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शिव-पार्वती कथाः पुष्पदंत बना महान विद्वान कात्यायन, विंध्य वन में पिशाच कानभूति से भेंट. भाग-2

शिव-पार्वती कथाः पुष्पदंत बना महान विद्वान कात्यायन, विंध्य वन में पिशाच कानभूति से भेंट. भाग-2

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मित्रों शिव-पार्वती की सुंदर कथा शृंखला महादेव शिव शंभु एप्पस में शुरू हुई है. उस शृंखला कीएक कथा यहां दे रहे हैं. पिछली कथा और पूरी शृंखला का आनंद लेने के लिए प्ले स्टोर में Mahadev Shiv Shambhu एप्पस सर्च करके डाउनलोड कर लें.

छुप-छुप कर भगवान शिव की कथा सुनने के अपराध में पुष्पदंत और उसका पक्ष लेने के चलते उसके दोस्त माल्यवान को मां पार्वती ने आवेश में शाप तो दे दिया पर जब शांत हुईं तो शापमुक्ति का उपाय भी बता दिया.

पार्वतीजी ने बताया कि सुप्रतीक यक्ष जो शाप के कारण पिशाच बनकर कानभूति नाम से विन्ध्य में रहता है उसे खोजो और वही कथा सुना जो तुमने वेश बदलकर चुपके से सुन ली थी. इससे तुम्हारी शापमुक्ति हो जाएगी. (पिछली कथा)

शाप देने के बाद ममतामयी मां पार्वती का मन इस बात के लिए कचोटता रहता था कि जरा सी बात पर उन्होंने अपने पति के प्रिय सेवकों को उनसे अलग कर दिया.

बहुत दिन सब्र के बाद एक दिन उन्होंने भगवान शिव से पूछ लिया- पुष्पदंत और माल्यवान का क्या हुआ, वे धरती पर गये तो पर उसके बाद उनका क्या हुआ? उनकी मुक्ति कब तक होने वाली है, लौटकर कैलाश कब आयेंगे?

भगवान शिव ने बताया- धरती पर जाकर हमारा पुष्पदंत बहुत बड़ा ज्ञानी बन गया है. वह पाटलिपुत्र के राजा नन्द का मंत्री है. उसका नाम वररुचि है. वररूचि कात्यायन के नाम से भी प्रसिद्ध है. उसके समान अभी व्याकरण का कोई पंडित पृथ्वी पर नहीं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हे पार्वती, शापमुक्ति में अभी देर है. अभी तो वररुचि का कानभूति से मिलना बाकी है फिर सुप्रतिष्ठित नगर में गुणाढ्य नाम से रह रहे माल्यवान को भी तो कानभूति से मिलना है और यह कथा न सिर्फ सुननी है बल्कि उसका प्रचार भी करना है.

वररुचि मां विंध्यवासिनी का बड़ा भक्त था. उसे मां विंध्यावासिनी ने सपने में आकर कहा कि वररुचि तूं विंध्य के जंगलों में जा वहां तुझे कानभूति नामक एक पिशाच मिलेगा. उससे मिलन तुम्हारे जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना होगी.

वररुचि ने इसे मां का आदेश समझा और विंध्य के पर्वतों और जंगलों की ओर अकेले ही निकल पड़ा. घने जंगलों से गुजरता और खूंखार जानवरों से बचता, बचाता आखिर वह उस जगह पहुंच ही गया.

कानभूति यहां एक विशाल बरगद के नीचे अनेक पिशाचों से घिरा हुआ बैठा था. वररुचि ने पिशाचों के बीच उसे निडर बैठा देखकर अंदाजा लगा लिया कि यही कानभूति होगा.

