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एक सच्चे तांत्रिक के धर्मयुद्ध की रोंगटे खड़े करने वाली कथा

एक सच्चे तांत्रिक के धर्मयुद्ध की रोंगटे खड़े करने वाली कथा

ये कथा है एक साधक की, तंत्र युद्ध की। तांत्रिक हमेशा असत साधना ही नहीं करते। हर तांत्रिक शक्तियों का दुरूपयोग नहीं करता। इच्छाछारी सर्प की मुक्ति के लिए तंत्र युद्ध की एक रोंगटे खड़े करने वाली सत्यकथा। एक सच्चे तांत्रिक ने कई सौ वर्ष की उम्र वाले बड़े तांत्रिक से लड़ा एक तंत्र युद्ध।

तांत्रिक सुनकर लोगों के मन में एक भय आ जाता है। उन्हें ऐसा लगता है कि तांत्रिक सिर्फ और सिर्फ असत या अनुचित मार्ग पर चलते हैं। पर ऐसा नहीं है। भगवान शिव द्वारा रची गई विद्या का अनुचित प्रयोग करने वाले बड़ी बुरी गति को प्राप्त होते हैं। एक सत्यकथा है ऐसे तांत्रिक की जो सत् की साधना करता है। वह तंत्र मार्ग का महान ज्ञाता है। लेकिन उसने कभी तंत्र का इस्तेमाल अपने निजी लाभ के लिए नहीं किया। किसी के कल्याण के लिए उसने अपनी तंत्र शक्तियों का प्रयोग किया। तंत्र युद्ध लड़ा किसी के भले के लिए।

एक सच्चे तांत्रिक सत्य की रक्षा के लिए लड़ा तंत्र युद्ध

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वह तंत्र का अच्छा ज्ञाता था। उसके पास बहुत सी सिद्धियां थीं। हर समय उसने कोशिश की, कि उसकी विद्या का लाभ कमजोर लोगों को मिले। जो अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते हैं उनकी रक्षा के लिए वह तंत्र युद्ध तक करता था। हालांकि इस तंत्र युद्ध में उसको बड़े नुकसान भी झेलने पड़ते थे। अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक दिन वह ध्यानरत था। तभी उसके चैतन्य में एक मार्मिक पुकार गूंजी। ये पुकार एक नागिन “उर्रन्गी” की थी। जिसके पति “दुर्मुक्ष”को एक सर्पतंत्र में प्रवीण तांत्रिक ने कैद कर लिया था। उस प्रबल तांत्रिक का नाम था सोनिला। जिसकी उम्र कई सौ वर्ष थी।

सोनिला तांत्रिक उस इच्छाधारी नाग की बलि देकर एक महत्वपूर्ण सिद्धि प्राप्त करना चाहता था। लेकिन हमारी कहानी के नायक औघड़ ने भी संकल्प कर लिया था, नाग दुर्मुक्ष को छुड़ाना ही है। इसके लिए औघड़ ने तांत्रिक सोनिला को चुनौती दे दी। दोनो में भीषण द्वंद्व हुआ। जिसके बारे मे हम आपको विस्तार से बताएंगे। आईए कथा में प्रवेश करते हैं और आगे की कहानी जानते हैं कहानी के नायक औघड़ और सोनिला तांत्रिक की जुबानी।

औघड़ लगातार सोनिला तांत्रिक से अनुनय विनय कर रहा था।”बाबा सोनिला! मुक्त कर दो इनको मैं हाथ जोड़ता हूं आपका दास बन जाऊँगा. हमेशा के लिए।” मैंने (औघड़) कहा।

“नहीं! जब तक कामेश्वरी नहीं आएगी ये कैद ही रहेंगे! चाहे युग बीत जाएँ!” अडिग होकर उन्होंने कहा।
“बाबा तुम अडिग तो मैं भी अडिग। लगा दी मैंने भी प्राण की बाजी।” मैंने कहा,
तांत्रिक सोनिला हंसा….”अरे बालक! हा! हा! हा! हा!” तू क्यों अपने प्राण दांव पर लगाता है।
“छोड़ दो बाबा।” मैंने हाथ जोड़कर कहा।
“जा! तुझे छोड़ दिया। बाबा ने छोड़ दिया।” वो बोला,
“मुझे नहीं बाबा। इनको छोड़ दो।” मैंने कहा।
“असम्भव” सोनिला ने कहा।
“मैं छीन लूँगा इनको आपसे।” मैंने कह दिया!

