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भक्त की खिचड़ी में भगवान को स्वाद, ठाकुरजी को चढ़ने लगा खिचड़ी प्रसाद

भक्त की खिचड़ी में भगवान को स्वाद, ठाकुरजी को चढ़ने लगा खिचड़ी प्रसाद

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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे भी आपको पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इसका लिंक इसी लाइन के नीचे में है.श्रीकृष्ण की परम उपासक कर्मबाईजी भगवान को बाल भाव से भजती थीं. बालरूप ठाकुरजी से वह रोज ऐसे बातें करतीं जैसे बिहारीजी उनके पुत्र हों और उनके घर में ही वास करते हैं.

एक दिन उनकी इच्छा हुई कि बिहारीजी को फल-मेवे की जगह अपने हाथ से कुछ बनाकर खिलाउं. उन्होंने प्रभु से अपनी इच्छा से बता दी.

भगवान तो भक्तों के लिए सर्वथा प्रस्तुत हैं. गोपाल बोले- जो भी बनाया हो वही खिला दो. भूख लगी है.

कर्माबाईजी ने खिचड़ी बनाई थी. ठाकुरजी को खिचड़ी दी और उन्होंने बड़े चाव से खाया. कर्माबाईजी पंखा झलने लगीं कि कहीं गरम खिचड़ी से ठाकुरजी का मुंह न जल जाए.

संसार को अपने मुख में समाने वाले भगवान को भक्त एक माता की तरह पंखा कर रही हैं. भगवान भक्त की भावना में विभोर हो गए.

भक्तवत्सल भगवान ने कहा- मुझे तो खिचड़ी बहुत अच्छी लगी. मेरे लिए आप रोज खिचड़ी ही पकाया करो. मैं तो यही खाउंगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

कर्माबाईजी रोज सुबह उठतीं और सबसे पहले खिचड़ी बनातीं. बिहारीजी भी सुबह-सबेरे दौड़े आते. आते ही कहते माता जल्दी से मेरी प्रिय खिचड़ी लाओ.

प्रतिदिन का यही क्रम बन गया. भगवान सुबह-सुबह आते, भोग लगाते और फिर चले जाते. एक बार एक साधु कर्माबाईजी के पास आया.

उसने सुबह-सुबह सबसे पहले खिचड़ी बनाते देखा तो नाराज होकर कहा-सर्वप्रथम नहाधोकर पूजा-पाठ करनी चाहिए लेकिन आपको तो पेट की चिंता सताने लगती है.

कर्माबाईजी बोलीं- क्यां करूं, संसार जिस भगवान की पूजा-अर्चना कर रही होती है, वही सुबह-सुबह भूखे आ जाते हैं. उनके लिए ही तो खिचड़ी बनाती हूं.

साधु ने सोचा कि शायद कर्माबाई की बुद्धि फिर गई है. जैसे भगवान इसकी बनाई खिचड़ी के लिए भूखे रह जाते हैं.

उसने कहा कि तुम भगवान को अशुद्ध कर रही हो. सुबह स्नान के बाद पहले रसोई की सफाई करो. फिर भगवान के लिए भोग बनाओ.

अगले दिन कर्माबाई जी ने ऐसा ही किया. जैसे ही सुबह हुई भगवान आये और बोले माँ में आ गया, खिचड़ी लाओ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

कर्माबाईजी ने कहा- अभी में स्नान कर रही हूँ, थोडा रुको! थोड़ी देर बाद भगवान ने आवाज लगाई, जल्दी कर माँ,  मेरे मंदिर के पट खुल जायेगे मुझे जाना है.

वह फिर बोलीं – अभी में सफाई कर रही हूँ, भगवान ने सोचा आज माँ को क्या हो गया. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ.

भगवान ने झटपट जल्दी-जल्दी खिचड़ी खायी, आज खिचड़ी में भी भाव का वह स्वाद नहीं आया. जल्दी-जल्दी में भगवान बिना पानी पिए ही भागे. बाहर संत को देखा तो समझ गये जरुर इसीने कुछ सिखाया है.

ठाकुरजी के मंदिर के पुजारी ने जैसे ही पट खोले तो देखा भगवान के मुख से खिचड़ी लगी थी. वे बोले- प्रभु! ये खिचड़ी कैसे आप के मुख में लग गयी.

भगवान ने कहा- पुजारी जी आप उस संत के पास जाओ और उसे समझाओ, मेरी माँ को कैसी पट्टी पढाई.

पुजारी ने संत से सारी बात कही. संत घवराए और तुरंत कर्मा बाईजी के पास जाकर कहा- ये नियम धरम तो हम संतो के लिये है आप तो जैसे बनाती हो वैसे ही बनाएँ. ठाकुरजी खिचड़ी खाते रहे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

भगवान अपनी बनाई व्यवस्था को कभी बदलते नहीं. सो एक दिन कर्माबाईजी के भी प्राण छूटे. उस दिन भगवान बहुत रोए. पुजारी ने पट खोला तो देखा भगवान रो रहे थे.

पुजारी ने रोने का कारण पूछा तो भगवान बोले- आज मेरी माँ इस लोक को छोड़कर मेरे लोक को विदा हो गई. अब मुझे कौन खिचड़ी बनाकर खिलाएगा.

पुजारी ने कहा- प्रभु आप की माता की कमी महसूस न होने दी जाएगी. आज से सबसे पहले रोज खिचड़ी का भोग लगेगा इस तरह आज भी जगन्नाथ भगवान को खिचड़ी का भोग लगता है.

ये किंवदंतियां हैं. भक्तों की भगवान के प्रति आस्था और बदले में भगवान का भक्तों के प्रति कई गुणा ज्यादा स्नेह को बताने के लिए ये कथाएं अस्तित्व में आईं.

इनमें आप भक्ति का रस चखने की कोशिश करें तो आनंद आएगा. ईश्वर की शक्ति के आगे तर्कशीलता भी नतमस्तक होती है. तभी तो चिकित्सा विज्ञान के लोग भी कहते हैं- दवा से ज्यादा दुआ काम आएगी.

मित्रों हम खोज-खोजकर धार्मिक, आध्यात्मिक और प्रेरक कहानियां लेकर आते हैं. आप फेसबुक के माध्यम से यहां तक पहुंचते हैं. आपको सरल रास्ता बताता हूं एक साथ ऐसी धार्मिक और प्रेरक कई सौ कहानियां पढ़ने का.

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