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जानिए जन्म, कुल निर्धारण, एवं नर्क का रहस्य

जानिए जन्म, कुल निर्धारण, एवं नर्क का रहस्य

brahma vishnu

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शमीकपुत्र ऋंगी ने राजा परीक्षित को सात दिनों के अंदर सांप के काटने से मृत्यु का शाप दे दिया था. परीक्षित जीवन के अंतिम क्षणों में शुकदेव से भागवत सुन रहे थे.

परीक्षित ने पूछा- महर्षि! संसार में जीवों में इतनी भिन्नता क्यों हैं. कोई राजा तो कोई दास क्यों होता है? प्राणियों का जन्म क्यों होता है?

शुकदेव बोले- प्राणी कर्मों के आधार पर स्वर्ग, नर्क और फिर से पृथ्वी पर जन्म का कष्ट भोगता है. सात्विक, राजस और तामस ये तीन प्रकार के कर्म होते हैं.

इन्हीं कर्मों के आधार पर प्राणी की गति तय होती है. निषिद्ध यानी वर्जित कर्म करने वाला प्राणी नर्क का भागी तो अच्छे कर्म वाला स्वर्ग भोगता है.

नर्क और स्वर्ग भोगने के बाद जब अधिकांश पाप और पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तब बचे हुए पुण्य रूपी कर्मों को प्राणी तब तक इसी लोक में जन्म लेने के लिए आता रहता है जब तक उसे मोक्ष न मिल जाए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पूर्वजन्म के कर्म यह तय करते हैं कि प्राणी अगले जन्म में किस योनी में आएगा और किस कुल में जन्म लेगा. जिसके कर्म अच्छे हों वह राजा होता है, जिसके बुरे वह रंक या दास.

राजा परीक्षित ने पूछा- ये नर्क कहां हैं? इनमें जीवों को क्या दंड मिलते हैं. मुझे मुख्य नर्कों के बारे में विस्तार से बताएं

शुकदेव बोले- नर्क त्रिलोक के भीतर ही हैं. यह दक्षिण की ओर पृथ्वी से नीचे और जल के ऊपर स्थित हैं. मुख्य नरकों की संख्या इक्कीस बताई गई है.

शुकदेव ने कहा- अब मैं तुम्हें नर्क और उनमें होने वाली दुर्गति का वर्णन करता हूं. जो पुरुष पराई स्त्री, पराए धन और संतान का हरण करता है, उसे यमदूत तामिस्त्र् नामक नरक में धकेल देते हैं.

तामिस्त्र में यमदूत प्राणी को अन्न-जल नहीं देते और डंडों से पिटाई करते हैं. प्राणी एकाएक मूच्छिर्त हो जाता है.

जो पुरूष किसी दूसरे को धोखा देकर उसकी स्त्री को भोगता है, वह अन्धतमिस्त्र् नर्क में पड़ता है. वहाँ प्राणी जड़ से कटे हुए वृक्ष के समान होता है और पीड़ा के मारे होश खो देता है इसीलिए इसका यह नाम पड़ा.

जो क्रूर मनुष्य अपना पेट पालने के लिए जीवित पशु या पक्षियों को रांधता है, उसे यमदूत कुम्भीपाक नरक में ले जाकर खौलते हुए तेल में रांधते हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जो मनुष्य इस लोक में माता पिता, ब्राहमण और वेद का विरोध करता है, उसे यमदूत कालसूत्र् नरक में ले जाते हैं. इस नरक की भूमि ताँबे की है जो ऊपर सूर्य और नीचे से अग्नि के दाह से जलती रहती है.

जो प्राणी चोरी या बल से आपत्ति काल न होने पर भी दूसरों का धन लूटता है उसे मरने पर यमदूत संदंश नामक नर्क में गर्म लोहे से दागते हैं, संडासी से उसकी खाल नोचते हैं.

पृथ्वीलोक में यदि कोई पुरूष अगम्या स्त्री के साथ सम्भोग करता है या कोई स्त्री अगम्या पुरूष से व्याभिचार करती है तो यमदूत उसे तपतसूर्मि नामक नर्क में ले जाकर कोड़ों से पीटते है.

जो पुरूष पशु आदि के साथ व्याभिचार करता है उसे यमदूत वज्र के समान कठोर कांटों वाले सेमर के वृक्ष पर घसीटकर उसकी खाल उतारते हैं.

जो श्रेष्ठ कुल में जन्म पाकर भी धर्म की मर्यादा भंग करते हैं, वे मल, मूत्र्, पीब, रक्त, आदि गंदी चीजों से भरी वैतरणी में धकेल दिए जाते हैं. वहां उन्हें जल के जीव नोच-नोकर खाते हैं.

जो पाखण्डी यज्ञों में पशुओं का वध करते हैं, उन्हें परलोक में वैशस विशसनद्ध नरक में डालकर वहां के अधिकारी बहुत पीड़ा देकर काटते हैं.

जो किसी की जलाकर या विष देकर हत्या करते हैं, किसी मजबूर की संपत्ति छल-बल से हड़पते हैं, मरने के बाद उन्हें सारमेयादन नर्क में नुकीले दातों वाले सात सौ बीस यमदूत बड़े वेग से काटने लगते हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जो मनुष्य पृथ्वी लोक में झूठी गवाही दें, व्यापार अथवा दान के समय झूठ बोलते हैं, वह मरने पर अवीचिमान नरक में सौ योजन ऊँचे पर्वत शिखर से नीचे को सिर करके गिराया जाता है.

उस नर्क की पत्थर की भूमि जल के समान जान पड़ती है. इसीलिये इसका नाम अवीचमान है. गिरने से शरीर के टुकडे टुकड़े हो जाने पर भी प्राण नहीं निकलते, इसलिए उसे बार बार ऊपर से फेंका जाता है.

जो ब्राह्मण या व्रतधारी व्रत में भी मदिरापान करता है तथा जो क्षत्रिय या वैश्य सोमपान करता है, उन्हें यमदूत अयपान नरक में ले जाते हैं और उनकी छाती पर पैर रखकर मुख में पिघला लोहा डालते हैं.

जो पुरुष अभिमानवश जन्म, तप, विघा, आचार, वर्ण या आश्रम में अपने से बड़ों का सत्कार नहीं करता, उसे मरने पर ज्ञारकदर्म नामक नरक में नीचे की ओर सिर करके गिराया जाता है.

जो धन के अभिमान में सब पर संदेह करता है, पैसा कमाने के लिए पाप करता है, वह मरने पर सूचीमुख नरक में गिरता है. वहां उस पापी के सारे अंगों को यमराज के दूत दर्जियों के समान सुई धागे से सीते हैं.

प्रमुख नर्कों का वर्णन करने के बाद शुकदेव ने परीक्षित से कहा- राजन! यमलोक में इसी प्रकार के सैकड़ों नरक हैं. उन नर्कों में सभी अधर्मी अपने कर्मों के अनुसार बारी बारी जाते हैं.

इसी प्रकार अपने जीवन में किए पुण्यों के कारण वे विभिन्न स्वर्गों में भी स्थान पाते हैं. जो कोई पाप नहीं करते और प्रभुभक्ति में लीन रहते हैं वे जन्म-मृत्यु के झंझट से मुक्त होकर मोक्ष पा लेते हैं.

व्रत लेकर भागवत कथा सुनने या सुनाने से कई नरक के पापों से छुटकारा मिलता है.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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