किस प्रकार के लोगों पर होती है ईश्वर की कृपा?
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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.एक महात्माजी भक्ति कथाएं सुनाते थे. उनका अंदाज बड़ा सुंदर था औऱ वाणी में ओज था इसलिए उनका प्रवचन सुनने वालों की बड़ी भीड़ होती. महात्माजी की ख्याति दूर-दूर तक हो गई.
एक सेठजी के कानों तक भी उनकी ख्याति पहुंची. सेठ नगर के बड़े रईस थे.
दान-धर्म-सत्संग प्रवचन आदि में गहरी रूचि रखते थे इसलिए उन्होंने सोचा कि जरा इन महात्माजी के प्रवचन भी सुनकर देखें जाएं.
सेठ ने सत्संग-प्रवचन में जाने का निश्चय किया लेकिन दैवयोग से उनके मन में एक विचार आया. उन्होंने सोचा कि आजकल बहुत सारे लोग संत का चोला तो ओठ लेते हैं लेकिन मन से सांसारिक ही रह जाते हैं.
संतई तो दिखावे की होती है, सारी कुटिलता वैसे ही रह जाती है जस की तस. मोह-माया उनसे छूटती नहीं. कहीं ये भी उसी श्रेणी के न हों! इनको तो परखना होगा.
सेठ ने अपने अच्छे कपड़े उतारे मैले-कुचैले कपड़े पहनकर ऐसे दिखने लगे जैसे कोई मेहनतकश मजदूर हो, काम से छूटकर सीधा सत्संग में आ गया हो.
इसी वेश-भूषा में सेठजी प्रतिदिन प्रवचन में आकर एक कोने में बैठ जाते और चुपचाप प्रवचन सुनते. प्रवचन से वह आनंदित हो रहे थे.
एक व्पक्तिजो सत्संग में नियमित रूप से आया करता था, वह कई दिनों के बाद अचानक आया.
महात्माजी की नजर उसपर पड़ी तो उन्होंने पूछा- तुम पहले तो नियमित आया करते थे. आज काफी दिनों बाद दिखे हो, कहां रहे इतने दिन? सब कुशल-मंगल तो है?उस व्यक्ति ने बताया- महाराज जी पता नहीं क्या हुआ कैसे हुआ पर मेरा घर जलकर राख हो गया. बाल-बच्चे सब एक स्कूल के अहाते में रह रहे हैं. स्कूल वालों ने भी कह दिया है कि सप्ताह-दस दिनों में इंतजाम कर लो. इस कारण ही परेशान चल रहा हूं और नहीं आ सका.
महात्माजी ने सबसे कहा- ईश्वर ने यह कोप किया. इस माध्यम से वह सभी भक्तवृंद की परीक्षा भी लेना चाहते है कि क्या आप अपने साथी की सहायता करेंगे. वह आपकी परीक्षा ले रहे हैं इसलिए जिससे जो बन पड़े, इस भगत की सहायता करें.
वहां एक चादर घुमाई गई. सबने अपने-अपने सामर्थ्य से कुछ न कुछ पैसे डाले.
चादर घूमती-घूमती मजदूर के वेष में बैठे सेठ के पास भी आई. सेठ ने दस हजार रूपए डाल दिए. सबकी आंखें फटी रह गईं.
उस व्यक्ति से तो किसी को एक रुपए के दान की भी उम्मीद ही नहीं थी. सब उसे कंगाल और नीच पुरुष समझते थे जो अपनी हैसियत अनुसार पीछे बैठता है.
सबने उसकी दानशीलता की बड़ी प्रशंसा की. उसके बारे में अब सब जान चुके थे.
अगले दिन सेठ फिर से उसी तरह मैले कपड़ों में आए और स्वभाव अनुसार पीछे बैठ गए.
सब उनके आते ही स्वागत को खड़े हो गए और उसे आगे बैठने के लिए स्थान देकर प्रार्थना की पर सेठ ने मना कर दिया.
फिर महात्माजी स्वयं बोल उठे- सेठजी आप यहां आएं, मेरे पास बैठिए. आपका स्थान पीछे नहीं है.
सेठजी को महात्माजी की बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ. उन्हें महात्माजी से तो ऐसी आशा न थी.सेठ ने उत्तर दिया- सच में संसार में धन की ही पूजा है. अब मेरा यह विश्वास पक्का हो गया है. धन ही संसार को चला रहा है.
महात्माजी ने कहा- ऐसा आपने क्यों कहा अचानक, कोई खास कारण?
सेठ ने कहना शुरू किया- महात्माजी आप तो संतई में हैं. मोह-माया के बंधनों में आपको भी इतना लिपटे देखकर आश्चर्य हुआ. आम लोगों की भावनाएं तो भौतिकता से जुड़ी होंगी लेकिन आप तो संत है. मैले कपड़े वाले को अपने पास बिठाने की आपको तभी सूझी जब मेरे धनी होने का पता चला.
