गणेश जी को हाथी का सिर क्यों लगाया गया: कौन था गजासुर जिसने दिया था अपना शीश
गणेश जी को हाथी का सिर क्यों लगाया गया
गणपति का मस्तक कट गया था. यह कथा तो सब जानते हैं. लेकिन मस्तक लगना ही था तो गणेश जी को हाथी का सिर क्यों लगाया गया? जो मस्तक उनका कटा था उसे भी तो जोड़ा जा सकता था.
किसी अन्य जीव का भी जोड़ा जो सकता था जो बहुत सुंदर हो तो फिर गणेश जी को हाथी का सिर क्यों लगाया गया? मुख हाथी जैसा क्यों बना?
असली सिर का क्या हुआ? भगवान गणेश जी का असली मस्तक कहाँ गया?
गणेश जी के मस्तक को लेकर जो प्रश्न किसी भी भक्त के मन में उतरते हैं, उनके उत्तर गणेश पुराण और मुद्गल पुराण में आते हैं. वैसे आपको मैं पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि गणेश जी की सारी लीलाएं, सारी कथाएं, उनके अवतारों की कथाएं, मंत्र आदि मुख्य रूप से दो पुराणों में आते हैं- गणेश पुराण और मुद्गल पुराण।
गणेश जी को हाथी का सिर क्यों लगाया गया इसकी एक रोचक कथा आती है दोनों पुराणों में. आज आपके लिए वह कथा लेकर आया हूँ. हाथी का सिर लगाने के पीछे क्या प्रतीक है, क्या छुपा हुआ रहस्य है इस पर भी बात करेंगे.
और हां, एक और महत्वपूर्ण बात- हाथी का सिर लगाए जाने के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है. भगवद कथाओं को यदि सिर्फ कथाओं की तरह जानेंगे तो फिर पंचतंत्र की कहानियां हो जाएंगी. पंचतंत्र की कहानियों और वेद व्यास जी द्वारा रचित पुराण की कहानियों में कुछ अंतर तो होगा.
वेद व्यास जी जैसे विद्वान जिन्हें भगवान का ज्ञानावतार कहा जाता है वे चुटकुले सुनाने या मनोरंजन के लिए कहानियां क्यों लिखने लगे भला! यह तो हमारा दोष के ही हमने उन्हें गहराई से समझने की कोशिश ही नहीं की.
इस पोस्ट में हाथी का सिर लगाने के पीछे का रहस्य भी बताउंगा ताकि कल को कोई आपके सामने यह बात छेड़कर उपहास की कोशिश करे तो आप उसे सही उत्तर दे पाएं. पहले पौराणिक प्रसंग जान लेते हैं. फिर कथा के पीछे का मर्म जानेंगे.

कौन था गजासुर जिसका मस्तक काटकर गणेश जी को लगाया गया
गज और असुर के संयोग से एक असुर का जन्मा था-गजासुर. उसका मुख गज यानी हाथी जैसा था. इसलिए उसे गजासुर कहा जाने लगा. गजासुर शिव जी का बड़ा भक्त था और शिवजी के बिना अपनी कल्पना ही नहीं करता था. उसने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के जतन किए. एकदिन भोले भंडारी उसकी भक्ति से प्रसन्न भी हो गए.
महादेव ने गजासुर को दर्शन दिए और एक वरदान मांगने को कहा. वास्तव में गजासुर बहुत भोला था. शिव से उसने वरदान में विचित्र सी चीज मांगी.
गजासुर ने कहा- प्रभु जब मैं आपकी आराधना में लीन रहता हूँ तब बहुत सारे कीट-पक्षी मेरे ऊपर मंडराते हैं. इससे तप में विघ्न पड़ता है. आप मुझे इस विघ्न से मुक्ति दिला दीजिए. इसलिए मेरे शरीर से हमेशा तेज अग्नि निकलती रहे जिससे कोई पास न आए और मैं निर्विघ्न आपकी अराधना करता रहूं.
इस भोलेपन से महादेव भी अचरज में थे. लेकिन भक्त ने एक सहज चीज मांगी थी सो उन्होंने गजासुर को उसका मनचाहा वरदान दे दिया.
गजासुर फिर से शिवजी की साधना में लीन हो गया.
कीट-पतंगों की बाधा से मुक्त गजासुर ने इस बार हजारों वर्षों की साधना की. उसके घोर तप से शिवजी फिर प्रकट हुए.
