श्रीहरि के अवतार भगवान नर-नारायण ने कामदेव को दिखाई लीला. उनके ऊरु से उत्पन्न हुई स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सरा उर्वशी

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भगवान विष्णु ने धर्म और रुचि को वरदान दिया था कि वह उनके घर में अपने अंश रूप में आएंगे. धर्म और रूचि के घर में नर और नारायण के रूप में अवतार हुआ. दोनों जन्म से तपस्वी थे.
जन्म के उपरांत वे बद्रिकाश्रम में तप करने के लिए चले गए. उनके तपोबल और तेज से वह क्षेत्र प्रकाशमान होने लगा. बहुत से ऋषि मुनियों उनके दर्शन और उपदेश ग्रहण करने को आने लगे.
इनके कठोर तप को देखकर देवराज इंद्र के मन में भय हुआ कि कहीं धर्म और रूचि की संतानें तप के द्वारा इंद्रासन को हथियाना तो नहीं चाहते. इस आशंका से ग्रस्त इंद्र ने नर-नारायण की तपस्या भंग करने का षडयंत्र रचा.
इंद्र ने अपने मित्र कामदेव और वसंत के साथ कई अप्सराओं को बद्रीक्षेत्र में भेजा. कामदेव औऱ बसंत ने अप्सराओं के साथ मिलकर भगवान नर नारायण का व्रत भंग करने की पूरी चेष्टा की. परंतु असफल रहे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
भगवान नर-नारायण कामदेव, वसंत तथा अप्सराओं की भाव-भंगिमाओं दिव्य नेत्रों से देख रहे थे. फिर उन्होंने नेत्र खोले तो सभी शाप के भय से कांपने लगे.
उनकी यह दशा देखकर भगवान नर नारायण ने उन्हें सांत्वना दी और कहा- तुम लोगों को भय करने की तनिक भी जरूरत नहीं. हम प्रेम से इस तपोभूमि में तुम्हारा स्वागत करते हैं.
कामदेव अत्यन्त लज्जित हुए. उन्होंने क्षमा मांगते हुए कहा कि वह देवराज इंद्र के सेवक हैं और उनके आदेश में बंधे हैं. ये अप्सराएं भी उनके अधीन है. हमने उनके आदेश पर ऐसी धृष्टता की.
कामदेव बोले- आप निर्विकार परम तत्व हैं। आपके चरण कमलों की सेवा से आत्मज्ञानी कामविजयी हो जाते हैं. आप देवाधिदेव नारायण हैं इसलिए काम क्रोधादि विकारों से आप परे हैं. हम पर आपकी कृपा बनी रहे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
कामदेव की स्तुति से भगवान नर नारायण प्रसन्न हुए. उन्होंने योगमाया से एक अद्भुत लीला की. अप्सराओं के साथ कामदेव ने देखा कि साक्षात देवी लक्ष्मी समान रूपवती नारियां नर नारायण की सेवा कर रही हैं.
नर नारायण ने कहा- कामदेव तुम इन स्त्रियों में से किसी एक को मांगकर स्वर्ग में ले जा सकते हो. वह स्त्री स्वर्ग के लिए अनमोल भूषण स्वरूप होगी.
कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को चुना. उरू यानी जंघा से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम उर्वशी पड़ा. उर्वशी को लेकर कामदेव ने स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया.
उन्होंने देवसभा में भगवान नर नारायण की महिमा का गुणगान किया, जिससे इंद्र और भयभीत हो गए. उन्हें पश्चाताप होने लगा और वह भगवान नर नारायण से क्षमा मांगने पहुंचे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
भगवान नर-नारायण ने इंद्र को क्षमा करते हुए कहा- देवराज भोलेनाथ को प्रिय यह दिव्य भूमि है. यहां मन के समस्त विकार मिट जाते हैं. परमार्थ का भाव जाग्रत होता है. आप इस क्षेत्र में महादेव की अनुकंपा प्राप्त करने के लिए साधना करें.
कहते हैं बद्रिकाश्रम क्षेत्र में महादेव ने भगवान नर-नारायण और इंद्र को दर्शन दिए थे.
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संकलन व संपादनः PrabhuSharanam
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