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श्रीरामचरितमानस-बालकांडः संत चंद्रमा की शीतलता धारण करेंगे तो असंत अग्नि का विध्वंस. जैसी प्रकृति वैसी प्रवृति

श्रीरामचरितमानस-बालकांडः संत चंद्रमा की शीतलता धारण करेंगे तो असंत अग्नि का विध्वंस. जैसी प्रकृति वैसी प्रवृति

lord ramchandra

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तुलसीदास जी ने मानस के आरंभ में संतों और असंतों की भी वंदना की है. वह कहते हैं कि दोनों ब्रह्मा की रची सृष्टि के ही जीव हैं. दोनों की प्रवृति अलग है. विवेकशील को दोनों के बीच का अंतर करना आना चाहिए.

।।संत-असंत वंदना।।

बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥2॥

भावार्थ:-अब मैं संत और असंत दोनों के चरणों की वन्दना करता हूं. देखें तो दोनों ही दुःख देने वाले हैं, परन्तु उनके द्वारा दिए गए दुखों में कुछ अन्तर है.

संत के बिछुड़ते ही आपके शरीर से आनंद रूपी प्राण गायब हो जाते हैं और असंत अपनी संगति में दारुण दुःख देना आरंभ कर देते हैं. अर्थात्‌ संत संगति का त्याग और असंत संगति की प्राप्ति दोनों की मृत्यु के समान दुःखदायी होती है.

उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥

सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥3॥

भावार्थ:- संत और असंत दोनों ही जगत में एक साथ पैदा होते हैं लेकिन जैसे कीचड़ में एक साथ पैदा होने वाले कमल और जोंक की प्रवृति अलग-अलग होती है उसी तरह संत और असंत के गुण अलग-अलग होते हैं.

कमल दर्शन और स्पर्श दोनों से सुख देता है, किन्तु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है. साधु अमृत के समान है जिसकी संगति मृत्यु रूपी संसार से उबारने वाली है.

असाधु मदिरा के समान है जो मोह, प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करने वाला है. अमृत और मदिरा दोनों समुद्र से उत्पन्न हुए हैं लेकिन एक शरीर में प्राण का संचार करने वाला तो दूसरा शरीर में विकार उत्पन्न करने वाला है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥4॥
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥5॥

भावार्थ:- भले और बुरे अपनी-अपनी करनी के अनुसार सुंदर यश और अपयश प्राप्त करते हैं. एक ओर अमृत, चन्द्रमा, गंगा और साधु हों दूसरी ओर विष, अग्नि, कलियुग के पापों की नदी अर्थात्‌ कर्मनाशा और हिंसा करने वाला व्याध. सभी इनके गुणों-अवगुणों से अच्छी तरह परिचित हैं लेकिन जिसे जो भाता है, वह उसे ही चुनता है.

संत को गंगा भाएगी तो असंत कर्मनाशा को सर्वश्रेष्ठ बता सकते हैं. संत अपने आचरण और वाणी से अमृतवर्षा करेंगे तो असंत विष समान अप्रिय करेंगे. संत चंद्रमा की शीतलता धारण करेंगे तो असंत को अग्नि का विध्वंस चाहिए. जैसी प्रकृति वैसी प्रवृति.

दोहा :

भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥5॥

भावार्थ:- भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण किए रहता है. अमृत की सराहना अमर करने में होती है और विष की मारने में.

चौपाई :

खल अघ अगुन साधु गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा॥
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥1॥

भावार्थ:- दुष्टों के पापों और अवगुणों की और साधुओं के गुणों की कथाएं- दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं. इसी से कुछ गुण और दोषों का वर्णन किया गया है, क्योंकि बिना पहचाने उनका ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता.

भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना ॥2॥

भावार्थ:- ब्रह्मा ही सृष्टिकर्ता हैं इसलिए भले और बुरे दोनों ही स्वभाव के लोग उनके पैदा किए हुए ही हैं पर उनके गुण और दोषों को विचारकर वेदों ने उन्हें अलग-अलग कर दिया है. वेद-पुराण और इतिहास कहते हैं कि यह सृष्टि गुण-अवगुणों से सनी हुई है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥
दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू ॥3॥
माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥
कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा ॥4॥
सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा ॥5॥

भावार्थ:- दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देवता, ऊंच-नीच, अमृत-विष, सुंदर जीवन-मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव-ईश्वर, सम्पत्ति-दरिद्रता, रंक-राजा, काशी-मगध, गंगा-कर्मनाशा, मारवाड़-मालवा, ब्राह्मण-कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य ये सभी ब्रह्मा द्वारा रची सृष्टि में हैं.

किंतु ब्रह्मा द्वारा रचित वेद-शास्त्रों ने ही उनके गुण-दोषों का बंटवारा करके उनकी प्रकृति निर्धारित कर दी है.

दोहा :

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥6॥

भावार्थ:-विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है किन्तु संत तो हंस जैसे कुशल होते हैं. वे संसार के दोष रूपी जल को छोड़कर गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं.

चौपाई :

अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥
काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं॥1॥

भावार्थ:-विधाता जब हंस के समान विवेक देते हैं, तब मन दोषों को छोड़कर गुणों की ओर प्रवृत होता है. फिर भी काल स्वभाव और कर्म कभी-कभी इतने प्रबल हो जाते हैं कि कई बार भले लोग भी माया के वश में होकर भलाई से चूक जाते हैं.

सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू ॥2॥

भावार्थ:- भगवान की भक्ति से उस भूल को सुधारने का ज्ञान मिलता है. दुःख-दोषों को मिटाकर निर्मल प्राप्त होता है. वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं, परन्तु उनका कभी भंग न होने वाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू ॥3॥

भावार्थ:- बहुरूपिए भी यदि साधु का वेष बना लें तो संसार उनके वेष के प्रभाव से उनकी वंदना करता है, परन्तु एक न एक दिन उनकी प्रकृति सामने आ ही जाती है. उनका कपट सदा के लिए छिप सकता जैसे कालनेमि, रावण और राहु का सत्य सामने आ ही गया.

किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू ॥4॥

भावार्थ:- साधु यदि असुंदर वेष बना लें तब भी उनके सम्मान में कमी नहीं होती. जैसे जाम्बवान्‌जी और हनुमान्‌जी भालू और बानर के वेष में भी वंदनीय औऱ पूजनीय हैं. कुसंग से हानि और सत्संग से लाभ होता है, यह बात शास्त्रों में कही गई और सभी इसे समझ सकते हैं.

गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥
साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं ॥5॥

भावार्थ:- धूल ऊपर की ओर जाने वाले पवन के संपर्क में आती है तो आकाश पर चढ़ जाती है और जब नीचे की ओर गति करने वाले जल के संपर्क में आती है तो कीचड़ में मिल जाती है.

साधु-सज्जनों के घर में रहने वाले तोता-मैना अच्छी संगति के कारण राम-राम सुमिरते हैं और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं. जैसा परिवेश होगा, वैसी ही प्रवृति हो जाएगी.

धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥
सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता॥6॥

भावार्थ:- धुआँ कुसंगति करता है तो कालिख कहलाता है पर जब धुआँ अच्छी संगति में आता है तो सुंदर स्याही बनकर पुराण लिखने के काम आता है. वही धुआँ जल, अग्नि और पवन के संग से बादल होकर जगत को जीवन देने वाला बन जाता है.

दोहा :

ग्रह भेजष जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग ॥7(क)॥

भावार्थ:- ग्रह, औषधि, जल, वायु और वस्त्र- ये सब भी कुसंग और सुसंग पाकर संसार में बुरे और भले पदार्थ हो जाते हैं. इसका अंतर चतुर एवं विचारशील व्यक्ति ही समझ पाते हैं.

सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥7(ख)॥

भावार्थ:- महीने के दोनों पखवाड़ों में उजाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाता ने इनके नामों में भेद कर दिया है. एक का नाम शुक्ल और दूसरे का नाम कृष्ण रख दिया.

एक को चन्द्रमा को बढ़ाने वाला और दूसरे को चंद्रमा को घटाने वाला समझकर जगत ने एक को सुयश और दूसरे को अपयश दे दिया.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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