उन्होंने कहा- गजासुर तुम्हारी जो अभिलाषा थी वह तो मैंने पूरी कर दी थी. अब तुम क्यों तप कर रहे हो. ऐसी क्या अभिलाषा है जिसे पूरी करना चाहते हो? मैं तुमसे प्रसन्न हूँ. जो इच्छा हो मुझसे मांग लो. बोलो अब क्या मांगते हो?
गजासुर कुछ इच्छा लेकर तो तप कर नहीं रहा था. वह तो शिव जी की आराधना इसलिए करता था क्योंकि उसे इसके सिवा और कोई काम पसंद ही नहीं था. शिव के घोर तप में लीन भक्त के पास काल भी नहीं फटकता था. सो जब तक सांस चल रही थी वह शिवध्यान में रहता.
लेकिन जब उसके आराध्य ने स्वयं ही कहा कि वरदान मांगो तो वह कुछ सोचने-विचारने लगा.
गजासुर ने कहा- भगवन! वैसे तो मैंने कुछ इच्छा रखकर तप नहीं किया. लेकिन आप कुछ मेरे मन का देना चाहते हैं तो आप कैलाश छोड़कर यहीं रहें मेरे पास. मैं आपको प्रतिपल देखता रहूँ.
इससे पहले की भगवान उसकी इच्छा पूरी करने के विषय में कुछ कहते उसने खुद ही कहना शुरू किया.
भगवन! मैं नहीं चाहता हूँ कि आपके और मेरे मध्य कोई और रहे. मैं निर्विघ्न आपकी सेवा करना चाहूँगा. लेकिन आप यहां विराजमान हो जाएंगे तो फिर बहुत से लोग दिन-रात आते रहेंगे. फिर उस वरदान का क्या लाभ?
शिव जी हंसने लगे. उन्होंने कहा कि हां बात तो सही है. मैं कैलाश पर रहूँ या यहां- जो मुझसे मिलने आना चाहते हैं उन्हें क्यों रोकूँ? यदि तुम्हारी इच्छा पूरी करने के लिए रोकना चाहूँ भी तो कैसे रोकूँ? तुम्हारे पास कोई तरीका हो तो कहो.
गजासुर ने कुछ पल सोचा. फिर बोला- भगवन आप मेरे उदर (पेट) में ही निवास करें. मेरे उदर में रहने से आपको कोई देख नहीं पाएगा और फिर कोई विघ्न नहीं होगा.
शिव जी ने समझाने की कोशिश की कि कुछ और मांग लो. इस वरदान का तुम्हें क्या ही लाभ, लेकिन जैसे भोले-भंडारी वैसे उनके भक्त. भक्त के मन में एक बात आ गई तो आ गई. वह जिद पर अड़ गया कि नहीं आप मेरे उदर में ही निवास करिए. आपको कोई कष्ट नहीं होगा और मेरा भी लाभ है.
गजासुर की इच्छा पूरी करने के लिए भोले भंडारी उसके पेट में समा गए.
अब शिव जी का कहीं पता ही नहीं चलता था. माता पार्वती ने उन्हें खोजना शुरू किया लेकिन वह कहीं मिले ही नहीं. उन्होंने विष्णुजी का स्मरण कर शिवजी का पता लगाने को कहा.
श्रीहरि ने कहा- बहन आप दुखी न हों. भोले भंडारी से कोई कुछ भी मांग ले, दे देते हैं. वरदान स्वरूप वे अभी गजासुर के उदर में वास कर रहे हैं. मैं वहां से उन्हें निकालने का प्रयास करता हूँ.
गजासुर के पेट में समाए शिवजी को श्रीहरि ने कैसे बाहर निकाला?

श्रीहरि ने गजासुर से मुक्त कराने के लिए एक लीला की. उन्होंने शिव जी के सेवक नंदी को नृत्य का प्रशिक्षण दिया. उन्हें खूब सजाया और फिर कहा कि गजासुर के सामने जाकर नाचना शुरू कर दो. ऐसे नाचो जैसे देवलोक में अप्सराएं नृत्य करती हैं.
श्रीहरि ने स्वयं एक ग्वाले का रूप धर लिया. नंदी को लेकर वे उस स्थान पर पहुँचे जहां गजासुर तपरत था. श्रीहरि बांसुरी बजाने लगे. बांसुरी की धुन पर नंदी ने ऐसा सुंदर नृत्य किया कि गजासुर बहुत प्रसन्न हो गया.
