विश्वामित्र ने क्रोध में किया अलग सृष्टि की रचना का कार्य आरंभः त्रिशंकु की कथा

राजा हरिश्चन्द्र सूर्यवंश के प्रतापी राजा थे. वह श्रीरामचन्द्र के वंश में 35 पीढ़ी पहले राजा त्रिशंकु के पुत्र थे. राजा विश्वामित्र एक बार संयोग से महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में गए.
विश्वामित्र अपनी पूरी सेना के साथ आए थे. उन्हें किसी ऋषि को कष्ट देने में संकोच हो रहा था लेकिन वशिष्ठ ने उन्हें सेना समेत आश्रम के पास पड़ाव डालने को कहा. विश्वामित्रमान गए.
वशिष्ठ के पास कामधेनु गाय थी. कामधेनु से अक्षय अन्न-धन प्राप्त हो सकता था. उसके प्रताप से वशिष्ठ ने विश्वामित्र का सेना समेत सत्कार किया. विश्वामित्र कामधेनु के प्रताप को देखकर मोहित हो गए.
उन्होंने वशिष्ठ से कहा कि ऐसी अद्भुत गाय तो राजा के पास होनी चाहिए क्योंकि उसे प्रजा का पालन करना होता है. विश्वामित्र ने हजारों हाथी, घोड़े और गाएं देकर बदले में कामधेनु की मांग की.
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वशिष्ठ नहीं माने तो विश्वामित्र ने बल प्रयोग से गाय छीनने का प्रयास किया. वशिष्य़ ने कामधेनु को रक्षक सेना प्रकट करने का आदेश किया. कामधेनु के जितने रोंए थे उतने सैनिक प्रकट हो गए.
विश्वामित्र की सारी सेना का सफाया हो गया. वशिष्ठ ने विश्वामित्र के सौ पुत्र भी शाप देकर भस्म कर दिया. विश्वामित्र इस पराजय से उदास होकर तप करने लगे.
महादेव को तप से प्रसन्न करके वरदान में दिव्यास्त्र प्राप्त किए और वशिष्ठ से लड़ने आए. वशिष्ठ ने ब्रह्मदंड के प्रयोग से विश्वामित्र के सभी अस्त्र-शस्त्र निष्फल कर दिए.
विश्वामित्र समझ गए कि तप से उन्हें भी महर्षि की पदवी और ब्रह्मदंड प्राप्त करना होगा तभी वशिष्ठ को चुनौती दे सकते हैं. घोर तप करके वह ब्राह्मण और ब्रह्मर्षि हो गए. वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में यह प्रसंद विस्तार से है जिसे कभी विस्तार से प्रस्तुत करेंगे.
हरिश्चन्द्र के पिता त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे. उन्होंने कुलगुरु वशिष्ठजी से अपनी इच्छा जताई. वशिष्ठ ने इसे धर्मविरूद्ध कार्य बताकर मना कर दिया. त्रिशंकु वशिष्ठ के सौ पुत्रों के पास गए. उन्होंने भी असमर्थता जताई.
नाराज त्रिशंकु ने कहा कि वह वशिष्ठ के स्थान पर अब नया पुरोहित रखेंगे. वशिष्ठ के पुत्रों ने नाराज होकर त्रिशंकु को चांडाल हो जाने का शाप दे दिया. त्रिशंकु चांडाल रूप में विश्वामित्र के पास गए और सारा हाल बताया.
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विश्वामित्र को वशिष्ठ को नीचा दिखाने का अवसर मिल रहा था. उन्होंने त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने का वचन दिया. विश्वामित्र को मुख्य पुरोहित बनाकर विशाल यज्ञ का आयोजन कराया गया. सभी ऋषि-मुनियों को आमंत्रण दिया गया.
सभी ऋषिगण आए पर वशिष्ठ के सौ पुत्र चांडाल यजमान और क्षत्रिय पुरोहित द्वारा कराए जा रहे यज्ञ में शामिल होने से मना कर दिया. क्रोधित विश्वामित्र ने वशिष्ठ के सौ पुत्रों को अपनी शक्तियों से भस्म कर दिया.
यज्ञ आरंभ हुआ. आह्वान करने पर देवता यज्ञ भाग ग्रहण करने नहीं आए तो विश्वामित्र ने क्रोध से श्रुवा उठाकर त्रिशंकु को अपने तपोबल से स्वर्ग भेजने को तैयार हुए. त्रिशंकु आकाश की ओर उड़ा.
जब इन्द्र ने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग में आते देखा तो उसे वापस पृथ्वी की ओर धकेल दिया. त्रिशंकु उलटा होकर नीचे गिरा और विश्वामित्र को रक्षा के लिए पुकारा. विश्वामित्र ने तपोबल से उसको बीच ही में स्थिर कर दिया.
अब विश्वामित्र की देवताओं के साथ ठन गई. उन्होंने नई सृष्टि ही रचना करने का निश्चय किया. दक्षिण ध्रुव के समीप सप्तर्षि और नए नक्षत्र बना दिए. बहुत से जीव जंतु फल-मूल की रचना कर दी.
अब विश्वामित्र ने देवलोक और इंद्र बनाना चाहा तो इन्द्र समेत सभी देवता क्षमा मांगने लगे. विश्वामित्र मान गए. अपनी बनाई सृष्टि स्थिर रखकर और दक्षिण दिशा के आकाश में त्रिशंकु को ग्रह की भांति प्रकाशमान करके स्थिर कर दिया.
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इंद्र के साथ विश्वामित्र का बैर हो गया था. मेघों ने जल बरसाना बंद कर दिया. भयंकर सूखा पड़ा. विश्वामित्र एक चांडाल के घर भीख मांगने गए. क्रोध में वह कुत्ते के मांस से देवताओं को बलि देने लगे.
देवता भय से कांपने लगे और इन्द्र जल बरसाया. इंद्र के उसकाने पर उन्होंने राजा हरिश्चन्द्र को मायाबल से स्वप्न दिखाया और उनका सारा राजपाट दान में मांग लिया.
जब हरिश्चंद्र ने सर्वस्व दान कर दिया तो काशी की ओर चले क्योंकि काशी शिव के त्रिशूल के नोक पर बसी है और उसपर महादेव के अतिरिक्त किसी का अधिकार नहीं.
हरिश्चंद्र ने दान दे दिया तो विश्वामित्र ने कहा कि बिना दक्षिणा के दान अधूरा है. इसलिए आप दक्षिणा स्वरूप मुझे हजार स्वर्णमुद्राएं भी दें. उन स्वर्ण मुद्राओं को प्राप्त करने के लिए हरिश्चंद्र को अपनी पत्नी शैव्या को बेचना पड़ा और स्वयं चांडाल का काम करने लगे.
यह कथा अति लोकप्रिय है जिसे बताने की आवश्यकता नहीं. खैर, जब वशिष्ठ ने सुना कि उनके यजमान हरिश्चंद्र से विश्वामित्र ने छल से सब छीन लिया है तो उनको शाप दिया कि तुम बकुला हो जाओ.
विश्वामित्र ने वशिष्ठ को भी चिड़ा बन जाने शाप दे दिया. पक्षी बनकर दोनों ने बड़ा घोर युद्ध किया जिससे आकाश कांपने लगा. ब्रह्मा ने दोनों के बीच सुलह कराकर युद्ध रुकवाया. (वाल्मिकी रामायण, महाभारत और मार्कण्डेय पुराण की कथाओं का संकलन)