भागवत कथाः शेष के उपरांत श्रीहरि का देवकी के गर्भ में आगमन

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द्वापर मे लाखों दैत्यों ने राजाओं का रूप धारण करके पृथ्वी पर बड़ा पाप किया. आहत होकर पृथ्वी ने कृशकाय गौ का रूप धरा और ब्रह्माजी के पास पहुंची और रो-रोकर अपना दुख सुनाने लगी.
पृथ्वी के दुखों को सुनकर ब्रह्माजी का हृदय दुख से भर गया. वह पृथ्वी को लेकर क्षीर सागर गए और पुरूष सूक्त से श्रीहरि की स्तुति की. ब्रह्माजी ने उसी समय एक आकाशवाणी सुनी.
उसके बाद ब्रह्माजी देवलोक पहुंचे और सभी देवताओं से कहा- मैंने भगवान की वाणी सुनी है. वह पृथ्वी के कष्टों का उद्धार करने को स्वयं अवतार लेने वाले हैं. तुम सब अपने अंश रूपों में पृथ्वी पर जन्म लेकर श्रीहरि की लीला में भागी बनो.
ब्रह्माजी ने सभी देवताओं को विभिन्न स्वरूपों के बारे में आदेश देकर पृथ्वी को सांत्वना दी. पृथ्वी को भरोसा हो गया कि अब उसके कष्ट समाप्त होने वाले हैं.
भोजवंश में राजा उग्रसेन हुए. देवक उनके भाई थे. देवक ने अपनी सभी पुत्रियों का विवाह मथुरा के राजा शूरसेन के पुत्र वसुदेव से कर दिया. देवकी देवक की सबसे छोटी पुत्री थीं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वसुदेव देवकी को विवाह के बाद विदा कराके जाने लगे तो उनका चचेरे भाई कंस जो अपनी बहन देवकी से विशेष स्नेह रखता था, उसने रथ हांकने का निर्णय किया.
रथ में देवकी और वसुदेव को बिठाकर कंस स्वयं रथ हांकता मथुरा से लेकर चला. तभी आकाशवाणी हुई- कंस तू जिस बहन से इतना स्नेह करता है, इसकी आठवीं संतान तेरी मृत्यु का कारण बनेगी.
कंस ने आकाशवाणी को सुनते ही देवकी का वध करने के लिए तलवार निकाल ली और देवकी का वध करने ही वाला था. वसुदेव ने समझाया तुम्हें भय देवकी की आठवीं संतान से है, देवकी से नहीं. इसका वध मत करो.
वसुदेव ने उसे तरह-तरह से समझाया. उसकी खूब प्रशंसा की तो कंस थोड़ा नरम हुआ. वसुदेव ने कहा- मैं स्वयं देवकी के गर्भ से पैदा हुई संतानों को तुम्हारे पास रख आऊंगा. तुम एक नवविवाहित की हत्या का पाप न करो.
वसुदेव सत्यवादी और वचन के पक्के थे यह बात सभी जानते थे. उनके वचन से कंस को भरोसा हो गया. उसने देवकी को छोड़ दिया. कुछ समय बाद देवकी के गर्भ से पहली संतान ने जन्म लिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वसुदेव अपना वचन पूरा करने के लिए संतान को लेकर कंस के पास आए और उसे सौंप दिया. कंस उनकी सत्यवादिता से खुश हो गया. उसने बालक लौटाते हुए कहा- देवकी के गर्भ से जन्मी आठवीं संतान से भय है. इसलिए आप इसे ले जाइए.
वसुदेव उस बालक को लेकर वापस लौट आए. नारदजी कंस के पास आए और कहा- तुमने देवकी की संतान लौटाकर अच्छा नहीं किया. न जाने कौन सी संतान आठवीं कही जाए.
नारद ने भूमि पर आठ रेखाएं खींचकर समझाया कि फेर तो वहां से है जहां से गिनती आरंभ किया जाए. इनमें से कोई भी रेखा आठवीं हो सकती है. नारदजी ने यह भी बता दिया कि सभी देव-देवी भी गोप-गोपियों के रूप में व्रज में जन्म ले रहे हैं.
कंस का माथा ठनका. उसे ज्ञात था कि पूर्वजन्म में वह कालनेमि असुर था. श्रीहरि ने उसका वध किया था. उसने तत्काल वसुदेव और देवकी को कारागार में डाल दिया. अपनी निगरानी में देवकी की आठों संतानों का जन्म और हत्या करना चाहता था.
कंस ने उग्रसेन को भी कारागार में डाल दिया औऱ शासन करने लगा. एक-एक करके वह देवकी की संतानों का वध करता गया. देवकी के सातवें गर्भ के रूप में स्वयं शेषजी आए. पहले वह श्रीराम के अनुज लक्ष्मण रूप में आए थे. इस बार अग्रज हुए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शेशजी के गर्भ आगमन के साथ ही देवकी का हर्ष बढ़ गया. कंस का यदुवंशियों पर अत्याचार बढ़ गया था. श्रीहरि ने योगमाया को आदेश दिया- तुम माता देवकी के गर्भ से शेषजी को निकालकर नंदबाबा के गोकुल में छुपकर रह रही वसुदेव की पत्नी रोहिणी के गर्भ में डाल दो.
अब मैं अपने समस्त ज्ञान औऱ बल आदि अंशों के साथ देवकी के गर्भ में आउंगा. तुम नंदबाबा की पत्नी यशोदा के गर्भ में आओ. इस कार्य में सहयोग करने के कारण तुम संसार अंबिका, भद्रकाली, चामुंडा, नारायणी, वैष्णवी, शारदा आदि नामों से पूजी जाओगी.
योगमाया ने देवकी के गर्भ से शेषजी को खींचकर निकाल लिया इस कारण उनका नाम संकर्षण भी पड़ा. उसे रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर आईं. कंस ने समझा कि देवकी का गर्भ नष्ट हो गया.
अब भगवान ने देवकी के गर्भ में प्रवेश लिया. देवकी के गर्भ से एक अद्भुत तेजपुंज बाहर आने लगा. द्वारपालों ने कंस को बताया तो वह बहुत भयभीत हो गया. वह उसे खत्म करने के उपाय सोचने लगा.
ब्रह्मा, महादेव आदि सभी देवगण कारागार में आए और उन्होंने भगवान की स्तुति आराधना की. कंस इतना व्याकुल था कि उसे सोते-जागते कालरूप में भगवान दिख जाते. समस्त देवों ने हरि अवतार के लिए विशेष तैयारियां आरंभ कीं.
कल सुनेंगे श्रीकृष्ण के प्राक्टय का वर्णन प्रसंग
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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