शिव-पार्वती कथाः शिवकृपा से पुत्र हुआ अचानक धनवान, लालची पिता ने लेने चाहे पुत्र के ही प्राण. भाग-4

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पिछली कथा से आगे
वररुचि पिशाच कानभूति को कथा सुनाता रहा. एक बार भगवान शिव और पार्वती आकाश विहार करने को निकले. घूमते घामते वे समुद्र तट पर बसी चिंचिनी नामक नगरी के ऊपर से गुजरे.
माता पार्वती ने तीन स्त्रियों को देखा. तीनों एक बच्चे को अपनी अपनी गोद में लेकर बारी-बारी से उसे खिला रही थीं और प्रेम से गदगद हो रही थीं. यह अनुपम दृश्य देखकर पार्वतीजी बहुत खुश हुईं.
शिवजी से बोलीं- देखिये तो भगवन, ये तीनों बहनें उस बच्चे को कैसे स्नेह प्रेम से खिला रही हैं. इन औरतों को विश्वास है कि यह बच्चा बड़ा होकर उनका लालन-पालन करेगा, देखभाल करेगा. कितनी आशायें उन्होंने इस बच्चे से पाल रखी हैं.
भगवन,अब आप इन नारियों पर दया कर कुछ ऐसा कर दें ताकि यह बच्चा आगे चलकर अपनी माताओं का भली भांति, ध्यान रख सके. शिवजी बोले- देवी! इस बच्चे ने पिछले जन्म में अपनी पत्नी के साथ मेरी बड़ी आराधना की है.
तब इसकी पत्नी थी पाटली. इस समय वह राजा महेंद्र वर्मा की बेटी है. इस जन्म में भी वह फिर इसकी पत्नी होगी. तुम कह रही हो, तो मैं इन दुखियारी माताओं को कुछ आश्वासन तो अभी दिए देता हूं. वैसे मैं इनकी थोड़ी कथा भी बता देता हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हरिद्वार के कनखल में एक ब्राह्मण ने तप करके तीन पुत्र प्राप्त किये. वे तीनों पुत्र माता-पिता के मरने के बाद पढाई करने राजगृह पहुंचे. पढाई करके वे दक्षिण की ओर चल पड़े.
यहां उन्होंने कुमार कार्तिकेय का दर्शन किया. समुद्र तट पर बने चिंचनी नगर पहुंचे और वहां भोजिक नाम के एक ब्राह्मण के घर रहने लगे. उस ब्राह्मण के तीन कन्याएँ थीं.
उसने इन तीनों का विवाह उनसे कर दिया और खुद हरिद्वार की ओर चला गया. वे तीनों अपने श्वसुर के घर में रहने लगे. कुछ समय बाद भीषण अकाल पड़ा. तीनों ब्राह्मण अपनी पत्नियों को छोड़ कर भाग गए.
पत्नियाँ घर में अकेली रह गयी. उनमें से मंझली बहन गर्भवती थी. वे तीनों बहनें अपने पिता के एक मित्र यज्ञदत्त के घर चली आई तथा संकट का यह जीवन काल अपने अपने पतियों का ध्यान करती हुई बिताने लगीं.
कुछ समय बीतने पर मंझली बहिन ने एक पुत्र को जन्म दिया. तीनों बहनें इस नवजात बच्चे के प्रति अत्यधिक ममता से भर उठीं हैं और अपना स्नेह उस पर उड़ेल रही हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भगवन शिव पार्वती को यह कहानी सुना ही रहे थे कि तभी धरती पर रात हो गयी. तीनों बहनें उस बच्चे को अपनी गोद में लिए हुए सो गईं. तीनों ने एक साथ एक सपना देखा.
उन्होंने देखा कि भगवान् शिव उनसे कह रहे हैं कि तुम अपने इस बच्चे से बार-बार पुत्रक, पुत्रक कहती हो, तो यह पुत्रक नाम से ही प्रसिद्ध होगा. हर दिन इसके सिरहाने एक लाख स्वर्णमुद्रा मिलती रहेंगी और आगे चल कर यह राजा बनेगा.
पुत्रक बड़ा होने लगा. एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ प्रतिदिन मिलती रहीं. सुख के दिन लौट आये. पुत्रक अब राजा बन गया था. वह रोज ढेरों स्वर्णमुद्राएँ दान में देता था. धीरे धीरे यह बात हर और फैल गयी और पुत्रक की प्रसिद्धि भी.
ज्यादा दिन नहीं बीते थे कि ये बात उसके भागे हुए पिता तथा उसके छोटे बड़े भाइयों तक भी पहुंची और वे अपनी ससुराल में लौट आये. कुछ दिन अपने पुत्र के वैभव का आनंद उठाते हुए सुख से रहे, पर शीघ्र ही उनके मन में फिर पाप जगने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वे राजा पुत्रक को विंध्यवासिनी देवी के दर्शन कराने के बहाने मंदिर ले गए. उनकी मंशा उसे मारकर उसका राज्य हड़पने की थी. मंदिर के भीतर उन्होंने वधिको को पहले ही लगा रखा था. पुत्रक को देवी के दर्शन करने पहले भेज दिया.
बधिकों ने जब घेरकर पुत्रक का वध करने का प्रयास किया तो पुत्रक ने कहा- मैं तो मरने वाला ही हूं इसलिए मुझे सच बताओ, तुम लोग मुझे क्यों मार रहे हो?
बधिकों ने कहा- तुम्हारे पिता और उसके भाइयों ने हमें सोना देकर तुम्हारी हत्या की सुपारी दी है. पुत्रक ने कहा- इतनी सी बात है तो लो, मैं तुम्हें सारे अमूल्य आभूषण दे देता हूँ. उनसे ज्यादा धन से सकता हूं. तुम लोग मुझे छोड़ दो.
मैं किसी से कुछ न कहूँगा और यहाँ से चुपचाप चला जाऊंगा. वधिकों को पहले से कई गुना ज्यादा धन मिल रहा था वह भी खून बहाये बिना. बधिकों ने उसकी बात मान ली और उसे गुप्त रास्ते से निकाला.
फिर पुत्रक और उसके लोभी परिजनों का क्या हुआ. अगली पोस्ट में पढ़िए.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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