शिव-पार्वती कथाः पिशाच से शिवगण ने सुनी तिलोत्तमा के शाप की कथा, शिवजी ने गोपनीय रूप से पार्वतीजी को सुनाई थी यह कथा. भाग-6

शिव-पार्वती रोचक कथा शृंखला की यह छठी कथा है. हमने पहले भी एक कथा प्रकाशित की थी. पूरी कथा के लिए देखें एप्प- Mahadev Shiv Shambhu.
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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पिछली कथा से आगे…
गुणाढ्य ने भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को सुनाई गयी जिस कथा को कानभूति से सुनकर पैशाची भाषा में लिखी थी उसका जो थोड़ा सा हिस्सा सातवाहन को मिला, कथा बहुत विशाल है. कथा का आरंभ इस प्रकार है
किसी समय में वत्स नाम का एक सुंदर देश हुआ करता था. कौशाम्बी उस देश की सबसे सजी-धजी नगरी थी. वत्स का राजा शतानीक था. वह पांडव के वंश में पैदा हुआ था.
शतानीक की कोई संतान नहीं थी. इस दुख से दुखी होकर शांडिल्य मुनि के आश्रम में गया तो उन्होंने उसकी रानी विष्णुमति को मंत्र फूंक कर एक कटोरा खीर खाने को दी. खीर खाने से रानी को एक बेटा हुआ.
बेटे का नाम सहस्रानीक रखा गया. एक बार शतानीक इंद्र के बुलावे पर अपने मंत्री सुप्रतीक और सेनापति युगंधार को राज काज का अधिकार देकर देव-असुर संग्राम में लड़ने चले गये.
इस संघर्ष में शतानीक वीरगति पा गए तो सहस्रानीक गद्दी पर बैठा. इंद्र ने उसे स्वर्ग बुलाया. स्वर्ग में वह अप्सराओं के साथ देवताओं को आज़ादी से रमण करते देखा तो उसका नारी के प्रति आकर्षण बढ गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इंद्र ने कहा कि उसके योग्य एक स्त्री पृथ्वी पर पैदा हो चुकी है. इंद्र ने बताया एक बार मैं किसी काम से ब्रह्मा के पास गया. विधूम नामक वसु भी मेरे पीछे-पीछे लग गया.
जब हम वहां पहुँचे तो अलंवसा नाम की एक अप्सरा ब्रह्मा से मिलने आई हुई थी. वसु ने अलंवसा को और अलंवसा ने वसु को देखा. अलंवसा और वसु दोनों ही एक-दूसरे पर मुग्ध हो गये.
ब्रम्हा को यह अच्छा नहीं लगा. मुझे संकेत किया तो मैने दोनों को श्राप दे दिया कि जाओ तुम दोनों धरती पर मनुष्य योनि में पैदा हो. अब वसु के रुप में तो तुम हो अलंवसा राजा कृतवर्मा की बेटी मृगावती बन के पैदा हुई है.
मृगावती तुम्हारी ही पत्नी बनेगी. सहस्रानीक स्वर्ग से घर वापस चल दिया. उसके दिमाग में मृगावती ही घूम रही थी. रास्ते में तिलोत्तमा नाम की अप्सरा ने उसे पुकारा मगर वह तो मृगावती के ध्यान में मगन था.
वह तिलोत्तमा की बात न सुन सका न जबाव दिया. तिलोत्तमा ने तुरंत श्राप दे दिया, जिसके ध्यान में तूने मेरी बात नहीं सुनी तुझे उसका चौदह साल वियोग झेलना होगा.
राजा यह श्राप भी नहीं सुन पाया. भले उसके सारथी ने सुन लिया. सहस्त्रनीक ने राजा कृतवर्मा के पास मृगावती से विवाह का प्रस्ताव रखा फिर मृगावती का विवाह सहस्रानीक के साथ हो गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उधर सहस्त्रानीक के मंत्री युगंधर के बेटा हुआ जिसका नाम योगांध्यारायण रखा गया. उसके बाद सेनापति सुप्रतीक के भी लड़का हुआ जिसका नाम रुक्मनवान हुआ. रानी मृगावती भी गर्भवती थी.
