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श्री दुर्गा सप्तशती पाठ का महत्त्वः इसका पाठ क्यों करना चाहिए

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ का महत्त्वः इसका पाठ क्यों करना चाहिए

श्री दुर्गा सप्तशती का महत्त्व: व्याधकर्मा की कहानी और पापों का नाश

एक बार ऋषियों का समूह सूत जी के समीप पहुंचा और सबने मिलकर आग्रह किया—
“महाराज! आप हम लोगों को यह बतलाने की कृपा करें कि किस स्तोत्र के पाठ करने से वेदों के पाठ करने का फल प्राप्त होता है और सारे पाप समाप्त हो जाते हैं?”

पापी के उद्धार की अद्भुत कथाः श्री दुर्गा सप्तशती का महत्त्व

सूत जी बोले —
“श्री दुर्गा सप्तशती का महत्त्व अत्यंत गहरा है। आदि चरित का पाठ करने से वेदपाठ का फल मिलता है और सारे पाप नष्ट होते हैं। इस विषय में आपको एक कथा सुनाता हूं। राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक ब्राह्मण रहता था। वह पूजा-पाठ करके अपनी जीविका चलाता था। उसकी स्त्री का नाम कामिनी था।

एक बार वह ब्राह्मण श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के लिए नगर से बाहर गया हुआ था। इधर उसकी स्त्री कामिनी बुरे कर्मों में लग गयी।

कामिनी अच्छे चरित्र की नहीं थी। पति के न रहने पर वह दुराचरण में पड़ गयी। इस कुकर्म से उसे एक पुत्र हुआ, जो आगे चलकर बुरी आदतों वाला निकला।

उस पुत्र का नाम व्याधकर्मा पड़ा। व्याधकर्मा ब्राह्मण होकर भी शास्त्रों से दूर था। उसे शिक्षा-दीक्षा से कोई सरोकार नहीं था। वह बड़ा धूर्त था और नाम के अनुरूप पापकर्मों में लगा रहता था।”

विन्ध्याचल पर ब्राह्मण का चण्डीपाठ

कालांतर में ब्राह्मण ने अपनी स्त्री और पुत्र को निरंतर निन्दित कर्म करते देखकर घर से निकाल दिया। इसके बाद वह स्वयं विन्ध्याचल पर्वत पर चला गया।

श्री दुर्गा सप्तशती का महत्त्व अद्भुत है। इसे समस्त पापों का नाश करने वाला माना गया है.
व्याधकर्मा विंध्याचल पर्वत पर मंदिर में श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहा है.

विंध्य पर्वत पर जाकर वह धर्म में तत्पर रहने लगा और प्रतिदिन चण्डीपाठ करता था। मां जगदम्बा की कृपा से वह जीवन-मुक्त हो गया।

इधर कामिनी और व्याधकर्मा एक केवट के घर जाकर रहने लगे। वहां रहकर भी दोनों चोरी, व्याभिचार और बुरे कर्मों में लगे रहे। इसी प्रकार व्याधकर्मा धीरे-धीरे घोर पापी बन गया।

व्याधकर्मा कैसे बदला?

एक दिन दैवयोग से व्याधकर्मा देवी के मंदिर में पहुंच गया। वहां एक श्रेष्ठ ब्राह्मण श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे थे। पाठ अभी आरंभ ही हुआ था।

यह अंश प्रथम चरित या आदि चरित कहा जाता है। व्याधकर्मा उसे ध्यान से सुनने लगा। उसने पहले कभी दुर्गा सप्तशती का पाठ न देखा था, न सुना था। लेकिन इस बार उसके मन में अद्भुत आनंद उत्पन्न हुआ।

प्रथम अध्याय समाप्त होते-होते व्याधकर्मा की बुद्धि निर्मल होने लगी। उसके भीतर धर्मभाव जाग गया। परिणाम यह हुआ कि वह उसी समय दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले ब्राह्मण का शिष्य बन गया।

गुरु की आज्ञा और मंत्र का प्रभाव

शिष्य बनने के बाद व्याधकर्मा ने अपना सारा धन अपने गुरु को दान दे दिया। गुरु ने उसे देवी के बीज मंत्र का जप करने की आज्ञा दी।

बीज मंत्र के प्रभाव से उसके सारे पाप कीड़ों के रूप में शरीर से निकलने लगे। लगातार तीन वर्षों तक जप करते-करते वह पापमुक्त हो गया और श्रेष्ठ ब्राह्मण बन गया।

मंत्र-जप और आदि चरित का पाठ करते हुए बारह वर्ष बीत गए। इसके बाद वह काशी पहुंचा। वहां उसने मुनियों और देवताओं से पूजित महादेवी अन्नपूर्णा का विधिवत पूजन किया।

मां अन्नपूर्णा ने दी विद्या

व्याधकर्मा की एक ही प्रार्थना थी— “मां, मुझे विद्या प्रदान करें।”

