किसी भी काम में मन नहीं लगता, ध्यान भटकता है? जानें आध्यात्मिक निदान.
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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.हम किसी कार्य में एकाग्र नहीं हो पाते, पूजा-पाठ में मन उचटता है. मन बड़ा इधर-उधर भटकता रहता है, इसे कैसे ठीक करें. ऐसे प्रश्न आए तो मैंने कुछ दिनों पहले कहा- मौन की साधना करो. तुरंत लाभ होगा. उस तर्क को पुष्ट करने के लिए एक पोस्ट दिया एक सुंदर कथा भी सुनाई.
पोस्ट पर कई प्रश्न आए. जैसे, यदि हम मौन रखने लगें तो लोग हमें कमजोर समझने लगते हैं. वे हम पर हावी होने का प्रयास करते हैं इसलिए मौन धारण हो नहीं पा रहा.
कुछ ने तो उसे उल्टे तरीके से लिया- पता नहीं ऊपरवाले ने कितनी जिंदगी दी है उसे मौन रखकर व्यर्थ क्यों करना, खूब बातें करो. बातों से ही तो बनती है बात. बात तो सही है लेकिन जिंदगी हमेशा किसी मोबाइल कंपनी का विज्ञापन भी नहीं है.
मौन के संदेश को सही तरीके से नहीं समझा गया. भीष्म पितामह के जीवन की सबसे बड़ी भूल थी कि उन्होंने तब मौन धारण कर लिया था जब उन्हें सबसे ऊंचे स्वर में बोलना था. वह अवसर था- द्रौपदी चीरहरण.
यानी जब नितांत जरूरी हो तो अवश्य ही बोलना चाहिए पर हठपूर्वक हमेशा नहीं बोलना चाहिए. ज्ञानी और गुणी व्यक्ति का आभूषण है-मौन.
पावस देखि रहीम मन, कोइल साथै मौन
अब दादुर बकता भए, हमको पूछत कौन
कवि रहीम कहते हैं कि जब वर्षा ऋतु आती है तब कोयल मौन धारण कर लेती है, यह सोचकर कि अब तो मेंढक टर्राने लगे हैं तो उनकी कौन सुनेगा? कोयल को गुणवान पक्षी माना गया है.ज्ञानीजन वहां बोलते ही नहीं जहां उनकी बात की बात की कद्र नहीं होती. अज्ञानी हर जगह बोलते हैं.
वाणी ब्रह्म है. उसके द्वारा जो शक्ति फिजूल की खर्च हो रही है, मैं उसे बचाने को कह रहा हूं. जहां पर बोलना आवश्यक है वहां तो बोलना ही है, भीष्म जैसी चुप्पी नहीं लगानी है पर उसमें एक शर्त है कि बोलने से पहले दो मिनट का मौन लेना है.
उस मौन अवधि में अपने दिमाग को कैलुकेलेशन के लिए छोड़ना है कि क्या बोलें और क्या नहीं? उसे निर्णय करने दीजिए. आपके मन और मस्तिष्क दोनों को कुछ समय आराम की आवश्यकता होती है ताकि वह उन शक्तियों को महसूस कर सके, उनमें झांकने की कोशिश करे.
मन की चंचलता बेकाबू होगी तो आपका ध्यान भंग होगा. जो लोग बहुत ज्यादा बोलते हैं, व्यर्थ ही सोचते रहते हैं वह एकाग्रता के लिए तरसते हैं. फिर कहेंगे कि पूजा-पाठ में ध्यान नहीं लगता. मन भटकने लगता है.
मस्तिष्क को अपनी कार के इंजन की तरह समझिए. उसे लगातार ऑन रखेंगे तो गर्म होगा. ज्यादा गर्म होगा तो फिर उसकी ट्यूनिंग खराब होगी और बात-बेबात दिमाग खराब होने लगा तो क्या होगा, बताने की जरूरत ही नहीं.
अपनी प्राणशक्ति को व्यर्थ का खर्च होने से बचा लेना ही साधना है. जहां जरूरत नहीं वहां गूंगे-बहरे हो जाएं. इसे आजमा कर देखिए. मन को बड़ी शांति मिलेगी. कानों का बंद होना जीवन में बहुत सुकून दे जाता है.
आपको एक बड़ी सुंदर कथा सुना रहा हूं. उसे पढ़ने के बाद आप मौन की महिमा को बेहतर समझने लगेंगे.एक बार एक मछलीमार अपना कांटा डाले तालाब के किनारे बैठा था. तालाब में मछलियां बहुत थीं इसलिए उसे उम्मीद थी कि आज बहुत सारी मछलियां पकडकर ले जाएगा.
