शिव का दुर्वासा अवतारः देवी अनुसूया के गर्भ से महादेव ने दुर्वासा के रूप में लिया आवेशावतार

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महर्षि अत्रि और देवी अनुसूया के कोई संतान न थी. दोनों महान तपस्वी थे. अनुसूया का पातिव्रत्य ऐसा था कि उससे स्वयं पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती को ईर्ष्या होती थी.
पति-पत्नी ऋक्षकुल पर्वत पर घोर तप कर रहे थे. त्रिदेवों ने अनुसूया की परीक्षा ली जिसमंा वह सफल रहीं. उन्होंने त्रिदेवों के समान तेजस्वी तीन संतानों का वरदान मांगा.ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों ने वरदान दिया कि समय आने पर तीनों के अंश उनके घर में पुत्ररूप में प्रकट होंगे. ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा, विष्णुदेव के अंश से भगवान दत्तात्रेय और रूद्र के अंश से दुर्वासा ऋषि का जन्म हुआ. (भागवत पुराण, बह्मवैवर्त पुराण)
दुर्वासा रूद्र के अवतार थे इसलिए उनमें क्रोध भी ज्यादा था. एक बार उन्होंने महान विष्णुभक्त राजा अंबरीष की परीक्षा ली थी. दुर्वासा ने एकादशी के पारण के लिए अंबरीष को प्रतीक्षा करने को कहा.लेकिन जब उन्हें पता चला कि अंबरीष ने बिना प्रतीक्षा किए पारण कर लिया है तो उन्हें मारने के लिए भयानक कृत्या उत्पन्न कर दिया. श्रीहरि की सुरक्षा में तैनात सुदर्शन चक्र ने अंबरीष की रक्षा की थी. (भागवत कथा)
दुर्वासा ने भगवान श्रीराम की भी परीक्षा ली थी. एक बार यमराज मुनि का वेष धारण करके भगवान श्रीराम के पास आए. उन्होंने श्रीराम के साथ शर्त रखी कि उनकी वार्ता के बीच कोई न आए.
यदि कोई विघ्न डालने आता है तो उसे प्राणदंड मिलेगा. श्रीराम ने ऐसा आदेश कर दिया. तभी दुर्वासा आ गए और उन्होंने हठ करके लक्ष्मणजी को अंदर भेज दिया. जिससे श्रीराम ने लक्ष्मण का त्याग कर दिया. (रामायण की कथा)एकबार दुर्वासा दुर्योधन के पास पहुंचे. दुर्योधन ने कई दिनों तक खूब सेवा की और प्रसन्न कर लिया. उन्होंने दुर्योधन से कुछ मांगने को कहा. दुर्योधन ने कहा- अभी पांडव बनवास पर हैं. आप उनके पास जाकर उनके अतिथि बनिए.
दुर्वासा सैकड़ों शिष्यों सहित पांडवों के पास पहुंचे और कहा- शिष्योंसहित स्नान करके आ रहा हूं. हमारे लिए तत्काल भोजन का प्रबंध करिए. द्रौपदी के पास अक्षय पात्र था लेकिन वह द्रौपदी के भोजन के उपरांत खाली हो जाता था.
द्रौपदी भोजन कर चुकी थीं. दुर्वासा के कोप से बचने के लिए उन्होंने श्रीकृष्ण का आह्वान किया. श्रीकृष्ण ने चावल के एक दाने से पांडवों को दुर्वासा के कोप से बचाया था. (महाभारत की कथा)इंद्र ने दुर्वासा द्वारा दी गई माला का अनादर किया तो दुर्वासा ने देवताओं को वृद्ध और शक्तिहीन हो जाने का शाप दे दिया. वे अशक्त हो गए और उनपर हमेशा खतरा मंडराने लगा.
तब श्रीहरि ने देवताओं को समुद्र मंथन करके जरा निवारिणी सुधा यानी अमृत प्राप्त करने को कहा. देवों और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया. (भागवत कथा)
महादेव के आवेशावतार दुर्वासा ऋषि की कथाएं अनेक ग्रंथों में मिल जाती हैं. हम समय-समय पर ये कथाएं आपको सुनाते भी रहे हैं. आगे भी सुनाएंगे.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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