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श्रीरामचरितमानस-बालकांडः प्रभुनाम का गुणगान पुण्य लोभ में नहीं उनके चरणों में अनुराग से करता हूं

श्रीरामचरितमानस-बालकांडः प्रभुनाम का गुणगान पुण्य लोभ में नहीं उनके चरणों में अनुराग से करता हूं


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चौपाई :
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी॥
नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई॥1॥

भावार्थ:- मणि, माणिक और मोती जैसे सुंदर रत्न साँप, पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पा सकते जैसी शोभा उन्हें राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर पर मिलेगी.

तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं॥
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई॥2॥

भावार्थ:- इसी तरह बुद्धिमान लोग कहते हैं कि अच्छे कवि की कविता का सृजन कहीं और होता है और उसे शोभा कहीं और मिलती है.

अर्थात कवि की वाणी से उत्पन्न कविता वहां शोभा पाती है जहां उसका विचार-प्रचार तथा उसमें व्यक्त आदर्श को ग्रहण और अनुसरण करने वाले लोग हों. कवि द्वारा स्मरण करते ही उसकी भक्ति से बंधी सरस्वतीजी ब्रह्मलोक को छोड़कर दौड़ी आती हैं.

राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ॥
कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी॥3॥

भावार्थ:- सरस्वतीजी के दौड़कर आने से उन्हें जो थकावट होती है उसे दूर करने का एक ही उपाय है, रामचरित रूपी सरोवर में स्नान कराना.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इसके अलावा देवी की वह थकावट किसी भी उपाय से दूर नहीं हो सकती. कवि और पण्डित अपने हृदय में ऐसा विचारकर कलियुग के पापों को हरने वाले श्रीहरि का यशगान ही करते हैं.

कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना॥
हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना॥4॥

भावार्थ:- संसारी मनुष्यों का गुणगान करने से सरस्वतीजी यह विचारकर पछताने लगती हैं कि मैं क्यों इसके बुलाने पर आई? बुद्धिमान लोग हृदय को समुद्र, बुद्धि को सीप और सरस्वती को स्वाति नक्षत्र के समान कहते हैं.

जौं बरषइ बर बारि बिचारू। हो हिं कबित मुकुतामनि चारू॥5॥

भावार्थ:- इसमें यदि श्रेष्ठ विचार रूपी जल बरसता है तो मुक्ता मणि के समान सुंदर कविता होती है.

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दोहा:
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग॥11॥

भावार्थ:- उन कविता रूपी मुक्तामणियों को युक्ति से बेधकर फिर रामचरित्र रूपी सुंदर धागे में पिरोकर सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं जिससे अत्यन्त अनुराग रूपी शोभा होती है. वे आत्यन्तिक प्रेम को प्राप्त होते हैं.

चौपाई :
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला॥
चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़े॥1॥

भावार्थ:- जो कराल कलियुग में जन्मे हैं, जिनकी करनी कौए के समान है और वेष हंस का सा है, जो वेदमार्ग को छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं, जो कपट की मूर्ति और कलियुग के पापों के घड़े हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरम ध्वज धंधक धोरी॥2॥

भावार्थ:- जो श्रीरामजी के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो लोभ, क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो धींगाधींगी करने वाले, धर्मध्वजी धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले दम्भी और कपट के धन्धों का बोझ ढोने वाले हैं, संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है.

जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ ॥
ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने ॥3॥

भावार्थ:- यदि मैं अपने सब अवगुणों को कहने लगूं तो कथा बहुत बढ़ जाएगी और मैं पार नहीं पाऊंगा. इससे मैंने बहुत कम अवगुणों का वर्णन किया है. बुद्धिमान लोग थोड़े ही में समझ लेंगे.

समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी॥
एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका॥4॥

भावार्थ:- मेरी अनेकों प्रकार की विनती को समझकर, कोई भी इस कथा को सुनकर दोष नहीं देगा। इतने पर भी जो शंका करेंगे, वे तो मुझसे भी अधिक मूर्ख और बुद्धि के कंगाल हैं.

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥5॥

भावार्थ:- मैं न तो कवि हूं, न चतुर कहलाता हूं. अपनी बुद्धि के अनुसार श्री रामजी के गुण गाता हूं. कहां तो श्री रघुनाथजी का अपार और वर्णन के बाहर चरित्र और कहां संसार में आसक्त मेरी बुद्धि!