“तेरी इतनी हिम्मत?” आगबबूला होकर उन्होंने कहा और दुमुक्ष को फिर से बाँध लिया। अब द्वंद्व शुरु हो चुका था।
अब सोनिला बाबा ने सर्प-दंड उठाया और किसी का आह्वान किया।
और तभी वहां धामड़ी प्रकट हो गयी।
ये अत्यंत शक्तिशाली डाकिनी है। मानव का कलेजा खा जाती है। अब मैं भी तैयार हुआ, अपने त्रिशूल को उखाड़ा और भद्रलोचिनी-शक्ति का जाप कर डाला, त्रिशूल में जैसे विद्युतीय आवेश दौड़ गया।
जैसे ही डाकिनी क्रंदन करते हुए मेरे समक्ष आयी मैंने त्रिशूल से वार किया।

आवाज हुई झन्न! डाकिनी त्रिशूल को छूकर तत्काल लोप हो गई।अब बाबा सोनिला का क्रोध भड़क गया।
“आशीर्वाद दें बाबा!” मैंने व्यंग्य बाण छोड़ा।
“मेरी क्षमता जानता नहीं तू?” तांत्रिक सोनिला ने चेतावनी दी।
“जानता हूँ, तभी तो आपने इनको क़ैद कर लिया?” मैंने कहा।
“जिव्हा काट दूंगा तेरी।” वो चिल्लाया।
अब सोनिला बाबा ने अपना सर्प-दंड नीचे भूमि पर मारा।  मैं थोडा सा डगमगाया।  अचानक सोनिला ने एक मंत्र पढ़ते हुए सर्प-दंड मेरी ओर कर दिया। मैं तत्काल  अपने स्थान से पीछे फिंक गया। तभी भूमि ने जकड़ लिया मुझको। जमीन मुझे अंदर खींचने लगी।मैंने फ़ौरन जंभाल-मंत्र का जाप किया और छूट गया।
“बच गया?” सोनिला ने उपहास उड़ाया मेरा।
“हाँ!” मैंने भी निडर होकर उत्तर दिया।
लेकिन तभी तक तू जीवित है,  जब तक मैं चाहूं। सोनिला ने फिर से अट्ठहास किया
अब मैं जानता था, कि वो कोई घातक प्रहार करेगा। इसलिए अब मैंने अपने सामने पहले से लाकर रखी हुई गुड़ की भेलियां सामने सजाईं और उन भेलियों पर बकरों का मांस रखा।धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-
एक मांस का टुकड़ा उठाया मैंने। उस पर मंत्र पढ़ा। भक्क से पूरा अपने मुंह में भर लिया और मंत्र पढ़ते हुए निगल लिया।
इस क्रिया से मेरा दुहित्रात-मंत्र जागृत हो गया। मेरी रीढ़ की हड्डी दहक उठी।
अब मैं, मैं ना रहा।
मैं एक अत्यंत क्रोधित औघड़ में परिवर्तित हो गया। आवाज़ भारी हो गयी। अब कोई विनय-अनुनय नहीं। बस सीधी टक्कर।
सोनिला बाबा का अट्ठहास बंद हो गया। उसे स्थिति की गंभीरता का एहसास हो गया था।
वो हवा में उठ गया, और मैं भी खड़ा हो गया।
उसने मंत्रोच्चार किया। और वहाँ एक नाग-कन्या उत्पन्न हुई। जो पलभर में ही महा-पिशाचिनी के रूप में परिवर्तित हो गयी।  मैंने त्रिशूल को चाटा और सामने से आती हुई नाग-कन्या के उदर में घुसेड़ दिया।
तत्क्षण एक सर्प मूर्छित हो नीचे गिरा।
अब मैंने अट्ठहास लगाया।
तभी उसने फिर से मंत्र पढ़ा और द्रुतिका नामक वृषभ-वाहिनी प्रकट हुई। जो दौड़ी मेरी ओर मेरेटुकड़े करने।  मैंने त्रिशूल को सम्मुख किया और उससे टकरा दिया। ऐसा करते ही वो पलटकर बाबा को पार करते हुए विलोप हो गयी।
यह देखकर बौखला गया बाबा।
मैं गरजा “असहायों पर क्रूरता की है तूने आज तक। सच्चा औघड़ नहीं टकराया तुझे।  तूने इन निरीह नाग-वंशियों को सताया। तुझे दंड मिलेगा” मैंने कहा, कुछ नहीं बोला बाबा। कुछ पल शान्ति के बीते। और फिर अट्ठहास, चहुंदिश भीषण अट्ठहास।

