क्या कभी श्रीराम ने सीता जी को ही दान में दे दिया था?
भगवान श्रीराम की लीला अपरंपार है. यज्ञ में श्रीराम ब्राह्मणों को दान दे रहे थे. किसी ने सीता जी को ही दान में मांग लिया. भगवान ने सीता जी क्यों दे दिया दान में? आनंद रामायण की कथा समाज के लिए आंखें खोलने वाली है.
धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-भगवान श्रीराम ने माता सीता को ही दान कर दिया था और यह दान मांगा किसने? पत्नी को दान में मांगने वाले थे स्वयं उनके कुलगुरू वशिष्ठ! वशिष्ठ जी जैसा ज्ञानी और श्रीराम जैसा मर्यादा पुरुषोत्तम ऐसा कैसे कर देगा! स्त्री को दान में कैसे दे देगा! कलयुग होता तो सोचा भी जा सकता था, त्रेता में ऐसा अनर्थ कैसै!
आपको हैरानी हुई न सुनकर. हैरानी होनी स्वाभाविक है पर ऐसा क्यों हुआ था यह जानेंगे तो हृदय वशिष्ठजी के लिए और श्रद्धा से भर आएगा. प्रभु श्रीराम के लिए प्रेम और बढ़ जाएगा. मैं हमेशा कहता हूं कि ईश्वर की लीला को सामान्य कथा समझकर पढ़ते-सुनते रहेंगे तो आप अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं. फिर इससे अच्छा है कि सिनेमा देख लें, सीरियल देख ले. वहां मनोरंजन इससे ज्यादा है.
धर्मग्रंथों की कथाएं सिर्फ सुनने के लिए गुनने के लिए होती हैं. उनका चिंतन करके उसके पीछे का अर्थ समझना होता है तभी उपयोग है. वरना इंटरनेट पर मोबाइल का डेटा खर्चके आनंद के अनगिनत और तरीके हैं. इसलिए प्रभु शरणम् से जुड़े रहिए. हमारा उद्देश्य वह बताना नहीं है जो आप सुनते आए हैं. हमारी कोशिश रहती है उस रहस्य को सामने लाने की जिसके लिए कोई भी कथा ग्रंथों में जोड़ी गई होगी.
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आइए पहले कथा पढ़ते हैं फिर श्रीराम द्वारा सीता जी को दान में देने के पीछे के उस संदेश की भी बात करेंगे जिसे उन्होंने अपनी लीला और गुरु वशिष्ठ मुनि जरिये समाज तक पहुंचाया.
लंका विजय से लौट आने के बाद की बात है. भगवान श्रीराम ने इस बार बहुत विशाल अश्वमेध यज्ञ किया. इस यज्ञ की पूरी धरती पर चर्चा थी. खूब दान बांटा जा रहा था.
इससे उत्साहित होकर भगवान ने घोषणा कर दी कि यदि कोई मुझसे कौस्तुभ मणि, कामधेनु, अयोध्या का राज्य, पुष्पक विमान और यहां तक कि सीताजी को भी दान में मांगेगा तो मैं खुशी-खुशी दे दूंगा.
इस घोषणा का प्रचार दूर-दूर तक हुआ पर किसी में इतनी हिम्मत या सामर्थ्य कहां कि ऐसी वस्तुएं दान में मांगे. कोई सामने न आया.ठीक रामजन्म के दिन यज्ञ सकुशल संपन्न हो गया. देवताओं ने फूल बरसाये तो नगर निवासियों ऋषि मुनियों और भगवान राम का दर्शन सुख लिया.
अब भगवान श्रीराम द्वारा अपने गुरु को दान देने की बारी थी.श्रीराम ने चिंतामणि और कामधेनु को श्रीवशिष्ठजी को देने की घोषणा की, पर वशिष्ठ दान लेने को आगे ही नहीं आये. श्रीराम बड़े आश्चर्य में थे.
समस्त भूमंडल से ऋषिगण, देवगण आए. यक्ष, गंधर्व, नाग किन्नर सभी आए और दान प्राप्त किया पर उनके गुरू ही नहीं आ रहे. क्या गुरूवर अप्रसन्न हैं? क्या मुझसे या मेरे परिजनों से अंजाने में कोई धृष्टता हो गई?
श्रीराम इन्हीं विचारों में थे. अपनी चिंता उन्होंने भाइयों और मंत्रियों से भी कही. मंत्रियों ने सुझाव दिया कि आप स्वयं गुरू के पास जाएं और इस संदर्भ में पूछें.भगवान गुरू के पास और विनीत भाव से कहा- गुरुवर आप इस दान को स्वीकार कर मेरे यज्ञ को पूर्ण करें. आप यदि दान नहीं स्वीकारेंगे तो यज्ञ पूरा ही न होगा. मुझसे कोई अपराध हुआ है तो क्षमा करें पर यज्ञ पूर्ण करें.
वशिष्ठ ने कहा- श्रीराम अपराध तो ऐसा कोई नहीं हुआ है पर आपने जिन वस्तुओं को प्रदान करने की घोषणा कर दी उसकी उपयोगिता समझ नहीं आती मुझे. नंदिनी जैसी श्रेष्ठ गाय पहले से ही मेरे पास है. फिर मेरे पास कामधेनु की क्या आवश्यकता है? यह चिंतामणि तो ठीक पर मैं गोदान में कामधेनु लेकर क्या करूंगा? इससे मेरी तृप्ति नहीं होने वाली.
