श्रीश्याम बाबा (बर्बरीकजी) का जन्म, देवियों द्वारा अलौकिक शक्ति का वरदान (भाग-1)

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भीम और हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच शूरवीर योद्धा थे. घटोत्कच अपने परिजनों के दर्शन के लिए इन्द्रप्रस्थ आए तो श्रीकृष्ण ने पांडवों से घटोत्कच का शीघ्र विवाह कराने को कहा. पांडवों ने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि वह घटोत्कच के लिए योग्य वधू सुझाएं.
श्रीकृष्ण ने कहा- असुरों के शिल्पी मूर दैत्य की बुद्धिमान एवं वीर कन्या कामकटंककटा ही इसके लिए सबसे योग्य है. मूरपुत्री मोरवी ने शर्त रखी है कि वह उस वीर से ही विवाह करेगी जो उसे शास्त्र और शस्त्र दोनों विद्याओं में परास्त कर दे. मैं घटोत्कच को स्वयं दीक्षित कर मोरवी का वरण करने भेजूँगा.
श्रीकृष्ण द्वारा दीक्षित होकर घटोत्कच मोरवी का वरण करने उसके दिव्य महल पहुंचे. देवी कामाख्या की अनन्य भक्त मोरवी शस्त्र विद्या में पारंगत थी. कामाख्या देवी ने उसे कई दिव्य शक्तियां दी थीं. उसके महल के द्वार पर उन वीरों की मुंडमालाएं लटक रही थीं जो मोरवी से विवाह के लिए आए थे किंतु परास्त होकर अपने प्राण गंवा बैठे.
घटोत्कच मोरवी के समक्ष उपस्थित हुए. मोरवी घटोत्कच के रूप एवं सौंदर्य पर मुग्ध हो गईं. मोरवी को आभास हुआ कि यह कोई साधारण पुरुष नहीं है, फिर भी उसने परीक्षा लेने की ठानी. मोरवी ने घटोत्कच से पूछा, “क्या आप मेरे प्रण के बारे में जानते हैं? आपको अपने विवेक और बल से मुझे परास्त करना होगा. इसमें प्राण भी जा सकते हैं.”हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
मोरवी ने घटोत्कच से शास्त्र विद्या का प्रमाण देकर निरुत्तर करने को कहा. घटोत्कच ने पूछा, “किसी व्यक्ति की पत्नी से एक कन्या ने जन्म लिया. कन्या को जन्म देते ही वह चल बसी. कन्या के पिता ने उसका पालन पोषण कर बड़ा किया. जब वह कन्या बड़ी हुई तो पिता की बुद्धि भ्रष्ट हो गई.
वह अपनी पुत्री से बोला मैंने अज्ञात स्थान से लाकर तुम्हारा पालन-पोषण किया है. अब तुम मुझसे विवाह रचाकर मेरी कामना पूरी करो. उस कन्या को सत्य का पता नहीं था. अनजाने में वह अपने पिता से विवाह कर लेती है. दोनों से उन्हें एक बेटी पैदा हुई. यह बताओ कि वह कन्या उस नीच कामी पुरुष की पुत्री हुई या दौहित्री?”
मोरवी निरुत्तर हो गई. उसने शस्त्र विद्या में घटोत्कच परास्त करने के लिए अपना खेटक उठाया. तभी घटोत्कच ने मोरवी को पृथ्वी पर पटक दिया. मोरवी घटोत्कच के हाथों शास्त्र और शस्त्र दोनों विद्याओं में परास्त हो चुकी थी. उसने अपनी पराजय स्वीकार करते हुए घटोत्कच से विवाह की हामी भर दी.
घटोत्कच ने कहा- सुभद्रे! उच्च कुल के लोग चोरी छुपे विवाह नहीं करते है. तुम आकाश गामिनी हो, अपनी पीठ पर बिठाकर मुझे मेरे परिजनों के निकट ले चलो. हम दोनों का विवाह उनके समक्ष ही होगा.” मोरवी घटोत्कच अपनी पीठ पर बिठाकर उनके परिजनों के समक्ष ले आई. यहाँ श्री कृष्ण एवं पांडवो की उपस्थिति में घटोत्कच का विवाह मोरवी के साथ विधि-विधान से हुआ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
मोरवी ने एक बालक को जन्म दिया. बालक के बाल बब्बर शेर जैसे घुंघराले थे इसलिए घटोत्कच ने उसका नाम ‘बर्बरीक’ रखा. जन्म लेते ही बालक पूर्णत: विकसित हो गया. उस बालक को लेकर महाबली घटोत्कच, भगवान श्री कृष्ण के समक्ष उपस्थित हुए. श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को आशीष दिया. बालक बर्बरीक ने श्रीकृष्ण से पूछा-“हे प्रभु! इस जीवन का सर्वोतम उपयोग क्या है?”
श्रीकृष्ण बर्नेबरीक के इन विचारों से प्रसन्न हुए और उन्होंने इन्हें “सुहृदय” नाम दिया. श्रीकृष्ण ने कहा-“हे पुत्र, इस जीवन का सर्वोत्तम उपयोग, परोपकारी व निर्बल का साथी बनकर सदैव धर्म का साथ देने में है. इसके लिये तुम्हें शक्तियाँ अर्जित करनी पड़ेंगी. इसलिए तुम महीसागर क्षेत्र (गुप्त क्षेत्र) में सिद्ध अम्बिकाओ व नवदुर्गा की आराधना कर शक्तियाँ प्राप्त करो.”
भगवान श्रीकृष्ण के आदेश से बर्बरीक ने महीसागर क्षेत्र में सिद्ध अम्बिकाओ की आराधना की. प्रसन्न होकर भगवती जगदम्बा ने वीर बर्बरीक को तीन बाण एवं कई शक्तियाँ प्रदान की. दिव्य बाणों से तीनों लोकों में विजय प्राप्त की जा सकती थी. देवी ने उन्हें “चण्डील” नाम से अलंकृत किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
सिद्ध अम्बिकाओ ने वीर बर्बरीक को आदेश दिया कि वह उनके परम भक्त विजय नामक ब्राह्मण की सिद्धि पूर्ण कराने में सहायता करें. वीर बर्बरीक की सुरक्षा में विजय ने यज्ञ आरंभ किया. बर्बरीक ने उस सिद्ध यज्ञ में विघ्न डालने आये पिंगल-रेपलेंद्र-दुहद्रुहा तथा नौ कोटि मांसभक्षी पलासी राक्षसों का अंत कर यज्ञ को विधिवत पूर्ण कराया.
वीर बर्बरीक ने ब्रह्मचारी होने का प्रण लिया था. उन्होंने पृथ्वी और पाताल के बीच मार्ग में नाग कन्याओं का विवाह प्रस्ताव यह कहकर ठुकरा दिया कि उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहकर सदैव निर्बल एवं असहाय लोगों की सहायता करने का व्रत लिया है.
(स्कन्द पुराण के माहेश्वर खंड अंतर्गत द्वितीय उपखंड “कौमारिका खंड” की कथा. अगली पोस्ट में बर्बरीक और पांडवों के भेंट की कथा)
संकलनकर्ताः महावीर प्रसाद सर्राफ “टीकम”
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