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ऋषि पंचमी व्रत-असमय विधवा होने के शाप से मुक्ति का व्रत

ऋषि पंचमी व्रत-असमय विधवा होने के शाप से मुक्ति का व्रत

किसी स्त्री को असमय वैधव्य झेलने का शास्त्रों में एक कारण बताया गया है. अपवित्र अवस्था में कोई स्त्री मांगलिक कार्यों में शामिल होती है तो उस दोष के कारण उसे विधवा होने का शाप मिलता है. इसकी मुक्ति का रास्ता है ऋषि पंचमी व्रत.

भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है. 3 सितंबर 2019 को यह व्रत रखा जाएगा. चूंकि शास्त्रों में लगातार व्रत का विधान नहीं है. जिन स्त्रियों ने कल तीज का व्रत रखा हो, वे इस कथा को पढ़-सुन लें और किसी अन्य स्त्री को सुना दें. विधवा स्त्रियों को प्रणाम करके उन्हें उत्तम भोजन आदि देकर आशीर्वाद लें.

अखंड सुहागिन होना किसी विवाहिता के लिए सबसे बड़ा वरदान है. बहुत सी स्त्रियों को असमय वैधव्य झेलना पड़ता है. बहुत कम उम्र में वे विधवा हो जाती हैं. शास्त्रो में इसका एक कारण बताया गया है. कोई स्त्री अपवित्र अवस्था यानी रजस्वला होकर भी यदि किसी मांगलिक कार्य में शामिल हो जाती है तो उस दोष के कारण उसे वैधव्य का शाप मिलता है. रजस्वला स्त्री से भूलवश हुए अपराध से मिले  शाप की मुक्ति का मार्ग है ऋषि पंचमी व्रत.

ऋषि पंचमी
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भाद्रपद शुक्लपक्ष की पंचमी ऋषि पंचमी कहलाती है. ऋषि पंचमी का व्रत ज्ञात-अज्ञात पापों का नाश करने वाला होता है. कई बार ऐसा होता है कि रजस्वला स्त्री से अंजाने में पूजन सामग्री आदि का स्पर्श हो जाता है. यह अपराध स्त्रियों से अंजाने में हो जाता है परंतु अपराध जाने हो या अंजाने में, अपराध ही है. अंजाने में हुए अपराध के लिए शास्त्रों में निवारण मार्ग बताया गया है. इस व्रत को सभी वर्णों की स्त्रियां करती हैं.  व्रत में सप्तर्षियों के सहित देवी अरुन्धती का पूजन होता है. इसीलिए इसे ऋषि पंचमी कहते हैं.

इस पोस्ट में आप जानेंगे-

  • अंजाने में स्त्रियों से हुए पाप से मुक्ति कराने वाली ऋषि पंचमी व्रत की महिमा
  • ऋषि पंचमी व्रत की विधि
  • ब्रह्मांड पुराण में वर्णित ऋषि पंचमी व्रत की कथा
  • ऋषि पंचमी की एक अन्य प्रचलित कथा

ऋषि पंचमी व्रत की विधि

  • इस दिन व्रत करने वाले को चाहिए कि वह प्रातः काल से मध्यान्ह के समय किसी नदी या तालाब पर जाएं.
  • वहां अपमार्गा (चीड़चिड़ा) के लकड़ी से दातून करें, मिट्टी लगाकर स्नान करें.
  • इसके बाद पंचगव्य ( दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र) से पवित्र हों.
  • तत्पश्चात घर आकर शास्त्र और विधान से किसी ब्राहमण से पूजन आदि कराकर कथा सुनें.
  • इस व्रत में फलाहार किया जाता है लेकिन नमक खाना वर्जित हैं. प्रायः लोग दही और साठी का चावल खाते हैं.
  • खेत से जुते हुए अन्न का सेवन भी वर्जित है.
  • दिन में एक बार ही भोजन का विधान है. ब्राह्मण भोजन कराकर प्रसाद पाना चाहिए.
  • व्रत की अवधि कम से कम सात साल की होती है. लगातार सात साल ऋषि पंचमी व्रत करने के बाद उद्यापन भी किया जा सकता है.
  • सात साल तक लगातार व्रत के बाद आठवें वर्ष सप्तर्षियों की सोने, चांदी या अन्य कीमती धातु की प्रतिमा बनवाकर दान करके व्रत का उद्यापन किया जा सकता है. बहुत सी स्त्रियां इसे आजीवन भी करती हैं.
  • इस दिन सप्त ऋषियों का आह्वान करके उनसे सभी ज्ञात-अज्ञात पापों के हरण का वरदान मांगना चाहिए.

ऋषि पंचमी पर सप्तर्षियों का आह्वान कैसे करें-

श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर अपने इष्ट का ध्यान कर लेने के बाद सप्तर्षियों का आह्वान इस प्रकार करना चाहिए.

