खोजने निकला तो उसे रावण एक स्थान पर जड़वत होकर बैठा दिख गया.
मेघनाद ने देखा कि पिताजी एकटक जल में लहराती एक पंखुडी निहार रहे हैं. उनका मन अविचल स्थिति में शांत तो है किंतु कुछ चिंतित भी है.
मेघनाद ने पिता से इस स्थिति का कारण पूछा. रावण ने कमल की पंखुड़ियां दिखाई और अपने मन की सारी अभिलाषा अपने प्रिय पुत्र को विस्तार से कह सुनाई.
मेघनात जितना बड़ा शूरवीर और पराक्रमी युवराज था उतना ही बड़ा पितृभक्त भी. उसने पिता की प्रसन्नता के लिए अनेक युद्ध किए थे और अपना सर्वस्व देने को तत्पर रहता था.
मेघनाद ने पिता को प्रसन्न करने के लिए कहा- पिताजी आप चिंता न करें. तीनों लोक में ऐसी कौन सी वस्तु है जो आपके लिए दुर्लभ हो. आपके आदेश पर स्वयं इंद्र यहां खड़ा होकर आदेशपाल बन जाए.
देवलोक के समस्त पुष्प आपके चरणों में समर्पित हो जाएं फिर तो ये जल में प्रवाहित होते कमल की पंखुड़ियां ही हैं. इनके लिए आपको विचलित होने की आवश्यकता ही नहीं.
मेघनाथ गर्व में चूर बोलता रहा- हे लंकापति जिनके चरणों में देवतागण आकर शीश नवाते हैं उन्हें कमलपुष्प के लिए उदास होने की क्या आवश्यकता. आप आदेश करें तो समस्त देवगण इसे तीनों लोकों में से खोजकर लाकर आपकी सेवा में उपस्थित कर देंगे.
परंतु आप ये कमलपुष्प अपने आराध्य भोलेनाथ को समर्पित करने के लिए चाहते हैं इसलिए किसी देवता को नहीं भेजकर मैं स्वयं इसे लाने जाउंगा. तीनों लोकों में जहां भी इस पंखुडी के पुष्प लगे होंगे, मैं वहां से अभी इसे खोजकर लिए आता हूं. आप भोलेनाथ को इसे अवश्य अर्पित करेंगे.रावण को प्रणाम कर मेघनाद मायावी छद्मभेष धारण कर तुरंत ही आकाश,पाताल समेत सभी लोकों का चक्कर लगा आया पर उसे वे कमलपुष्प कहीं नहीं मिले.
अंत में वह पृथ्वी पर उस कलमपुष्प को तलाशने लगा. खोजते-खोजते उसे सरयू की धारा में उसी प्रकार की कुछ पंखुडियां बहती दिखीं.
उन पंखुडियों के उद्गम स्थान को खोजता-खोजता मेघनाद राजा दशरथ के अयोध्या स्थिति उपवन के एक सरोवर में पहुंच गया.
राजमहल का वह सरोवर ऐसे अद्भुत,अद्वितीय कमल-पुष्पों से भरा पड़ा था. मेघनाद की खोज पूरी हुई थी. इसलिए उन कमल पुष्पों को देखकर मेघनाद की प्रसन्नता की सीमा न रही.
बिना विलंब किए उसने पुष्प तोडना शुरू कर दिया. उपवन के रखवाले वहां से गुजरे.
अचानक किसी अजनबी को महाराज दशरथ के बगीचे में से पुष्प तोड़ते देखकर रखवालों ने पास ही खेल रहे श्रीराम-लखन आदि को खबर कर दी. वे तुरंत आए और मेघनाद को ललकारा.
मेघनाद ने उन्हें बालक समझकर उनका उपहास कर दिया और चेतावनी देने पर भी नहीं माना. मेघनाद जिन्हें बालक समझ रखा था वे साधारण मानव तो थे नहीं.
लखन लला ने मेघनाद को पकड़कर बांध लिया. क्रोधित मेघनाद बंदी बन जाने के बाद अपशब्द कहने लगा इससे लक्ष्मणजी के क्रोध की सीमा पार हो गई. वह उसका वध करने को उतारू हो गए और अपने तुणीर में से बाण निकालने लगे.
लक्ष्मणजी जब मेघनाद को वहीं मार देने पर उतारू हो गए तो श्रीरामजी ने उन्हें शांत कराया.
श्रीराम ने कहा- अनुज लक्ष्मण दंड निर्धारण का अधिकार राजा का होता है. इसलिए इसे पिताजी महाराज के पास लिए चलते हैं. वह जो दंड निर्धारित करेंगे वह दंड दिया जाएगा.मेघनाद को बांधकर वे महाराज दशरथ के पास ले गए. दशरथजी ने मेघनाद से परिचय पूछा फिर कमलपुष्प की चोरी का पूरा वृतांत व कारण जाना.
महाराजा दशरथ बोले- निःसंदेह इसने बिना अनुमति वाटिका में प्रवेशकर अपराध किया है परंतु यह पितृभक्ति के भाव में था इसलिए इससे यह घृष्टता हो गई और अनुमति लेना भूल गया.
यह भगवान शिव को अर्पित करने के लिए पुष्प की याचना करने आता तो हम इसे सम्मान के साथ सहर्ष प्रदान करते, फिर भी यह अपने पिता को दुखी देकखर व्याकुल था. पिता की सेवा में निकले इसके प्राण मत लो. इसे पुष्प देकर छोड दो.
लक्ष्मणजी ने मेघनाद को बंधन मुक्त कर दिया और उसे उपवन में से कमलपुष्प भी दिए.
जब मेघनाद ने लंकायुद्ध में लक्ष्मणजी पर शक्ति का प्रहारकर विकट स्थिति पैदा कर दी, तब श्रीरामजी भाई के शोक में विलाप करते हुए स्मरण करने लगे.
दुखी हृदय से पिताजी की आज्ञा का स्मरण करते हुए श्रीराम ने कहा कि यदि मैं जानता कि यह मेघनाद मेरे भाई लखन के प्राणों के संकट का कारण बनेगा तो मैं उस समय पिताजी के वचन न मानता और लक्ष्मण को इसके प्राण लेने देता.
रामायण और रामचरितमानस में ऐसी छोटी-छोटी परंतु सुंदर ज्ञानवर्धक कथाओं का अद्भुत संसार है. हम प्रभु शरणम् ए्प्पस में ऐसी कथाएं नियमित रूप से प्रकाशित करते रहते हैं.
आपको यदि यह कथा पसंद आई तो ऐसी कथाओं के संसार से जुड़ने के लिए प्रभु शरणम् एप्पस डाउनलोड कर लें. एप्पस का लिंक नीचे है.
प्रभु शरणम् की सारी कहानियां Android व iOS मोबाइल एप्प पे पब्लिश होती है। इनस्टॉल करने के लिए लिंक को क्लिक करें:
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
ये भी पढ़ें-
रावण के पक्ष से युद्ध करने आ गईं जगदंबाः श्रीराम का संकट
