संकटमोचन हनुमानः असुर संहार के लिए पंचमुखी हुए हनुमान, सूझबूझ से होते-होते रह गया श्रीराम का दूसरा विवाह. भाग-4
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भ्रमरों को हनुमानजी ने समाप्त कर दिया फिर भी हनुमानजी और मकरध्वज के हाथों अहिरावण और महिरावण का अंत नहीं हो पा रहा था. यह देखकर हनुमानजी कुछ चिंतित हुए.
फिर उन्हें कामाक्षी देवी का वचन याद आया. देवी ने बताया था कि अहिरावण की सिद्धि है कि जब पांचो दीपकों एक साथ बुझेंगे तभी वे नए-नए रूप धारण करने में असमर्थ होंगे और उनका वध हो सकेगा.
हनुमानजी ने तत्काल पंचमुखी रूप धारण कर लिया. उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख.
उसके बाद हनुमानजी ने अपने पांचों मुख द्वारा एक साथ पांचों दीपक बुझा दिए. अब अब उनके बार बार पैदा होने और लंबे समय तक जिंदा रहने की सारी आशंकायें समाप्त हो गयीं थी. हनुमानजी और मकरध्वज के हाथों शीघ्र ही दोनों राक्षस मारे गये.
इसके बाद उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मणजी की मूर्च्छा दूर करने के उपाय किए. दोनो भाई होश में आ गए. चित्रसेना भी वहां आ गई थी. हनुमानजी ने कहा- प्रभो! अब आप अहिरावण और महिरावण के छल और बंधन से मुक्त हुए.पर इसके लिए हमें इस नागकन्या की सहायता लेनी पड़ी थी. अहिरावण इसे बलपूर्वक उठा लाया था. वह आपसे विवाह करना चाहती है. कृपया उससे विवाह कर अपने साथ ले चलें. इससे उसे भी मुक्ति मिलेगी.
श्रीराम हनुमानजी की बात सुनकर चकराए. इससे पहले कि वह कुछ कह पाते हनुमानजी ने ही कह दिया- भगवन आप तो मुक्तिदाता हैं. अहिरावण को मारने का भेद इसी ने बताया है. इसके बिना हम उसे मारकर आपको बचाने में सफल न हो पाते.
कृपानिधान इसे भी मुक्ति मिलनी चाहिए. परंतु आप चिंता न करें. हम सबका जीवन बचाने वाले के प्रति बस इतना कीजिए कि आप बस इस पलंग पर बैठिए बाकी का काम मैं संपन्न करवाता हूं.
हनुमानजी इतनी तेजी से सारे कार्य करते जा रहे थे कि इससे श्रीरामजी और लक्ष्मणजी दोनों चिंता में पड़ गये. वह कोई कदम उठाते कि तब तक हनुमानजी ने भगवान राम की बांह पकड़ ली.
हनुमान जी ने भावावेश में प्रभु श्रीराम की बांह पकड़कर चित्रसेना के उस सजे-धजे विशाल पलंग पर बिठा दिया. श्रीराम कुछ समझ पाते कि तभी पलंग की खोखली पाटी चरमराकर टूट गयी.पलंग धराशायी हो गया. चित्रसेना भी जमीन पर आ गिरी. हनुमानजी हंस पड़े और फिर चित्रसेना से बोले- अब तुम्हारी शर्त तो पूरी हुई नहीं, इसलिए यह विवाह नहीं हो सकता. तुम मुक्त हो और हम तुम्हें तुम्हारे लोक भेजने का प्रबंध करते हैं.
चित्रसेना समझ गयी कि उसके साथ छल हुआ है. उसने कहा कि उसके साथ छल हुआ है. मर्यादा पुरुषोत्तम के सेवक उनके सामने किसी के साथ छल करें यह तो बहुत अनुचित है. मैं हनुमान को श्राप दूंगी.
चित्रसेना हनुमानजी को श्राप देने ही जा हे रही थी कि श्रीराम का सम्मोहन भंग हुआ. वह इस पूरे नाटक को समझ गये. उन्होंने चित्रसेना को समझाया- मैंने एक पत्नी धर्म से बंधे होने का संकल्प लिया है. इसलिए हनुमानजी को यह करना पड़ा. उन्हें क्षमा कर दो.
क्रुद्ध चित्रसेना तो उनसे विवाह की जिद पकड़े बैठी थी. श्रीराम ने कहा- मैं जब द्वापर में श्रीकृष्ण अवतार लूंगा तब तुम्हें सत्यभामा के रूप में अपनी पटरानी बनाउंगा. इससे वह मान गयी.हनुमानजी ने चित्रसेना को उसके पिता के पास पहुंचा दिया. चित्रसेना को प्रभु ने अगले जन्म में पत्नी बनाने का वरदान दिया था. भगवान विष्णु की पत्नी बनने की चाह में उसने स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया.
श्री राम और लक्ष्मण, मकरध्वज और हनुमानजी सहित वापस लंका में सुवेल पर्वत पर लौट आये. कथा संपन्न. (स्कंद पुराण और आनंद रामायण के सारकांड की कथा)
संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश
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