लेकिन उसे कांटा डाले काफी समय बीत गया और कोई मछली उसके कांटे में नहीं फंसी.
उसने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मैंने काँटा गलत जगह डाला हो. तालाब के इस किनारे मछलियां आती ही न हों.
कांटा निकालकर कहीं और जाने से पहले उसने एक बार तालाब में झांककर ही देख लिया तो उसे अपने कांटे के आसपास ही घूमती-तैरती बहुत-सी मछलियां दिखीं.
उसे बहुत आश्चर्य हुआ कि इतनी सारी मछलियाँ यहां हैं फिर भी कोई मछली अब तक फंसी क्यों नहीं जबकि कांटे में चारा भी अच्छा लगाया है मैंने. इसका क्या कारण हो सकता है?
वह यही सब सोचकर परेशान हो रहा था कि वहां से गुजरता एक व्यक्ति उसे देखकर पास आ गया.
उस राहगीर ने कहा- लगता है भैया यहां पर मछली मारने बहुत दिनों बाद आए हो. इस तालाब की मछलियां अब कांटे में नहीं फंसतीं.
मछलीमार ने हैरत से पूछा- इस तालाब की मछलियां अब कांटे में नहीं फंसतीं! क्यों, ऐसा क्या हो गया है अब यहां?
राहगीर बोला- पिछले दिनों एक बहुत बड़े संत का यहां आगमन हुआ. उन्होंने इसी तालाब के किनारे डेरा जमाया था. महात्माजी ने यहां “मौन के महत्व’ पर प्रवचन दिया था.
उनकी वाणी में ऐसा तेज़ था कि उनका प्रवचन सारी मछलियां भी बड़े ध्यान से सुनतीं थीं. यह उनके प्रवचनों का ही असर है कि उस दिन के बाद जब भी कोई इन मछलियों को फंसाने के लिए कांटा डालकर बैठता है, ये “मौन’ धारण कर लेती हैं.
जब मछली अपना मुंह खोलेगी ही नहीं तो तुम्हारे काँटे में फँसेगी कैसे?इसलिए बेहतर यहीं है कि आप किसी और तालाब में जाकर अपना कांटा डालें, यहां की मछलियां तो लालच को मौन से जीत लेती हैं.
उसकी बात मछलीमार की समझ में आ गई और वह वहां से चला गया.
कितनी सही बात कही महात्माजी ने कि जब मुँह खोलोगे ही नहीं तो फंसोगे कैसे? कौआ घोसला नहीं बनाता. पारिवारिक मिजाज और जिम्मेदारियों में फंसने वाला जीव नहीं है. मादा कौआ कोयल के घोसले में अपने अंडे रख जाती है.
कौए और कोयल के बच्चे साथ-साथ पलते रहते हैं. कौआ उस घोंसले में तबतक मजे से रहता है जब तक वह अपना मौन बनाए रखता है. जिस दिन मुंह खोलता है उसी दिन उसकी असलियत सामने आती है और भगा दिया जाता है.
एक भी शब्द व्यर्थ करने से बचना चाहिए. यही बात मछलियों की तरह उन व्यक्तियों को भी समझ लेनी चाहिए जो अपनी बकबक करने की आदत के चलते स्थान और समय का ध्यान रखे बिना अपना मुंह खोलकर मुसीबत में फंस जाते हैं.
गलाकाट प्रतियोगिता के इस युग में मौन का महत्व उस समय और बढ़ जाता है जब न जाने कौन अपना कांटा डाले आपको फंसाने के चक्कर में हो. जैसे ही आपने मुंह खोला आप फंसे.
ऐसी स्थितियों से बचने के लिए हम मौन का अभ्यास करें. धीरे-धीरे अभ्यास से हम सीख भी जायेंगे. बहुत बार ऐसा होता है कि आप किसी बात पर चुप हो गए तो आपके किसी प्रियजन ने ताने दे दिए कि समय पर तो बात नहीं निकली मुंह से जबाव देते नहीं बना.
आप ऐसे प्राणियों से थोड़ी दूरी बनाकर ही रखें. यह बात कहकर वे मछलीमार की तरह आपके आगे चारे से लिपटा कांटा डाल रहे हैं. उस समय मछलियों वाली बात दिमाग में सोचने लगिएगा. कई परेशानियों से मुक्ति मिल जाएगी.
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-राजन प्रकाश
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