उसने ग्वाला वेशधारी श्रीहरि से कहा- मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूं. इतने साल की साधना से मेरे अंदर वैराग्य आ गया था. मुझे नृत्य संगीत, आमोद-प्रमोद से अरुचि हो गई थी. आज तुम दोनों ने मेरा भरपूर मनोरंजन किया है. मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ. मैं शिव जी का परमभक्त हूँ. उनकी कृपा से कुछ ही प्रदान करने में समर्थवान हूँ. मुझसे कोई वरदान मांग लो.
श्रीहरि ने कहा- निंसंदेह आप परम शिवभक्त हैं. शिवजी की कृपा से ऐसी कोई चीज नहीं जो आप हमें न दे सकें. किंतु मांगते हुए संकोच होता है कि कहीं आप मना न कर दें.
श्रीहरि की तारीफ से गजासुर स्वयं को ईश्वरतुल्य ही समझने लगा था.
उसने कहा- मेरा दिया वचन खाली नहीं जाएगा. तुम मुझे शिवस्वरूप ही समझो. अभी तुम मेरी शरण में हो इसलिए बिना किसी डर भय के जो चाहे मांग लो.
श्रीहरि ने फिर कहा- आप अपने वचन से पीछे तो न हटेंगे? मैंने आपको शिवस्वरूप मान लिया. इसलिए आप अपनी बात से पीछे नहीं हटेंगे इसका प्रण लेना होगा.
गजासुर ने धर्म को साक्षी रखकर हामी भरी.
श्रीहरि ने उससे कहा- हे परम शिवभक्त! लोक कल्याण के लिए तुम शिवजी को अपने उदर से मुक्त कर दो. मुझे यही वरदान चाहिए.
गजासुर वचनबद्ध था. वह समझ गया कि जिसे यह पता हो कि मेरे पेट में शिवजी हैं वह कोई साधारण ग्वाला नहीं हो सकता. जरूर स्वयं भगवान विष्णु आए हैं यह रूप धरकर.
उसने शिवजी को मुक्त किया और शिव जी से एक आखिरी वरदान मांगा.
उसने कहा- प्रभु आपको उदर में लेने के पीछे किसी का अहित करने की मंशा नहीं थी. मैं तो बस इतना चाहता था कि आपके साथ मुझे भी स्मरण किया जाए. शरीर से आपका त्याग करने के बाद जीवन का कोई मोल नहीं रहा. इसलिए प्रभु मुझे वरदान दीजिए कि मेरे शरीर का कोई अंश हमेशा आपके साथ पूजित हो.
शिवजी ने उसे वरदान दिया कि समय आने पर तुम्हारे शरीर का कोई अंश हमेशा पूजित होगा. तब तक तुम प्रतीक्षा करो.
श्रीहरि भी शिव के प्रति उसके ऐसे अनुराग से बड़े प्रसन्न थे.
उन्होंने कहा- हे गजासुर! तुम्हारी शिवभक्ति अद्भुत है. शिव आराधना में लगे रहो. समय आने पर तुम्हें ऐसा सम्मान मिलेगा जिसकी तुमने कल्पना भी नहीं की होगी.
गजासुर उसके बाद से कैलाश के समीप ही शिव के स्मरण में विरत होकर रहने लगा.
जब गणेशजी का शीश धड़ से अलग हुआ तो श्रीहरि को उस वरदान के पूरे होने का ध्यान आया. इसलिए उन्होंने देवों को कहा कि यहां से पास ही एक हाथी का मस्तक धारण किए परम शिवभक्त है. उसका शीश काट लाओ. वह इस क्षण के लिए बड़े लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहा है.
भगवान के दिए वरदान के फलस्वरूप गजासुर का शीश काटकर गणपति के धड़ से जोड़ा गया था. इस तरह वह शिवजी के प्रिय पुत्र के रूप में प्रथम आराध्य हो गया.
इसी पौराणिक वरदान के कारण गणेश जी को हाथी का सिर लगाया गया और वे प्रथम पूज्य बने। गजासुर का मस्तक पूजनीय हो गया.
यह तो थी पौराणिक कथा की आखिर गणेश जी को हाथी का सिर ही क्यों लगाया गया.
लेकिन क्या बस इतनी सी बात है?

गणेश जी को हाथी का सिर लगाया गया इसके पीछे एक गहरा प्रतीकवाद है.
गजानन को बुद्धि का देव माना जाता है. इसीलिए लक्ष्मी जी के साथ उनकी पूजा होती है. लक्ष्मी आने से बुद्धि बिगड़ने लगती है और उसे स्थायित्व देने के लिए बुद्धि का संतुलन चाहिए. इसलिए लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी पूजे जाते हैं.
