शनिदेव को हुआ मान, बजरंग बली ने किया निदानः क्यों शनिदेव को तेल चढ़ाते समय हनुमानजी का स्मरण किया जाता है

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एक बार बजरंग बली शाम के समय रामधुन में मगन थे. उसी समय शनिदेव पधारे. शनिदेव ने हनुमानजी से विनयपूर्वक किंतु ऊंची आवाज में कहा- हनुमानजी! मैं आपको सावधान करने आया हूं. अब आप पर मेरी साढ़े साती प्रभावी हो गई है. मैं आपके शरीर पर आ रहा हूं. त्रेता की बात दूसरी थी, अब कलियुग प्रारंभ हो गया है. भगवान वासुदेव के अपनी अवतार लीला समाप्त करते ही पृथ्वी पर कलि का प्रभुत्व हो गया. यह कलियुग है. इस युग में आप दुर्बल हैं और मैं बलिष्ठ हो गया हूं.
गर्व से भरे शनिदेव को इस बात का ध्यान नहीं रहा कि जिन पर स्वयं श्रीहरि की कृपा हो उन पर ग्रह-गोचरों का दुष्प्रभाव निष्फल हो जाता है. शनिदेव क्या उनके अग्रज यमराज भी प्रभु के भक्त की ओर देखने का साहस नहीं कर पाते. हालांकि शनिदेव बजरंग बली की शक्ति से पहले से परिचित थे.
रावण ने शनिदेव समेत सभी ग्रहों को अपने महल में बंधक बनाकर रखा था. वह हनुमानजी ही थे जिन्होंने शनिदेव को रावण के बंधन से मुक्त कराया था. फिर भी वह ऐसी बात कह गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हनुमानजी ने शनिदेव को कहा- आप कहीं अन्यत्र जाएं. ग्रहों का प्रभाव पृथ्वी के मरणशील प्राणियों पर ही पड़ता है. जो दिन-रात हरिनाम का सुमिरन करता रहता हो उसके लिए क्या सतयुग क्या कलियुग. मेरे शरीर में श्रीरघुनाथजी के अतिरिक्त दूसरे किसी को स्थान मिल ही नहीं सकता.
लेकिन शनिदेव तो अपना प्रभाव साबित करने पर तुले थे.
शनि बोले- हनुमानजी मैं विधि के विधान से विवश हूं. आप पृथ्वी पर रहते हैं इसलिए आप मेरे प्रभाव क्षेत्र से बाहर नहीं हैं. आप पर मेरी साढ़े साती आज इसी समय से प्रभावी हो रही है. मैं आपके शरीर पर आ रहा हूं और इसे आप भी नहीं टाल सकते.
हनुमानजी ने फिर समझाया- यदि आपने मेरे शरीर पर आने का निश्चय ही कर लिया है तो आप आइए. मैं एक बार फिर कहूंगा कि यदि आप मुझ जैसे वृद्ध को छोड़ ही देते तो अच्छा होता. शनिदेव ने हनुमानजी की विनम्र वाणी का सही अर्थ नहीं समझा.
उन्होंने पलटकर कहा- कलियुग में पृथ्वी पर देवता या उपदेवता को नहीं रहना चाहिए. उनके लिए देवलोक बने हैं. जो पृथ्वी पर रहेगा वह कलियुग के प्रभाव में रहेगा. उसे मेरी पीड़ा भोगनी ही पड़ेगी. मैं मुख्य मारक ग्रह हूं. मृत्यु के सबसे निकट वृद्ध होते हैं, अतः मैं वृद्धों को कैसे छोड़ सकता हूं?’हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जब हनुमानजी को लगा कि शनिदेव समझने वाले नहीं तो उन्होंने शनिदेव से पूछा- आप मेरे शरीर के किस स्थान पर बैठने आ रहे हैं? गर्व में भरकर शनिदेव ने कहा कि आरंभ में मैं प्राणी के सिर पर स्थान लेता हूं और ढाई वर्ष तक उसकी बुद्धि विचलित बनाए रखता हूं.
मध्य के ढाई वर्ष उसके पेट में रहकर उसका स्वास्थ्य बिगाड़ता हूं. अंतिम ढाई वर्ष तक पैरों में प्रवेशकर उसे बहुत भटकाता हूं.’
शनिदेव हनुमानजी के मस्तक पर आ बैठे तो हनुमानजी को सिर में तेज खुजली महसूस हुई. खुजली मिटाने के लिए हनुमान जी ने एक विशाल पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया. पर्वत के भार से शनिदेव चिल्लाने लगे. उन्होंने हनुमानजी से पूछा कि आप यह क्या कर रहे हैं. इससे पीड़ा हो रही है.
हनुमानजी ने उत्तर दिया- जैसे आप विधि के विधान से विवश हैं वैसे मैं अपने स्वभाव से विवश हूं. जब भी मेरे सिर में खुजली होती है मैं खाज मिटाने के लिए सिर पर कई पर्वत रख लेता हूं. इसलिए परेशानी क्या है, आप अपना कार्य करें, मैं अपना कार्य कर रहा हूं.
फिर हुनमानजी ने दूसरा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया.
भार से दबे शनिदेव ने हनुमानजी से अनुरोध किया- कृपया आप इन पर्वतों को उतारिए. मैं संधि को तैयार हूं. हनुमानजी ने अनसुना करते हुए तीसरा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया. शनिदेव चिल्लाकर विनती करने लगे- हनुमानजी मैं वचन देता हूं, कभी भी पास नहीं फटकूंगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हनुमानजी तो जैसे सुनने को तैयार ही नहीं थे.
शनिदेव फिर चिल्लाए- त्राहि माम त्राहि माम! हे रामदूत, हे आंजनेय! मैं उसको भी पीड़ित नहीं करूंगा जो आपका स्मरण करेगा. मुझे पीड़ा से मुक्ति दिलाएं. हनुमानजी ने कहा, अभी तो पांचवां पर्वत बाकी है. शनिदेव ने उनसे याचना की कि बजरंग बली कृपया आप मुझे मुक्त करें.
शनि के कोप से बचने के लिए बजरंग बली का स्मरण बहुत प्रभावी होता है. शनिदेव ने हनुमानजी से उस पीड़ा से राहत के लिए तेल मांगा था. शनिदेव के प्रकोप से बचने के लिए हनुमानजी के स्मरण के साथ तेलदान किया जाता है.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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