1 – कश्यपाय नमः
2 – अत्रये नमः
3 – भारद्वाजाय नमः
4 – विश्वामित्राय नमः
5 – गौतमाय नमः
6 – जम्दग्नये नमः
7 – वाशिष्ठाये नमः

इसके बाद वशिष्ठ की पत्नी माता अरुंधति का स्मरण करते हुए आह्वान करना चाहिए.  इसके लिए अरुन्धत्ये नमः के उच्चारण करें और फिर ऋषि पंचमी की कथा सुननी चाहिए.ब्रह्मांड पुराण में वर्णित ऋषि पंचमी की कथा

सतयुग में श्येनजित नामक एक राजा राज्य करता था. उसके राज्य में सुमित्र नामका एक ब्राह्मण रहा करता था. वह वेदों में पारंगत था. वह ब्राहमण खेती द्वारा जीवन निर्वाह व् परिवार का भरण–पोषण करता था.

उसकी पत्नी जयश्री सती साध्वी थी. वह खेती के कार्यों में भी अपने पति का सहयोग करती थी. एक बार रजस्वला अवस्था में अनजाने में उसने घर का सब कार्य किया और पति का स्पर्श भी कर लिया. देवयोग से पति तथा पत्नी की मृत्यु एक साथ हुई.

रजस्वला अवस्था में स्पर्श आदि का विचार न करने से स्त्री कुतिया और पति ने बैल की योनि प्राप्त की परन्तु पूर्व जन्म में किए गए धार्मिक कर्मों के कारण पूर्वजन्म की स्मृति उन्हें बनी रही. संयोगवश इस जन्म में भी वे अपने ही घर में रह रहे थे. उनके पूर्वजन्म के पुत्र और पुत्रवधू भी साथ रह रहे थे.ब्राह्मण के पुत्र का नाम सुमति था. वह भी पिता की भांति वेदों का विद्वान था. पितृपक्ष में उसने अपने माता– पिता के श्राद्ध के उद्द्देश्य से पत्नी से कहकर खीर बनवाई और ब्राह्मणों को निमंत्रण दिया. उधर एक सर्प ने आकर उस खीर को विषाक्त कर दिया.

कुतिया बनी ब्राह्मणी यह सब देख रही थी. उसने सोचा यदि इस खीर को ब्राह्मण खायेंगे तो मर जायेंगे और सुमति को पाप लगेगा. पूर्वजन्म का उसका पुत्र ऐसे पाप का भागी न बने.

ऐसा विचारकर उसने खीर के बर्तन में मुंह लगाकर उलट दिया. सुमति की पत्नी बहुत क्रोधित हुई और चूल्हे से जलती हुई लकड़ी निकाल कर उसकी पिटाई कर दी. उस दिन उसने कुतिया को भोजन भी नहीं दिया.

रात्रि में कुतिया ने बैल से सारी घटना बताई. बैल ने कहा आज तो मुझे भी कुछ खाने को नहीं दिया, जबकि सारे दिन मुझसे खेतों पर काम लिया. सुमति हम दोनों के ही उद्देश्य से श्राद्ध कर रहा है और हमें ही भूखों मार रहा है. इस तरह से हम लोगों के भूखे रह जाने से तो इनका श्राद्ध करना व्यर्थ हो जाएगा.

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सुमति द्वार पर बैठा इन दोनों की वार्तालाप सुन रहा था. उसे पशुओं की बोली भली-भांति आती थी. उसने जब ये बातें सुनी तो उसे बहुत दुःख हुआ कि मेरे माता पिता इस निष्कृष्ट योनि में जन्मे हैं.

वह दौड़ता हुआ एक ऋषि के पास पहुंचा और सारा वृतान्त सुना कर अपने माता-पिता के इस योनि में पड़ने का कारण और मुक्ति का उपाय पूछा. ऋषि ने ध्यान और योगबल से सारा वृतांत जान लिया.

ऋषि ने सुमति से कहा तुम भाद्रपद शुक्ल पंचमी का व्रत करो. उस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे माता– पिता को इस पाप से अवश्य मुक्ति मिल जायेगी. माता-पिता भक्त सुमति ने ऋषि पंचमी का व्रत किया.जिसके प्रभाव से उसके माता पिता को पशु योनि से मुक्ति मिल गई. यह व्रत शरीर के अशुद्ध अवस्था में किए गए स्पर्शास्पर्श तथा अन्य पापों के प्रायश्चित के रूप में किया जाता है.

ऋषि पंचमी की एक अन्य व्रत कथा, इसे भी जरूर पढ़ना चाहिए. 