श्रीराम नतमस्तक होकर बोले- गुरुवर आपकी आज्ञा शिरोधार्य है. आप मुझे आदेश करें कि आपकी तृप्ति किस प्रकार के दान से होगी. मैं आपकी तृप्ति के लिए वह भेंट आपको अवश्य लाकर दूंगा.वशिष्ठ थोड़े गंभीर हुए फिर बोले- हे कोसलाधिपति, आप सर्वसमर्थवान है. आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं तो अपनी घोषणा के मुताबिक आभूषणों सहित अपनी पत्नी सीता का दान कर दें.
वशिष्ठ का इतना कहना था कि वहां हाहाकार मच गया.प्रजा औऱ मंत्रिगणों में तरह-तरह की बातें होने लगीं. सभी दबे मुंह वशिष्ठ को कोसने लगे. कोई कहता बूढे वशिष्ठ सठिया गये हैं तो कोई उन्हें पागल बताता. कोई कहता नहीं ये भगवान श्रीराम के धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं.
कुछ बुद्धिमानजनों की राय अलग थी. वे यह कह रहे थे कि वशिष्ठ जैसे संयत ऋषि ने यह कहा है तो उसे आसक्ति कहना ठीक नहीं. संभवतः श्रीराम की इच्छा से ही कोई लीला है.कोई कहता कि गुरू परीक्षा ले रहे हैं कि भगवान श्र राम भी लोगों के सामने अपना आपा खो सकते हैं या फिर वे जो कहते हैं, करते नहीं. जितने मुख उतनी बातें हो रही थीं.
हो हल्ले के बीच ही श्रीराम ने मां सीता को बुलवाया.
सीताजी के कानों तक भी बात पहुंची थीं. वह स्वयं विस्मय में थीं कि यह सब क्या हो रहा है पर स्वामी का आदेश था तो उसे स्वीकार ही करना था.
मुस्कुराते हुये भगवान राम ने सीताजी का हाथ अपने हाथ में लेते हुये गुरू से कहा- गुरुवर आप स्त्रीदान का उचित मंत्र पढें मैं सीता को दान में देने के लिये तत्पर हूं.वशिष्ठ ने श्रीराम और सीता दोनों को देखा. भगवान अपने भाव में मुस्कुरा रहे थे. माता शीश झुकाए खड़ी थीं. वशिष्ठ ने मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया.
वहां उपस्थित सभी लोग सकते में थे. मंत्र पढने के बाद वशिष्ठ ने सीताजी से कहा कि वे उनके पीछे आ जाएं. सीताजी बहुत ही खिन्न मन से गुरु वशिष्ठ के पीछे जा खड़ी हुई.तब श्रीराम ने कहा, गुरुवर अब कामधेनु भी ले ही लीजिये.
वशिष्ठ ने भगवान श्रीराम के इस प्रस्ताव पर उत्तर दिया- श्रीराम मैंने केवल तुम्हारी उदारता और दान देने की हिम्मत आंकने के लिए ही यह परीक्षा ली थी. अब यह खेल खत्म हुआ समझो. तुम सीता के भार के आठ गुने के बराबर सोना देकर सीता को वापस ले लो.
भगवान श्रीराम ने वैसा ही किया और आठ गुना सोना गुरु वशिष्ठ को तुरंत दिलवाया गया.इसके बाद गुरु वशिष्ठ बोले- श्रीराम अब मेरा आदेश सुनो. आज से अब कभी कौस्तुभमणि, कामधेनु, पुष्पक विमान, अयोध्यापुरी का राज्य किसी को भी दान देने का नाम भी मत लेना.
वशिष्ठ ने आगे कहा- पत्नी दान देने की वस्तु नहीं होती इसलिए आगे से सीता को दान देने की सोचना भी मत. इन सब के अलावा ब्राह्मणों को तुम किसी भी चीज का दान कर सकते हो. यदि तुम मेरी इन बातों को नहीं मानोगे तो तुम्हें बहुत कष्ट भोगना पड़ेगा. यह तय है.
गुरु वशिष्ठ ने आठ गुने भार के बराबर सोना और बाकी आभूषण लेकर मां सीता को दो कपड़ों में वहीं तत्काल ही वापस लौटा दिया. इस अवसर पर भारी मात्रा में फूल बरसाये गये और यज्ञ समाप्त हो जाने के बाद के जो भी काम रह गये थे पूरे किए गये.
भगवान बोले- गुरूदेव मैं भी यही चाहता था कि आपके मुख से संसार को यह ज्ञान मिले. एक राजा को अश्वमेध यज्ञ या चक्रवर्ती हो जाने के दंभ में इतना नहीं भर जाना चाहिए कि वह अपनी वाणी का विचार ही न करे. क्या देय और क्या अदेय है इसका विचार हमेशा रखना चाहिए.
हृदय का उन्माद और आनंद के अतिरेक में भी जिसकी बुद्धि जाग्रत रही वही प्रशंसनीय होगा अन्यथा उसे अपमान झेलना ही होगा.भगवान ने गुरुवर के चरणों में प्रणाम किया और यज्ञ के पूर्ण होने की घोषणा कर दी. (स्रोत: आनंद रामायण)
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-राजन प्रकाश
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