शिवपुराणः वीरभद्र को महादेव का आदेश, यज्ञभंग और दोषियों को दंड, वीरभद्र-श्रीहरि युद्ध

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दक्ष के यज्ञ में समस्त देवों के समक्ष सतीजी ने स्वयं को योगाग्नि में भस्म कर लिया. तो सतीजी के साथ आए शिवगणों ने विलाप करते हुए यज्ञ में उत्पात मचाना शुरू किया.
भृगु ने यज्ञरक्षक पैदा किए. उन रक्षकों ने शिवगणों को मार भगाया. शिवगण कैलास पहुंचे और भोलेनाथ को सारी बात विस्तार से बता दीं. पत्नी के दाह और सेवकों के संग हिंसा से रूद्र भड़क उठे.
क्रोधाग्नि में जलते शिवजी ने अपनी शक्तियां संगठित की और एक जटा को उखाड़कर जोर से पर्वत पर दे मारा. जटा के दो भाग हुए. एक से वीरभद्र प्रकट हुए और दूसरे से महाकाली.
शिवजी ने वीरभद्र को आदेश दिया कि तत्काल यज्ञशाला में जाओ और दक्ष को दंड दो. उसकी रक्षा में यदि स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और यम भी आ जाएं तो निःसंकोच उनसे भी युद्ध करो. किसी के भी अनुनय-विनय को मत सुनना.शिवजी की आज्ञा से वीरभद्र पराक्रमी गणों की सेना साथ लेकर चले. उनके चलने से पृथ्वी कांपने लगी. प्रत्येक कदम पर विचलित होकर पृथ्वी करवट बदलने लगती और यज्ञशाला में उलट-पुलट होने लगती. देवता वहां से भागने लगे.
दक्ष भय से कांप रहे थे. उन्होंने श्रीविष्णुजी के पांव पकड़ लिए और कहा- प्रभु मैं आपका शरणागत हूं. आप पर संसार के पोषण का दायित्व है. यज्ञ भंग हो गया तो अनिष्ट होगा. मुझे आपके सामर्थ्य पर विश्वास है. आप मेरी रक्षा करें.
श्रीहरि बोले- दक्ष शिवजी के प्रकोप से आपकी रक्षा कर पाना संसार में किसी के भी वश का नहीं है. आपको आपके कृत्यों का दंड तो मिलेगा ही. यह दंड दारिद्रय, मृत्यु या भय किसी भी रूप में हो सकता है. अपना कल्याण चाहते हो तो शिवजी के चरण पकड़ लो.
इससे पहले कि दक्ष श्रीहरि के परामर्श पर कुछ निर्णय कर पाते वीरभद्र वहां पहुंच गए. दक्ष को मृत्यु सामने दिखाई पड़ी. उसने श्रीहरि से कहा- आपके भरोसे यज्ञ का आरंभ किया था. अब शरणागत की रक्षा करिए.
श्रीहरि बोले- शरणागत की रक्षा के लिए मैं वचनबद्ध हूं किंतु तुम्हें बता दूं कि शिवद्रोही की रक्षा समस्त देवता मिलकर नहीं कर सकते. वीरभद्र का सामना कोई नहीं कर सकता. नैमिषारण्य में वीरभद्र ने अकेले सभी देवों को पराजित कर भगाया था.इंद्र भागकर देवगुरू बृहस्पति के पास पहुंचे और रक्षा का उपाय पूछा. बृहस्पति बोले- जहां शिव का अपमान हो रहा था, वहां आप सब उपस्थित थे. इस कारण सबको दंड भोगना पड़ेगा. प्राणों पर संकट देख सारे ऋषि विष्णुजी की ओर भागे.
उन्होंने कहा- नारायण आप यज्ञस्वरूप हैं. आपने यज्ञ और दक्ष की रक्षा न की तो वेद की मर्यादा खंडित होगी. श्रीहरि विवश थे. ब्रह्माजी के साथ वह यज्ञ की रक्षा के लिए बढ़े.
वीरभद्र दक्ष को खोज रहे थे. तभी उन्होंने श्रीविष्णु को शिवद्रोहियों की सहायता के लिए अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित संहारक की मुद्रा में देखा तो आश्चर्य औऱ क्रोध दोनों में भर गए.
वीरभद्र ने श्रीविष्णु को इसके लिए फटकारना और भला-बुरा कहना शुरू किया. फिर क्रोध में भरकर वीरभद्र ने कहा- तो मैं यह समझूं कि यह सब आपकी शह पर हुआ है. आप महादेव के द्रोही हैं.
विष्णुजी बोले- वीरभद्र तुम गलत समझ रहे हो. तुम स्वयं शिवजी के अंश हो. उनके प्रमुख सेवक हो लेकिन शिवजी का सम्मान तुमसे ज्यादा मैं करता हूं. वह मेरे गुरू हैं. उनके अपमान की बात सोचना भी पाप है.
शिवद्रोह की तो कल्पना भी नहीं कर सकता. परंतु यज्ञों की रक्षा का भार स्वयं शिवजी ने ही मुझे दे रखा है. दक्ष ने कर्मकांड पूरे किए हैं इसलिए शिवजी द्वारा दिए दायित्व की पूर्ति के लिए मैं यज्ञ रक्षा को वचनबद्ध हूं.वीरभद्र का क्रोध शांत हुआ. वह बोले- मैं जानता हूं, आपमें और शिवजी में कोई अंतर नहीं. परंतु जैसे आप शिवजी के वचन का पालन कर रहे हैं वैसे मैं भी उनका आदेश मान रहा हूं. मुझे आज किसी भी विनती को अस्वीकार करने का आदेश है.
विष्णुजी वीरभद्र की बात समझ गए. उन्होंने कहा- शिवद्रोहियों को दंड मिलता ही है. तुम मुझ पर सबसे भयानक अस्त्रों का प्रयोगकर मुझे घायल करो. घायल होकर ही मैं स्थान छोड़ सकता हूं. विष्णुजी के सुझाव पर वीरभद्र ने उन पर प्रहार किया.
सुदर्शन चक्र को स्तंभित कर दिया. शांर्ग धनुष के तीन टुकड़े करके अस्त्र-शस्त्र विहीनकर शीघ्र ही घायल कर दिया. विष्णुजी वहां से अंतर्धान होने को तैयार हो गए. वीरभद्र ने दक्ष को दंडित करक यज्ञ का नाश किया और शिवजी को सारी सूचना दी.
ब्रह्माजी के मुख से यह कथा सुनकर नारदजी ने पूछा- जब विष्णुजी को दक्ष और शिवजी की कटुता का पता था. दक्ष शिवजी को अपमानित करने को आतुर है, फिर भी वह उस यज्ञ में क्यों गए? शिवद्रोह के भागी क्यों बने?
ब्रह्माजी ने कहा- यह सब जो हुआ इसके पीछे राजा क्षुव और दधीचि की कथा है. जिसके कारण श्रीहरि को सब जानते हुए भी इसका भागी बनना पड़ा. क्षुव और दधीचि के बैर में श्रीहरि आ फंसे थे. यह उसी का परिणाम है.
(शिव पुराण रूद्र संहिता, सती खंड-2) क्रमशः जारी….
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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