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जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं॥
समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई॥6॥हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भावार्थ:- जिस हवा से सुमेरु जैसे विशाल पर्वत उड़ जाते हैं. उनके सामने रूई की भला क्या गिनती? श्री रामजी की असीम प्रभुता को समझकर कथा रचने में मेरा मन बहुत हिचकता है.

दोहा :
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान॥12॥

भावार्थ:- सरस्वतीजी, शेषजी, शिवजी, ब्रह्माजी, शास्त्र, वेद और पुराण- ये सब ‘नेति-नेति’ कहकर (पार नहीं पाकर ‘ऐसा नहीं’, ऐसा नहीं कहते हुए) सदा जिनका गुणगान किया करते हैं.

चौपाई :
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥
तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥1॥

भावार्थ:- यद्यपि प्रभु श्री रामचन्द्रजी की प्रभुता को सब वर्णन से ऊपर मानते ही हैं. फिर भी उसे कहे बिना कोई नहीं रहा. इसमें वेद ने ऐसा कारण बताया है कि भजन का प्रभाव बहुत तरह से कहा गया है.

अर्थात भगवान की महिमा का संपूर्ण वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता. फिर भी जिससे जितना बन पड़े उतना गुणगान करना चाहिए, क्योंकि भगवान के गुणगान रूपी भजन का प्रभाव बड़ा अनोखा है. उसके प्रभाव का शास्त्रों में वर्णन है. भगवान का थोड़ा सा भी भजन मनुष्य को सहज ही भवसागर से तार देता है.

एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा॥
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना॥2॥

भावार्थ:- जो परमेश्वर एक है, जिनके कोई इच्छा नहीं है, जिनका कोई रूप और नाम नहीं है, जो अजन्मा, सच्चिदानन्द और परमधाम है और जो सबमें व्यापक एवं विश्व रूप हैं, उन्हीं भगवान ने दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकार की लीला की है.

सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी॥
जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥3॥

भावार्थ:- वह लीला केवल भक्तों के हित के लिए ही है, क्योंकि भगवान परम कृपालु हैं और शरणागत के बड़े प्रेमी हैं। जिनकी भक्तों पर बड़ी ममता और कृपा है, जिन्होंने एक बार जिस पर कृपा कर दी, उस पर फिर कभी क्रोध नहीं किया.

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गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी॥4॥

भावार्थ:- वे प्रभु श्री रघुनाथजी गई हुई वस्तु को फिर प्राप्त कराने वाले दीनों के नाथ दीनानाथ, सरल स्वभाव, सर्वशक्तिमान और सबके स्वामी हैं. यही समझकर बुद्धिमान लोग उन श्रीहरि का यशगान कर अपनी वाणी को पवित्र और उत्तम फल देने वाली बनाते हैं.

तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा॥
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई॥5॥

भावार्थ:- रघुनाथ की महिमा के यथार्थ वर्णन में सक्षम नहीं हूं, परन्तु मैं तो इसे महान फल देने वाला भजन समझकर गाता हूं. भगवत्कृपा के बल पर ही मैं श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में शीश नवाकर उनके गुणों की कथा कहूंगा.

वाल्मीकि, व्यास आदि मुनियों ने भी जो पहले जो हरि की कीर्ति गाई है, वह इसी भाव से गाई थी. भाई! उसी मार्ग पर चलना मेरे लिए सुगम होगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.दोहा :
अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।
चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं॥13॥

भावार्थ:- अत्यन्त बड़ी श्रेष्ठ नदियों पर राजा यदि उनपर पुल बांध देता है, तो अत्यन्त छोटी चींटियाँ भी उन पर चढ़कर बिना ही परिश्रम के पार चली जाती हैं. उसी प्रकार मुनियों के वर्णन के सहारे मैं भी श्रीरामचरित्र का वर्णन सहज ही कर सकूंगा.

चौपाई :
एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।
ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना॥1॥

भावार्थ:- इस प्रकार मन को बल दिखलाकर मैं श्री रघुनाथजी की सुहावनी कथा की रचना करूंगा. व्यास आदि जो अनेकों श्रेष्ठ कवि हो गए हैं, जिन्होंने बड़े आदर से श्रीहरि का सुयश वर्णन किया है.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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