माया को माया मिले, कर-कर लंबे हाथ।
तुलसीदास गरीब की, कोई न पूछे बात।।
महात्माजी आप माया के प्रभाव में मुझे अपना रहे हैं. क्या यह सत्य है या आपके द्वारा प्रदर्शित प्रेम का कोई और कारण है?
महात्माजी अपने स्वभाव अनुसार मुस्कुराए और फिर बोले- सेठजी आपको समझने में फेर हुआ है. मैं यह सम्मान आपके धन के प्रभाव में नहीं दे रहा. मेरा यह सम्मान तो जरूरतमंदों के प्रति आपके त्याग के भाव को है.
धन तो संसार में अनेकों लोगों के पास और बेहिसाब है पर उनके जेब से किसी के परोपकार के लिए स्वेच्छा से दमड़ी तक नहीं निकलती.
आपके अंदर में दान के भाव के रूप में स्वयं साक्षात लक्ष्मीपति निवास कर रहे हैं. मेरा यह सम्मान उस भाव को है. जब मैंने चादर घुमवाई तो इस प्रांगण में बहुत से और ऐसे लोग भी थे जो आपके जितना तो नहीं पर वे भी काफी समर्थवान हैं.
परंतु जब किसी दुखियारे की सहायता की बात आई तो उन्होंने मन मसोसकर चंद रूपए इस कारण डाल दिए कि अगल-बगल वाले डाल रहे हैं इसलिए डालना ही होगा या फिर महात्माजी ने कहा है इसलिए भी डालना होगा.
आपके अंदर वह भाव स्वयं से उपजा.
आप यदि इसमें दो रूपए भी डालते तो लोगों को इससे ज्यादा की आशा न होती पर आपने जो दान किया वह अपना प्रभुत्व दिखाने के लिए नहीं बल्कि सचमुच आपमें किसी दुखियारे के प्रति सुंदर भाव आया. उस भाव को सम्मान न करूं तो अच्छाई संसार से लुप्त हो जाएगी.जो स्वभाव से सज्जन हो, दूसरों के दुख से दुखी होता हो, दूसरे के सुख से आनंदित होता हो, सदा सबके प्रति सम्मान और करूणा का भाव रखता हो, जो सुख और दुख में एकभाव रहता हो- न सुख में बहुत इठलाता हो और न दुख में बहुत घबराता हो उसे देवतुल्य माना जाता है.
शास्त्रों के अनुसार वास्तव में वही संत कहे जाने के योग्य है- भले ही वह गृहस्थ ही हो. उस व्यक्ति पर ही ईश्वर की विशेष कृपा होती है. इस कृपा को प्राप्त करने के लिए जो वैचारिक तप है वही वास्तविक तपस्या है.
महात्माजी ने कितनी बड़ी बात कही. उनकी बात से दो उपदेश हैं, दोनों हमारे काम के.
पहली बात तो जल्दबाजी में किसी के प्रति राय नहीं बना लेनी चाहिए. जैसे सेठ ने महात्माजी के बारे में सोच लिया कि वह धन के प्रभाव में उसे सम्मान दे रहे हैं.
दूसरा, लोगों को जहां भी मौका मिलता है अपनी शेखी बघारने लगते हैं. न जाने कितने पैसे सिगरेट, शराब और अनाप-शनाप चीजों में फूंक देंगे लेकिन जहां किसी और के लिए सोचने की बात आएगी, उनकी आत्मा कांप जाएगी.
किसी सद्कार्य के लिए भी तब ही पैसे निकालेंगे जब उसके साथ नाम-प्रतिष्ठा मिले. अगर ऐसा न होता तो धर्मशालाओं में लगे बल्ब और ट्यूबलाइट पर लोग अपने खानदान का नाम क्यों लिखाते?
ईश्वर धन तो प्रदान कर ही देते हैं, लेकिन सबको उसके सही प्रयोग का अवसर प्रदान नहीं करते. किसी पुण्यकार्य में योगदान करने का अवसर मिले तो उसे सौभाग्य ही समझना चाहिए.
श्रीहरि ही यज्ञ अवतार हैं. दूसरों के लिए किया गया त्याग ही यज्ञ है. इससे ही लक्ष्मीपति श्रीहरि प्रसन्न होते हैं.
त्याग और अपरिचितों के प्रति दया का भाव मनुष्य को विचारों से संत बना देता है. परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं इसलिए इसके धारण करने वाला मान-प्रतिष्ठा से युक्त यशस्वी और संततुल्य आदरणीय हो जाता है.
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-राजन प्रकाश
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