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शिव-पार्वती कथाः पिता द्वारा हत्या के प्रयास से पुत्रक हुआ विरक्त, भाग्य ने दिलाया पत्नी और पाटलीपुत्र. भाग-5

शिव-पार्वती कथाः पिता द्वारा हत्या के प्रयास से पुत्रक हुआ विरक्त, भाग्य ने दिलाया पत्नी और पाटलीपुत्र. भाग-5


पिछली कथा से आगे...
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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बधिकों ने किसी पशु का रक्त अपने हथियारों पर लगा कर सबूत दिखाया और उन्होंने पुत्रक के पिता और उसके भाइयों से झूठ कह दिया कि हमने पुत्रक को मार डाला है.

वे तीनों प्रसन्नमन और संतुष्ट होकर चिन्चनी नगरी लौट आए. बहाना बनाया कि पुत्रक कहीं डूब मरा. पुत्रक के मंत्रियों को उन पर संदेह हुआ और मंत्रियों ने उन तीनों को मरवा डाला.

इधर पुत्रक ने रिश्ते नाते की यह दशा देखी तो संसार की मोह माया त्यागकर विन्ध्य के घने जंगलों में चला गया. वहां घूमते हुए उसे दो राक्षसों को लड़ने के लिये एक दूसरे को ललकारते देखा.

उसने राक्षसों से पूछा- तुम लोग कौन हो और क्यों लड़ना चाहते हो? राक्षसों ने कहा – हम दोनों मयासुर के लड़के हैं. हमारे पास पिता के छोड़े धन के रूप में एक बरतन, एक लाठी और दो खडाऊं हैं.

हम दोनों में जो बलवान होगा, वह इस धन को प्राप्त करेगा. इसलिए अब हम अपने इस धन के लिए युद्ध करने वाले हैं. पुत्रक को उनकी बात सुन कर हंसी आ गयी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पुत्रक ने उनसे कहा, बस इतने से धन के लिए तुम दोनों भाई एक दूसरे को मारने पर उतर आये? क्या ये वस्तुएं जीवन और आपसी रिश्तों से भी बड़ी और ज्यादा महत्व रखती हैं.

राक्षसों ने कहा- जिनके लिए हम लड़ रहे हैं ऐसी-वैसी चीजें नहीं हैं. लाठी से जो लिखा जाय वह सत्य हो जाता है. पात्र में जिस प्रकार के भोजन का ध्यान करें, वह उसमें भर जाता है और खडाऊं पहनकर मनुष्य हवा पर चल सकता है.

यह सुन कर पुत्रक ने कहा- इन वस्तुओं के लिए परस्पर युद्ध करके किसी के प्राण लेना तुम लोगों के लिए उचित नहीं है. तुम दोनों में से दौड़ने में जो आगे रहे, वह तीनों वस्तुए ले ले.

वे दोनों राक्षस उसकी बात मान कर दौड़ पड़े. जैसे ही वे दौड़े पुत्रक ने उनकी लाठी और पात्र हाथ मे उठाया और खड़ाउ पहन कर आकाश में उड़ गया. दोनों राक्षस बुद्धु बन देखते रह गये.

पुत्रक आकाश में उड़कर नीचे उतरा तो एकांत में एक पुराना सा मकान दिखा. वह उसी में चल गया. मकान में एक बूढ़ी औरत रहती थी. बुढ़िया को कुछ धन देकर उसी मकान में छुपकर रहने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक बार बातचीत करते हुए बुढ़िया उससे बोली- ऐसे ही रहा तो तेरी शादी की उम्र निकल जायेगी, अभी भी शादी की उम्र है. बेटा मैं चाहती हूँ कि तेरे लिए कोई अच्छी सी बहू मिल जाए.

इस राज्य के राजा की कन्या बड़ी सुंदर है. वह तेरे ही योग्य है, पर उसे रनिवास में बड़े कड़े पहरे में रखा जाता है. कोई जुगत ही नहीं कि उससे तेरा मेल हो सके.

बुढ़िया की बातें सुन-सुन कर पुत्रक के मन में राजकुमारी पाटली के लिए आकर्षण औक उत्सुकता जाग गयी. वह ख़ड़ाऊ पहन कर आकाश मार्ग से रनिवास मे घुस गया.

किसी बहुत ऊंचे पहाड़ की चोटी जैसी ऊंचाई पर बने महल में वह आसानी से घुस गया. उसने खिड़की से भीतर जाकर रात के समय एकांत में सोई हुई पाटली को देखा.

खिड़की से आती चांदनी उस पर पड़ रही थी. उस मद्धिम नरम रोशनी में थककर सोयी हुई वह अति सुंदरी रति जैसी लग रही थी.पुत्रक उसके पास पहुंचा और उसके केश सहलाने लगा. राजकुमारी जाग गई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पाटली अचानक एक पुरुष को अपने सामने देखकर चौंकी और कुछ लज्जित भी हुई लेकिन वह इतने पहरे में से बचकर उस तक आ पहुंचा यह सोचकर क्रोध न किया. दोनों में बातचीत हुई, जल्द ही बात बढ गयी.

दोनों ने गन्धर्व विवाह कर लिया. फिर दोनों हर रात मिलने लगे. कुछ दिनों बाद पाटली के शरीर पर पर कुछ निशान देख कर रनिवास के अनुभवी पहरेदारों ने राजा को खबर की.

राजा ने एक चतुर स्त्री को राजकुमारी की निगरानी के लिए तैनात कर दिया. उस गुप्चचर स्त्री ने पुत्रक को रात में राजकुमारी से मिलते देख लिया.

वह स्त्री शोर नहीं मचा सकती थी नहीं तो राजकुमारी की ही हंसाई होती. सो उसने चोरी से पुत्रक के वस्त्रों पर महावर से चिन्ह बना दिए ताकि सुबह अलग से पहचान लिया जाए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अगले दिन राजा के सैनिकों ने खोजते खोजते वस्त्रों पर लगे महावर के चिन्हों के द्वारा पुत्रक को पहचान कर पकड़ लिया और राजा के सामने ला खड़ा किया.

पुत्रक समझ गया मामला बिगड़ चुका है इसलिए वह आनन फानन में खडाऊं पहन आकाश में उड़ गया. सीधा रनिवास पहुंचा और पाटली से बोला- तुम्हारे पिता को हमारा रहस्य पता चल गया है, आओ हम आकाश में उड़ चलें.

पाटली तुरंत तैयार हो गयी और पुत्रक उसे गोद में उठाये हुए उड़ता-उड़ता गंगा के किनारे पहुंचा. पुत्रक अपनी प्रिया पाटली को अपने दिव्य पात्र से मनचाहा भोजन कराता. यहां दोनों सुख से गंगा तट पर रहने लगे.

कुछ दिनों बाद पाटली ने गंगा के तट पर ही स्थायी निवास करने की इच्छा प्रकट की, पुत्रक ने मय राक्षस की लाठी से वहां एक नगर लिख दिया. तत्काल पाटलिपुत्र नगर बस गया.

(कुछ ही देर में पढ़ें शिवजी द्वारा सुनाई गई कथा.)

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