ऋषि पंचमी व्रत की एक अन्य कथाः

किसी नगर में एक ब्राहमण था. उसका परिवार विधि-विधान से ऋषि पंचमी का व्रत किया करता था. एक बार ऋषि पंचमी को उसने पूजा के लिए प्रसाद बनाया. तभी किसी ने उसे आवाज लगाई तो उसे बाहर जाना पड़ा. वापस आने में उसे देर होने लगी.

उस ब्राह्मण की सात बहुएं थीं. सबसे छोटी बहु की नजर प्रसाद पर गई तो वह ललचा गई. उका मन प्रसाद खाने का हुआ. वह अपनी जिह्वा को रोक नहीं पाई तो सोचा कि यदि थोडा सा प्रसाद खा भी लेती हूं तो ससुरजी को क्या पता चलेगा. इसी विचार से उसने बिना भोग लगे पूजा के प्रसाद में थोड़ा सा निकालकर खा लिया और बरतन को बिलकुल वैसे ही रख दिया जैसे उसके ससुरजी रख गये थे.ब्राह्मण वापस आए. पूजा की और भोग लगाने के लिए लखेसरो (कौओ ) के पास रखा तो उन्होंने खाया नहीं.  उसे बड़ा आश्चर्य हुआ. गौर से प्रसाग को देखा तो पाया कि प्रसाद में तो कीड़े हो गये थे. ताजा बने प्रसाद में कीड़े लग गए हैं. छोटी बहु पेट से थी.

प्रसाद की लालसा से आए लखेसरो ने उसे श्राप दिया कि एक ऋषि पंचमी को को तेरे बच्चा जन्म लेगा और एक ऋषि पंचमी को मरेगा. अब ऐसा ही होने लगा. ऋषि पंचमी को जन्म और मरण होने लगा इसके कारण ऋषि पंचमी की पूजा ही न हो पाती. सभी घर वाले परेशान होने लगे कि ये तो कोई त्यौहार ही नहीं करने देती.

परिवार के लोगों ने उसके पति से कहा- इसे जंगल में ले जाकर मारकर जानवरों को दे दो. हमारा तो इसने जीवन खराब कर रखा है. कम से कम जानवरों का भला हो जाए. जब सभी घर वाले उसके पीछे ही पड़ गये तो वो अपनी पत्नी (छोटी बहु ) को जंगल ले गया लेकिन उसने उसे मारा नही. वहीं छोड़कर चुपचाप घर आ गया और कह दिया कि इसे मारकर फेंक दिया है.

सब लोग अब ख़ुशी -ख़ुशी रहने लगे. उधर छोटी बहु जंगल में घुमती-घामती ऋषियों के आश्रम पहुंच गई. जब ऋषियों ने जंगल में अकेली औरत को देखा तो पूछा कि तुम यहाँ क्या कर रही हो तो उसने अपनी आपबीती ऋषियों को सुनाई.

ऋषियों ने उसे बताया कि तुम्हें तो श्राप मिला हुआ है इस कारण यह सब हो रहा है.  स्त्री ने शापमुक्ति का उपाय उनसे पूछा.  तब उन्होंने बताया कि तुम तालाब के पास जाओ जहाँ लखेसर नहाते हैं. उनके नहाये पानी के छीटें तुम्हारे ऊपर पड़ने से तुम्हारा यह दोष दूर होगा.

उस स्त्री ने ऐसा ही किया और इससे उसका दोष दूर हो गया. जब उसका पति उसे जंगल में छोड़ने गया था तो वह गर्भ से थी. शापमुक्त होने के कारण उसके जो बच्चा हुआ वह जीवित रहा. उसने वही जंगल में एक कुटिया बना ली और रहने लगी. उसका बच्चा भी बड़ा होने लगा.संयोग से एक दिन उसके पति के मन में पत्नी का हाल लेने का विचार आया. वह उसकी खोज लेने को वन में उस स्थान की ओर चला जहां उसे छोड़ आया था. जंगल में खोजने पर उसकी पत्नी उसे जीवित मिल गई. उसने देखा कि उसकी पत्नी एक बच्चे को खिला रही है.

वह उसके पास गया और पूछा कि तुम कैसी हो और ये बच्चा तुम्हारे पास कहा से आया. तब उसने सारी बात बताई कि कैसे उसका दोष दूर हुआ. यह सुनकर उसका पति बहुत खुश हुआ. उसे और अपने बच्चे को लेकर घर आया तथा अपने घरवालों को सारी बात बताई. सारे घरवाले बहुत खुश हुए और  छोटी बहु व उसके बच्चे का खूब स्वागत किया. सब लोग फिर से ख़ुशी-ख़ुशी एक साथ रहने लगे.

हे भगवान जैसे अंजाने में हुए इतने बड़े अपराध से छोटी बहु को मुक्त कराने का मार्ग दिखाया वैसे ही सबकी भूल माफ करें.

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