सोनिला का अट्ठहास बड़ा ही कड़क था।  कोई और होता तो उसे सुनकर ही भाग जाता। सोनिला जहांनाग-विद्या में अत्यंत माहिर था वहीँ एक प्रबल तांत्रिक भी था।
“अरे बालक, अब तक मैंने खेल खिलाया तुझे। ” सोनिला गरजा।
अब तक मैंने गुड़ की एक भेली मंत्र पढ़ते हुए, वहीँ गाड़ दी थी। अब मैंने खेल गम्भीरता से खेलना आरम्भ किया, मुझे एक नाग-कन्या क्रिताक्षिका का आशीर्वाद प्राप्त था।  उसने मुझे रक्ताभ्रक भी प्रदान किया था और कभी भी मदद का वचन भी दिया था। मैंने क्रिताक्षिका का आह्वान किया, वो स्थान रौशन हुआ लाल प्रकाश से और वहाँ सजी-धजी क्रिताक्षिका प्रकट हो गयी।

ये देख बाबा जैसे गिरते गिरते बचा। मैंने क्रिताक्षिका को नमन किया और मौन रूप से मैंने अपना उद्देश्य सम्प्रेषित किया।  क्रिताक्षिका मुस्कुराई और मुझे एक माला देते हुए लोप हुई। मैंने वो माला धारण कर ली।
सोनिला बाबा अब गहन मंत्रोच्चार में डूब गया। और इधर मैं भी।
बाबा ने कर्णिका नाम की एक शक्तिशाली गणिका प्रकट की, मेरे पास गणिका की शक्ति काटने के लिए उस समय न तो चिता थी और न ही कोई घाड़(मुर्दा शरीर)।  अत्यंत चतुर बाबा ने युक्ति से काम ले लिया था।

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मैंने फिर भी रक्षण हेतु वज्रघन्टा-गणिका का एक मंत्र पढ़ स्वयं को सुपोषित कर लिया।  शरीर में आवेश सा दौड़ गया। वहाँ गणिका मेरे समक्ष रौद्र रूप में प्रकट हुई।  परन्तु क्रिताक्षिका की दिव्य-माला की दमक के समक्ष ठहर नहीं सकी और लोप हो गयी।
तभी मेरे इर्द-गिर्द कुछ कन्याएं खड़ी दिखायीं दीं।  ये नाग-कन्याएं ही थीं। वे सभी नाग-कन्याएं जिनको बाबा सोनिला ने क़ैद किया हुआ था।
सभी भयभीत। निर्बल और निस्तेज। मुझे दया आयी।