कुशलक्षेम के बाद वररुचि ने कहा- यह बताओ कि तुम इस खतरनाक निर्जन बियावान में इस तरह क्यों रहते हो? कानभूति बोला- मुझे सही-सही तो नहीं पता पर एक सुनी-सुनायी बात बताता हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक बार माता पार्वती ने शंकर भगवान से पूछा- एक तो आप मरघट में रहते हैं और उस पर भी खोपड़ी लिए घूमते रहते हैं. आप परमेश्वर हैं फिर भी ऐसे रूप में, ऐसी जगह, इस तरह क्यों रहते हैं?

भगवान शंकर ने उत्तर दिया था- जब प्रलय हुई और चारों और जल ही जल हो गया, सृष्टि का कुछ भी नहीं बचा तो मैंने उस जल में अपनी जांघ चीरकर एक बूंद खून टपका दिया.

इस खून से एक अंडा बन गया. अंडा जब फूटा तब उसमें से एक पुरुष निकला. उस अकेले पुरुष से मैंने प्रकृति का निर्माण किया. फिर कई प्रजापतियों का निर्माण किया और प्रजापतियों ने जंगल, जीव समूची सृष्टि की रचना कर दी.

सृष्टि का निर्माण कर प्रजापतियों को बड़ा घमंड हो गया. उनमें झगड़ा होने लगा कि श्रेष्ठ कौन है? उनकी आपसी लड़ाई से बहुत परेशान होकर मैंने सभी के शीश ही उतार लिए.

यह काम तो मैंने आसानी से कर दिया पर बाद में अपने किए पर दुःख हुआ कि उन्हें समझाना चाहिए था. इस तरह सिर काट देने वाली शायद अच्छी नहीं हुई. उसी भूल के पछतावे में मैं श्मशान में रहता हूं और हाथ में खोपड़ी पकड़े रहता हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जैसे भगवान पश्चातापवश श्मशान में रहते हैं वैसे मैं भी इस वन में एक शाप के कारण हूं. असल में तो मैं कुबेर का प्रिय दास था. मेरा नाम तब सुप्रतीक था. एक दिन कुबेर ने मुझे एक राक्षस के साथ देख लिया.

गंधर्व की दोस्ती और राक्षस से? क्रोध में आकर उन्होंने बिना कुछ समझे बुझे मुझे पिशाच बन जाने और श्मशान में रहने का शाप दे दिया. जब मेरा भाई बहुत रोया-गिड़गिड़ाया तो उन्होंने शाप मुक्ति का उपाय बताया.

कुबेर ने कहा- जब मैं पुष्पदंत से भगवान शिव द्वारा कही गयी कथा सुन लूंगा और उस सुनी कथा को माल्यवान को सुना दूंगा तो मेरी मुक्ति होगी. माल्यवान को तो बाद में खोजेंगे, पहले पुष्पदंत में मिलना ज़रूरी है.

मुझे संकेत मिला कि पुष्पदंत से मुलाकात विंध्य के जंगलों में होगी. तब से मैं श्मशान से निकल इस भयानक बियावान में उसी का इंतज़ार कर रहा हूं. यह सुनते ही पुष्पदंत को अपना अतीत याद आ गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उसने कानभूति से कहा- तुम भले मिले मित्र मैं ही तो शापित पुष्पदंत हूं. मैं तुम्हें सारी कहानी सुनाउंगा. कानभूति खुश हुआ. उसे शापमुक्ति का मार्ग मिल गया था.

वररुचि भी प्रसन्न. मां विंध्यवासिनी की प्रेरणा से वह भी उस जगह पर पहुंच गया था जहां से उसे मां पार्वती के शाप से बाहर निकलने का मार्ग मिलता दिख रहा था.

कानभूति कथा सुनने को व्याकुल था. वह पुष्पदंत से तत्काल ही कथा सुनाने का हठ करने लगा. फिर उसने कहा यदि कोई गोपनीयता जैसी बात न हो और आपको बताने में हिचक न हो तो कथा कहना शुरू करने से पहले अपने बारे में कुछ बताइए.

वररुचि की रोचक कथा अगली पोस्ट में देखेंगे.

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