शिवोपासना के लिए मंत्रराज है पंचाक्षर शिव मंत्रः महादेव को प्रसन्न करने के लिए नारद ने पार्वती को दिया था यह मंत्र
जब महादेव की क्रोधाग्नि में कामदेव भस्म हो गए. उस क्षेत्र में स्थिति सभी जीव-जंतु वनस्पतियां समाप्त हो गईं किंतु उस अग्नि से देवी पार्वती का कोई अनिष्ट नहीं हुआ.-
क्रोध के कारण भीषण नाद हुआ जिससे डरकर हिमवान भी वहां आए. महादेव के रौद्ररूप से आक्रांत पार्वती उस समय तो वहां से अपने पिता के पास चली गईं किंतु प्रलंयसृदृश भाव उनके मन को व्यथित करता रहा.
कामदेव का दाह करके महादेव अदृश्य हो गए थे. अत: उनके विरह से पार्वती अत्यंत व्याकुल हो उठी थीं. मेरे स्वरूप को धिक्कार है जो महादेव को जरा भी प्रिय नहीं हुआ. ऐसा कहती वह महादेवजी का चिन्तन किया करती थीं.
एक दिन इंद्र की प्रेरणा से नारदजी हिमालय पर्वत पर आए. शैलराज हिमवान ने उनसे पार्वती के मन के शोक की बात बताई और राह पूछा तो नारदजी ने उन्हें महादेव का ध्यान करने को कहा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
पार्वती नारदजी से मिलने आईँ. उन्होंने उनसे अपने मन का वही प्रश्न रखा जो उन्हें व्यथित करता था- आखिर महादेव ने अपनी क्रोधाग्नि में मुझे क्यों नहीं भस्म किया और क्या वह महादेव के योग्य नहीं है? क्या सारा तप व्यर्थ था.
नारदजी कहा- हे उमा! मैं जो कहने जा रहा हूं उसका तात्पर्य समझिएगा. आपने महादेव के लिए जैसा तप किया वह न तो किसी ने इससे पहले किया था और नही कर पाएगा परन्तु आपके तपस्वी स्वभाव में गर्व और हठ भी आ गया था.
आपने पूछा कि आप उस अग्नि से क्यों नहीं भस्म हुईं. सबपर कृपा करने वाले भगवान भोलेनाथ की अग्नि ने आपके उस गर्व को नष्ट किया. शिवे! आप जिनकी अभिलाषी हैं वह महेश्वर विरक्त और महायोगी हैं.
उन्होंने केवल कामदेव को जलाकर आपको सकुशल छोड़ दिया इसका कारण यह है कि वह भक्त वत्सल हैं. वह भक्तों के मन के अंधकार को भस्म करते हैं, क्योंकि वे उन्हें बड़े प्रिय हैं. अत: आप उत्तम मन से चिरकाल तक महेश्वर की आराधना करें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
तपस्या से आपका संस्कार पूर्ण होने पर महादेव अपनी सहधर्मिणी अवश्य बनाएंगे. देवि! आपका हठ उत्तम है. शिव के अतिरिक्त कोई आपके योग्य ही नहीं.
देवी पार्वती ने नारदजी को गुरूस्वरूप स्वीकार करते हुए पूछा- आप सर्वज्ञ तथा जगत का उपकार करनेवाले हैं. मुने! मुझे वह मंत्र बताइए जो रूद्रदेव को सर्वाधिक प्रिय है और जिससे मैं उनकी आराधना करके प्रसन्न करूं.
नारदजी बोले- पंचाक्षर शिवमंत्र ऊं नम:शिवाय का उच्चारण करने से महादेव प्रसन्न होते हैं. मैं इसे शिवमंत्रों में मन्त्रराज कहता हूं. हे देवी आपको इस मन्त्र का परम अद्भुत प्रभाव सुनाता हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
इसके श्रवणमात्र से भगवान शंकर प्रसन्न हो जाते हैं. यह मन्त्र सब मन्त्रों का राजा, मनोवांछित फल देनेवाला तथा भगवान शंकर को बहुत प्रिय है. यह साधक को भोग और मोक्ष देने में समर्थ है.
शिवा को पंचाक्षर मंत्र का ज्ञान देकर नारद चले गए. उन्होंने इसी मंत्र की साधना से महादेव को प्रसन्न किया. (शिव महापुराण, रूद्र संहिता पार्वती खंड)