गर्भवती मृगावती के मन में अचानक एक दिन मनुष्य के खून में स्नान की इच्छा हुई. उसने राजा से कहा. राजा रानी को नाराज नहीं करना चाहता था इसलिए गाढे लाल रंग से एक तालाब को लाल कर दिया.
रानी खून का तालाब समझ उसमें नहाने लगी. उधर ऊपर उड़ रहा विशालकाय बाज रानी को मांस का टुकड़ा समझकर उसे उड़ा ले गया. राजा ने जब यह सारी कथा सुनी तो वह बेहोश हो गया.
राजा के सारथी ने बताया कि हो न हो यह सब तिलोत्तमा के दिये श्राप के कारण हुआ है. पक्षी ने रानी को ले जाकर उदयाचल पहाड़ पर छोड़ दिया. वहां सुस्त पड़ी रानी को एक अजगर निगलने आया.
लेकिन मौके पर एक सुंदर पुरुष ने आकर अजगर को मार डाला. रानी इन सब से इतनी दुखी हुई जान देने के लिये पागल हाथी के सामने खड़ी हो गई लेकिन हाथी ने भी उससे किनारा कर लिया.
रानी अपना यह दुर्भाग्य देख पति की याद में जोर-जोर से रोने लगी. वहीं कहीं फूल चुनने के लिये आये एक बालक ने उसे देख लिया. वह रानी को अपने गुरु जमदग्नि के आश्रम में ले गया. रानी जमदग्नि के आश्रम में रहने लगी.
समय आने पर रानी ने बेटे को जन्म दिया. आकाशवाणी हुई कि यह उदयन के नाम से प्रसिद्ध होगा और आगे चल कर विद्याधरों का राजा बनेगा. जमदग्नि ने उदयन को क्षत्रिय धर्म की पूरी शिक्षा दी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जब उदयन थोड़ा बड़ा हुआ तो रानी ने अपने हाथ का एक कंगन उदयन को पहना दिया. उस पर राजा सहस्रनीक लिखा हुआ था. एक दिन बालक उदयन ने जंगल में मदारी को सांप पकड़ते हुये देखा. उसे यह बात अच्छी न लगी.
उसने मदारी से कहा सांप को पकड़ना पाप है, इसे छोड़ दो. मदारी बोला, पहले ही मेरा एक सांप मर गया है. अब मेरे पास कोई सांप नहीं है. मेरी तो रोजी-रोटी इसी पर है. इसे छोड़ दूंगा तो कैसे तमाशा दिखाउंगा. कैसे कमाउंगा, क्या खाउंगा.
उदयन ने मदारी पर दया करके मां का दिया कंगन हाथ से निकाल कर उसे दे दिया. मदारी सोने का कंगन पाकर बहुत खुश हुआ और तुरंत सरक लिया. मदारी के जाते ही वह सांप पुरुष बन गया. पुरुष के हाथ में वीणा थी.
उस सुंदर पुरुष ने उदयन से कहा- मेरा नाम वसुनेमी है सर्पराज वासुकी मेरा भाई है. तुमने मेरी जान बचाई है इसलिये मैं तुम्हें यह वीणा तांबूल और माला भेंट करता हूँ. यह माला कभी नहीं मुरझायेगी.
वसुनेमी ने उदयन को कभी न मिटने वाले तिलक का उपाय भी बताया. उधर वह मदारी कंगन पाकर उसे बेचने के लिये पास के सबसे बड़े शहर कौशाम्बी को गया.
इतना भारी महंगा कंगन वहीं बिक सकता था. वह कंगन बेचने जिस सुनार पर गया उस सुनार ने कंगन पर राजा सहस्रनीक का नाम देखकर सैनिकों को बुला लिया.
सैनिक मदारी को दरबार में ले गये. मामला बिगड़ता देख डर से मदारी ने सब हाल उनसे कह दिया. राजा संदेह से भर उठा. तभी आकाशवाणी हुई की रानी मृगावती अपने बेटे साथ उदयाचल पर्वत पर जमदग्नि मुनि के आश्रम के पास हैं.
अब तिलोत्तमा के दिये श्राप का समय समाप्त हो गया है इसलिये रानी जाकर ले आना चाहिये. आकाशवाणी का सुनना था कि राजा ने सेना को आदेश दिया कि वह और मदारी दोनों उसके साथ तुरंत उदयाचल को चले.
(क्रमशः जारी…)
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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