उसने प्रार्थना की—
“हे काशीपुरी की अधीश्वरी अन्नपूर्णेश्वरी! आप समस्त पापों को नष्ट कर पवित्र करने वाली हैं। महान भयों को दूर करने वाली, विश्व का भरण-पोषण करने वाली और सब पर अनुग्रह करने वाली हे माता! मुझे विद्या प्रदान करें।”

वह मां अन्नपूर्णा की स्तुति करते-करते ध्यानमग्न होकर वहीं सो गया। स्वप्न में उसके सामने मां अन्नपूर्णा प्रकट हुईं। उन्होंने उसे ऋग्वेद का ज्ञान प्रदान किया और फिर अंतर्धान हो गयीं।

बाद में श्रेष्ठ विद्या प्राप्त करके व्याधकर्मा राजा विक्रमादित्य के यज्ञ का आचार्य बना। यज्ञ के बाद उसने योग धारण किया और हिमालय चला गया।

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आदि चरित से श्री दुर्गा सप्तशती का महत्त्व

सूत जी बोले—
“ऋषिगणों! आपके प्रश्न का उत्तर यही है कि देवी के पुण्यमय आदि चरित स्तोत्र के पाठ से वेदों के पाठ का फल प्राप्त होता है और सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। श्री दुर्गा सप्तशती का महत्त्व बताना तो देवताओं के लिए भी असंभव है। इसलिए आप इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करें। व्याधकर्मा जैसे पापी ने भी इसी प्रभाव से परम सिद्धि प्राप्त की।”

Durga Saptshati ke path ka fal aur mahattva
श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ से प्रसन्न होकर माता व्याधकर्मा के सामने प्रकट हुईं और उसे प्रसाद ग्रहण कराया.

भविष्य पुराण के प्रतिसर्गपर्व के द्वितीय खंड के सत्रहवें अध्याय में श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्त्व जैसा बताया गया है वह कथा आपने ऊपर पढ़ी।

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श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ कब करना चाहिए

साधक कहते हैं कि श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्त्व या महिमा ऐसी है कि इसे जब भी करें लाभ होगा। फिर भी नवरात्रि का समय इसके लिए उत्तम कहा गया है। श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ के कुछ नियम भी हैं जिनका पालन करने पर इसका महत्त्व कई गुना बढ़ जाता है। उसके बारे में भी जानना चाहिए। हम वह विधि भी विस्तार से बताएंगे। उसके लिए इस पोस्ट के आखिर में एक लिंक है। वहां जाकर आप दुर्गा सप्तशती के पाठ की विधि की जानकारी ले सकते हैं।

श्री दुर्गा सप्तशती में सात सौ श्लोक हैं। इसीलिए इसे सप्तशती कहा जाता है। सप्त मतलब सात और शती यानी सौ। इन सात सौ श्लोकों में माता की महिमा, उनके प्रकट होने की कथा, विभिन्न असुरों का नाश और देवताओं के कल्याण के लिए किए गए सारे कार्यों का वर्णन किया गया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि माँ दुर्गा में प्रत्येक देवी-देवता की शक्ति समाहित है। यह पूरी कथा तेरह अध्यायों में वर्णित है। इसलिए श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्त्व और अधिक हो जाता है।

यदि आप मां दुर्गा के भक्त हैं तो आपको प्रभु शरणं पर यह सफर बहुत आनंददायक और भक्तिभाव से विभोर करने वाला लगेगा। हम एक के बाद लगभग 20 कथाएं देते रहेंगे ताकि आप मां दुर्गा की भक्ति में लीन रहें। सारी कथाएं पढ़ें और शेयर करें।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ की सही विधि

श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्त्व और सीखः

  • श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनुष्य के पापों का नाश करने वाला माना गया है।

  • आदि चरित का श्रवण भी मन को शुद्ध करने वाला है।

  • सच्चे गुरु, मंत्र-जप और माता की कृपा से जीवन बदल सकता है।

  • कोई भी व्यक्ति चाहे कितना ही पतित क्यों न हो, देवी कृपा से उसका उद्धार संभव है।

 

संकलन व संपादनः

राजन प्रकाश

(यह पोस्ट भविष्य पुराण की कथा पर आधारित है।  इसे धर्म वह कर्मकांड का ज्ञान रखने वाले विद्वान से परामर्श के बाद तैयार किया गया है। पाठक मूल कथा के लिए भविष्य पुराण का संदर्भ लें.)

श्री दुर्गा सप्तशती का महत्त्व आपने पढ़ा। इसके पाठ का जितना महत्त्व है उतना ही इसके सुनाने का भी है। ऐसे लोगों को जो पढ़ नहीं सकते या घर के बड़े बुजुर्गों को श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्त्व बताती इस कथा को सस्वर यानी बोल-बोलकर पढ़कर सुनाएं। उसका लाभ दोगुना हो जाता है।

श्री दुर्गा सप्तशती के महत्त्व का पाठ और श्रवण करने वाले सभी भक्तजनों पर  माँ जगदंबा की असीम कृपा बनी रहे।

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