मैंने गिना, ये कुल चौबीस थीं। लेकिन कोई भी नाग-पुरुष नहीं था। सच में बहुत क्रूरता ढाई थी बाबा सोनिला ने उन पर। अपने तंत्र-मंत्र का अनुचित और अन्यायिक उपयोग किया था बाबा ने।
वैसे तो नाग-कन्या अथवा नाग-पुरुष मानव के पास आने से कतराते हैं, लेकिन यदि नजदीकी हो जाए तो सदैव वफादार रहते हैं।  शीघ्र ही विश्वास करने लगते हैं। इसी निकटता का अनुचित लाभ उठाया था बाबा सोनिला ने।

मध्य भारत, पूर्वी भारत, म्यांमार देश, श्री लंका, दक्षिण भारत आदि में ऐसे कई स्थान हैं जहां कभी कभार मनुष्य का इन नाग-कन्यायों अथवा नाग-पुरुषों का सामना हो जाता है। बाबा मुझे बस अपनी शक्ति दिखाना चाहता था, मेरा ध्यान भटकाने के लिए।
जब मैं इन नागकन्याओं को देख रहा था। तभी अचानक सोनिला बाबा शून्य से प्रकट हुई औरतामशूल-मंत्र का संधान कर मुझे खड़े खड़े फूंकने के लिए सर्प-दंड अभिमंत्रित करके मुझ पर फेंक मारा।
चिंगारियां फूटी मेरे शरीर से टकरायीं। लेकिन मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। मेरे द्वारा जागृत ऐवांग-मंत्र ने मेरी रक्षा की थी। अब देर हो रही थी। मुझे इस खेल का अंत करना था।
“दुमुक्ष?” मैंने आवाज़ लगायी। स्वतंत्र होने के लिए तत्पर हो जाओ।” मैंने कहा।

बाबा के होश उड़े अब। मुझे क्रोध आ गया था।
अब मैं आसान पर बैठा। एक महागण की तेइसवीं गणिका का आह्वान किया। इसका नाम है वपुधारिणी। जैसा नाम वैसा काम। ये पञ्च-तत्वधारी के लिए कार्य करती है।  अब पहली बार बाबासोनिला को भय ने सताया।
दुमुक्ष वाला झोला पेट से खोलकर उसने गले में धारण कर लिया।
और मैंने अब आरम्भ किया आह्वान।धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-
“थम जा!” वो चिल्लाया। मैं नहीं रुका, आह्वान ज़ारी रखा।
“रुक जा, मैं कहता हूँ रुक जा।” बाबा सोनिला ने गुहार लगाई।
“बोलो बाबा?” मैंने कहा। “बदल कर ले” उसने कहा,
समझौता, अदला-बदली करके समझौता।
“कैसी बदल बाबा?” मैंने पूछा।
“चार मन सोना है मेरे पास  सब ले ज।” वो मुस्कुरा के बोला,
“नहीं बाबा। सोना अपने पास ही रखो” मैंने कहा।
‘कैसा मानुष है रे तू? और क्या चाहिए तुझे?” उसने कहा।
“इनको स्वतंत्र कर दो!” मैंने कहा। “असम्भव!” वो चिल्लाया।
“तब मैं विवश हूँ बाबा” मैंने कहा और मुंह फेर लिया। अब बाबा बेचैन हो गया। मैंने फिर से अस्थियों की माला उठायीं।
“अच्छा! रुक जा!” उसने कहा।
“सुन! बालक! मैंने अपना जीवन लगा दिया। तू मेरी सिद्धियाँ ले ले। मैं अपना सिद्ध-भाण्ड तुझे दे देता हूँ”। एक पल के लिए मैने सोचा, क्या लालच है, हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आये। बाबा को लगा मैं झांसे में आ गया, वो मुस्कुराया।
मैं भी सोचने का नाटक कर रह था।
“नहीं बाबा!” मैंने कहा। अब बाबा की साँसें ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे।
“और क्या चाहिए तुझे?” उसने पूछा। “कुछ नहीं, इनकी मुक्ति।” मैंने कहा।
बाबा ने जैसे अब अपने घुटने टेक दिए थे।
उसने अपना झोला कंधे से निकाला और उसका मुंह खोल दिया।  खोलते ही एक बड़ा सा भुजंग फन फैलाये आ गया बाहर।
ज़बरदस्त सांप, लम्बा, क्या फन उसका। सुनहरा और चमकदार। जागृत अलख(धूनी) की रौशनी में स्वर्णहार सा प्रतीत हो रहा था।
“दुमुक्ष?” मैंने कहा। उसने मेरी ओर फन किया। फिर बाबा सोनिला को देखा।
“आओ दुमुक्ष” मैंने कहा। और दुमुक्ष भाग छूटा जैसे क़ैद से। मेरे समक्ष आया और एक ज़बरदस्त फुफकार मारी। जैसे ही वो फुफकारा और वहाँ अन्य सर्प भी प्रकट हुए।
उसने फिर से फुफकार मारी। और अपने बाएं चल पड़ा,  जहां पत्थर पड़े थे। मैं समझ गया वो अपनी प्रेयसी उर्रुन्गी से मिलने जा रहा था।

