विद्वेष का विष यदि समय रहते न रोका गया तो संपूर्ण जाति को ग्रस सकता है जैसे एक सर्प के अपराध के लिए रुरु संपूर्ण सर्प जाति को दंडित करने लगा

अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
ऋषि स्थूलकेश कन्या अपने आश्रम ले आए. अप्सरा और गंधर्व का अंश होने के कारण वह कन्या अप्रतिम सुन्दरी थी. ऋषि ने उसका नाम रखा प्रमद्वरा.
भृगुवंशी ऋषि कुमार रुरु एक दिन स्थूलकेश के आश्रम पर घूमते-धूमते आया और प्रमद्वरा के रूप पर मोहित हो गया. रुरु के पिता प्रमति स्थूलकेश से मिले और रुरु और प्रमद्वरा का विवाह तय किया गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक दिन प्रमद्वरा सखियों के साथ वन में गई और उसका एक सर्प पर पैर पड़ गया. क्रोधित सर्प ने उसे डंस लिया और उसकी मृत्यु हो गई. इससे रुरु बहुत शोक में डूब गया.
रुरु विलाप कर रहा था तभी वहां एक देवदूत पहुंचा और उसने कहा कि प्रमद्वरा को जिनती आय़ु मिली थी वह उस आयु को जी चुकी है. लेकिन रुरु यह सुनने को तैयार न था.
देवदूत ने कहा कि यदि रुरु अपनी आधी आयु दे दो तो यह पुन: जीवित हो जाएगी. रुरु सहर्ष अपनी आधी आयु प्रमद्वरा को देने को तैयार हुआ तो विश्वावसु और मेनका धर्मराज के पास गए और अपनी पुत्री को जीवित कराया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इसके बाद प्रमद्वरा के से रुरु का विवाह हो गया लेकिन रुरु को सर्पों से बैर हो गया. वह सर्प जाति का विनाश कर देना चाहता था. एक बार उसने एक पानी का सर्प देखा.
रुर ने सर्प को मारने के लिए हाथ में पकड़ी लाठी चलाई. वह उसे मार डालना चाहता था कि तभी वह पानी का सर्प मनुष्य की भाषा में बोला पड़ा- युवक मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो मेरे प्राण लेने पर उतारू हो.
रुरु ने कहा- मेरी प्रियतमा को एक सर्प ने डस लिया था. इस कारण उसके प्राण चले गए. तब से मैंने सभी सर्पों को नष्ट करने की प्रतीज्ञा ली है.
सर्प बोला- तुम्हारा क्रोध उचित, किंतु हम डुंडुभों (विषविहीन पानी के सर्प) को क्यों मारते हो, हममें तो विष ही नहीं होता. सर्प की आकृति मात्र से हमारे प्रति तुम्हारा बैर तो उचित नहीं है ऋषि कुमार.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रुरु मनुष्य की बोली में सर्प को बात करते देख चौंक गया. यह जानकर उसे दुखद आश्चर्य हुआ कि जल के सर्पों में विष ही नहीं होता. डुण्डुभ की बात सुनकर रुरु को ज्ञान हुआ और अपने किए पर पछतावा हुआ कि मैं व्यर्थ ही निर्दोष सर्पों को मारता रहा.
रुरु ने सर्प से पूछा- हे सर्प तुम मनुष्य की भाषा में बात करते हो, तुम कौन हो? सर्प ने बताया- मैं पूर्वजन्म में सहस्त्रपाद नामक ऋषि था. खगम नामक एक मेरा मित्र था.
एक दिन मेरा मित्र अग्निहोत्र कर रहा था तब मैंने हास्य करते हिए तिनकों का एक सर्प बनाया और मित्र को डराने लगा. वह उस सर्प के भय से मूर्च्छित हो गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.चेतना आने पर उसने मुझे शाप दिया कि जिस प्रकार तुमने विषहीन सर्प बनाकर डराया, तू वैसा ही विषहीन सर्प बन जा. मैंने उससे बहुत क्षमा प्रार्थना की तो उशने कहा कि शाप खत्म करना उसे नहीं आता.
परंतु उसने मुझे उपाय बताया कि प्रमति के पुत्र रुरु होंगे जिनका सर्पों से बैर होगा. उनसे मिलने पर तुम्हारे शाप का अंत हो जाएगा. ऋषि सर्प योनि त्यागकर वास्तव रूप में आए और रुरु को कई प्रवचन दिए.
अपराध यदि व्यक्तिगत हो तो दंड भी व्यक्तिगत होना चाहिए. किसी एक व्यक्ति के अपराध की सजा उस पूरी जाति को क्यों को मिलनी चाहिए जिससे अपराधी का सरोकार है.
विद्वेष को कम से कम रखना चाहिए क्योंकि यह एक ऐसा विष है जिसे रोका न गया तो फैलता हुआ संपूर्ण समाज को ग्रस लेता है. महाभारत के आदि पर्व की नीति कथा.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
हम ऐसी कथाएँ देते रहते हैं. Facebook Page Like करने से ये कहानियां आप तक हमेशा पहुंचती रहेंगी और आपका आशीर्वाद भी हमें प्राप्त होगा: Please Like Prabhu Sharnam Facebook Page
धार्मिक चर्चा करने व भाग लेने के लिए कृपया प्रभु शरणम् Facebook Group Join करिए: Please Join Prabhu Sharnam Facebook Group