अब हाथी के मस्तक को देखिए. बहुत विशाल होता है. हाथी स्वभाव से शांत जीव है. उसकी सोचने की क्षमता बहुत अधिक है. उसकी आँखें बहुत छोटी होती हैं इसलिए वह किसी भी चीज को बहुत गहराई से देखता है. उसके हर पक्ष को जितनी सूक्ष्मता से हाथी समझता है उतना उसके अलावा शायद आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या एआई ही समझ सकता है.
हाथी बहुत धीमी प्रतिक्रिया देता है. शरीर से विशाल और अत्यंत बलवान होने के कारण अगर वह बिना बारीकी से परखे प्रतिक्रिया देने लगे तो तबाही मचा देगा. इसलिए वह गहराई से सोचकर प्रतिक्रिया देता हुआ एक संतुलन बनाता है.
हाथी के कान बड़े-बड़े होते हैं. वह बहुत गहराई से सुनता है और कम प्रतिक्रिया देता है. जीवन में सफलता के लिए ये चीजें आवश्यक हैं. एक बुद्धि के देवता से अधिक कौन यह बात सिखा सकता है. इसलिए गणेश जी प्रथम पूज्य भी हैं. यानी आपको प्रतिदिन और सबसे पहले उनका ध्यान करना है.
ध्यान करना है का मतलब गणेश जी का हाथी का मस्तक जो संदेश देना चाहता है उसे याद रखना है. किसी बात पर प्रतिक्रिया देने में जल्दबाजी नहीं करनी है. सोच-समझकर हाथी की तरह प्रतिक्रिया दें. चीजों को गहराई से देखें और ध्यान से सुनें. आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर फैसले न करें.
एक और बात यह हो सकती है कि शिवजी प्रतिपल अपने पुत्र को देखें तो उन्हें स्मरण रहे कि उनका क्रोध कितना घातक हो सकता है. उन्हें संहार का देवता कहा जाता है. संहारक को क्रोध में संहार नहीं करना है बल्कि सृष्टि की व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने के लिए जितना संहार आवश्यक है उतना ही करना है.
उन्होंने एक बार संहार किया सती के अग्निप्रवेश पर तो धरती पर उथल-पुथल मच गई. दूसरी बार क्रोध किया तो पुत्र मस्तकविहीन हो गए. यह एक तरह का Check and Balance सिस्टम है एक अलार्म है. शिव जी को याद दिलाने का अलार्म की बिना पूरी पड़ताल किए आप क्रोध करेंगे तो विनाश ही होगा.
गजानन का मस्तक उन्हें हर पल इसका ध्यान कराता रहता है.
गणेश जी को हाथी का सिर लगाया गया इसके पीछे ये ही मूल बात रही होगी. वेद व्यास ने सोचा होगा कि आने वाली पीढ़िया अधिक बुद्धिमान होंगी. वे प्रतीकों को ज्यादा गहराई से समझेंगी. उन्हें क्या पता था कि हम प्रतीकों की परत खोजकर अर्थ निकालने के बजाय बस कहानियों में उलझ जाएंगे. ऐसा आभास होता तो वे शायद ही ऐसी कथाएं कह जाते.
गणेश जी को हाथी का सिल लगाया गया यह तो ठीक है तो फिर उनका अपना मस्तक कहां गया. इसके पीछे भी कई लोककथाएं हैं. जैसे कुछ स्थानों पर आता है कि वह चंद्रलोक में पहुंच गई और चंद्रमा उसे अपने पास रखना चाहते थे. वे भी शिव के बड़े प्रिय हैं. मस्तक पर रहते हैं. इसलिए उन्होंने उनके पुत्र का मस्तक रख लिया.
कुछ कथाएं हैं कि वह हिमालय में ही एक स्थान पर स्वयं शिव जी ने रखा दिया ताकि उन्हें स्मरण रहे कि जब-जब भी वे क्रोध करते हैं कुछ बड़ा अनिष्ट होता है. उत्तराखंड में एक मंदिर भी है जहां के बारे में मान्यता है कि गणेश जी का असली सिर यहीं रखा गया है.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
आशा है गणेश जी को हाथी का सिर क्यों लगाया गया- यह पौराणिक कथा आपको पसंद आई होगी. पोस्ट पर अपनी राय जरूर लिखें.
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