दुमुक्ष ने फुफकार मारी सारे पत्थर हटने लगे। मैं और सोनिला बाबा देखते रहे वो दृश्य। उर्रुन्गी भूमि से बाहर निकली नागिन रूप में। उसने दुमुक्ष को देखा। दुमुक्ष ने उसको देखा। और फिर कितनाविस्मयकारी मिलन था। कितना सुकून मुझे। मैं तो धन्य हो गया। वे फन से फन लड़ाते भूमि में चले गए। रह गए अब हम दोनों बाबा सोनिला और मैं।
मेरा उद्देश्य पूर्ण हो चुका था। अब मैं दौड़ा और सीधा बाबा सोनिला के क़दमों में जा गिरा। क्योंकि वह सैकड़ों साल की उम्र वाले महान तांत्रिक थे। उनका सम्मान जरुरी था। मैं उनके क़दमों पर गिरा था। मेरे सर पर हाथ रखा बाबा ने।
“उठो” वे बोले। मैं हतप्रभ सा उठ गया।
“तुमने वही किया जो एक सच्चा साधक करता है!” वे बोले। मैं दम्भ में भर चला था, कृत्य-दुष्कृत्य में भेद नहीं कर सका” वे बोले। “और तुम! तुम डटे रहना, बहुत आयेंगे ऐसे मेरे जैसे बाबा। अपना प्रायश्चित करने जो मेरी तरह मोह और अहंकार में बंधे हैं। बाबा सोनिला ने कहा और विलुप्त हो गए। मेरे देखते ही देखते धुएं के सामान गायब होते चले गए बाबा।

वे लोप हुए तो नाग-पुरुष दुमुक्ष और उर्रुन्गी मेरे समक्ष प्रकट हुए। उनकी प्रसन्नता से बड़ा कोई खजाना नहीं लगा मुझे।  धनपति कुबेर का खजाना भी फीका ही लगा।

“आपके ऋणी रहेंगे हम सर्वदा!” दुमुक्ष ने कहा। मैं शांत रहा।
उर्रुन्गी ने नमस्कार के मुद्रा में हाथ जोड़े और कहा “हम प्रत्येक नाग-पंचमी पर भ्रमणशील रहते हैं कई साधकों के पास।  हम आपके पास भी आयेंगे।” वे दोनों बोले।
लेकिन मैने कहा। हे दुमुक्ष! यहाँ एक नाग-मंदिर बनेगा, आप उस पर आशीष रखें।” भविष्य में वहाँ एक मंदिर बना दिया गया। आज वहाँ एक पुजारी भी हैं।  मंदिर में श्रध्दालु आते रहते हैं। मंदिर ख्याति को प्राप्त होने लगा है। ये सब उसी नाग-युगल के आशीष के कारण है। आशा है आपको तंत्र युद्ध की यह कथा पसंद आई होगी।

जय औघड़नाथ। हर हर महादेव

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