नल दमयंतीः दिल को छूने वाली पौराणिक प्रेमकथा
नल दमयंती की कथा प्रेम की उन पौराणिक कथाओं में है जो अमर हो गए. शिवभक्त भील दंपती शिवकृपा से राजकुल में जन्मे. दोनों में पहले प्रेम फिर बिछोह और शिवकृपा से पुनर्मिलन.
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कहते हैं नल दमयंती की अमर प्रेमकथा सुनने से पति-पत्नी के बीच कटुता मिटती है, प्रेम पनपता है. दोनों के प्रेम की कथा है ही ऐसी. दमयंती ऐसी रूपसी थी कि स्वयं देवता लालायित थे उससे विवाह को. रूप-गुण और शौर्य में नल भी कम न थे. दोनों ने एक दूसरे के बारे में सुना. नल दमयंती एक दूसरे से कभी मिले भी न थे. दोनों ने बस सुन रखा था एक दूसरे के बारे में. बस सुनकर ही ऐसा सच्चा प्रेम करने लगे कि उन्हें मिलाने को स्वयं शिवजी को अवतार लेना पड़ा.
दमयंती जब हंसती थी तब दिकपाल यम ऐसे मंत्रमुग्ध हो जाते थे कि किसी के प्राण हरने की बात भूल जाएं. वायुदेव का वेग बिगड़ जाता था, इंद्र खो जाते थे. कामदेव सरीखे रूपवान नल के जोड़ का अश्वारोही तो इंद्र की सेना में भी न था. घोड़े पर सवार नल को भूलोक में कोई रोक नहीं सकता था. आखिर शिवजी किसी सामान्य जोड़े को मिलाने के लिए अवतार तो न लेंगे.
पर शिवजी ने अवतार लिया क्यों?
नल दमयंती की प्रेमकथा इतनी विविधताओं, इतने रंगों से भरी है कि इस पर न जाने कितने नाटक लिखे गए हैं. उस कथा में आपको पिरोने से पहले उसकी पृष्ठभूमि में ले चलूंगा. शिवजी दो प्रेमियों को मिलाने के लिए अवतार लेने लगे? यह बात ऐसा कौतूहल पैदा कर देती है कि नल दमयंती की प्रेम और विरह की कथा जानने से पहले शिवजी की कथा जानने की उत्सुकता हो जाए.
रूदन-हास विछोह और मिलन की नल दमयंती की कथा में जाने से पहले आपको एक महान शिवभक्त बाहुक की कथा में ले चलता हूं. साथ बने रहिएगा. बहुत विविधता है इस कथा में, बहुत तरह के भाव भरेंगे मन में. इसकी महिमा ऐसी है कि तिलचौथ या गणेश तिल चतुर्थी को नल दमयंती कथा सुनने का विधान है. इससे शिव-पार्वती समेत गणेशजी प्रसन्न होते हैं.
मैंने आपको शिवजी के अवतारों की चर्चा में महादेव के यतिनाथ और हंस अवतार की कथा सुनाई थी. भोलेनाथ अपने एक भक्त भील दंपत्ती की परीक्षा लेने आए. बड़ी कठिन परीक्षा ली भोलेनाथ ने. भील दंपती ने प्राण देकर परीक्षा पूरी की. दोनों के बीच का प्रेम देखकर शिवजी विभोर हो गए.
उन्होंने वरदान दिया कि भील पति-पत्नी का अगला जन्म राजकुल में होगा. दोनों की ख्याति देवलोक तक होगी. आज मेरे कारण दोनों अलग हुए हैं. मैं इन दोनों को मिलाने के लिए हंस के रूप में अंशावतार लूंगा. हंस अवतार की कृपा से दोनों का मिलन होगा. यही दोनों अगले जन्म में नल दमयंती हुए. भील-दंपती के शिवजी द्वारा परीक्षा लेने की कथा विस्तार से नीचे पढ़ सकते हैं. (यतिनाथव हंस रूप में शिव अवतार)कथा आगे बढ़ाता हूं. शिवजी का आशीर्वाद फलीभूत हुआ. भील आहुक अगले जन्म में निषध देश के राजा वीरसेन के पुत्र राजा नल हुए. भीलनी आहुका विदर्भराज भीम की पुत्री राजकुमारी दमयंती हुईं.
कथा कई शास्त्रों में आती है. मैं महाभारत के अनुसार इसे आगे लेकर चलता हूं. पांडवों को बनवास हो गया था. वे वन में रहने लगे थे. श्रीकृष्ण और धृष्टद्युम्न उनसे मिलने वन में आए. भगवान श्रीकृष्ण ने बता दिया कि अब हर हाल में कौरवों-पांडवों में युद्ध होकर रहेगा. इसलिए पांडवों को तैयारी आरंभ करनी चाहिए.
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को पूजा-पाठ से विभिन्न देवों को प्रसन्न करने का आदेश किया. जबकि अर्जुन को तप से महादेव और इंद्र को प्रसन्न करने को कहा. भगवान के आदेश पर अर्जुन तप किया. महादेव और इंद्र दोनों को तप से प्रसन्न भी कर लिया. वरदान के रूप में अर्जुन स्वर्ग में रहकर दिव्यास्त्रों का ज्ञान लेने लगे.नई कथाओं के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें.
अर्जुन के न होने से पांडव चिंता में थे. तभी महर्षि बृहदश्व वहां पधारे. युधिष्ठिर ने उन्हें जुए में हारने से लेकर द्रोपदी के अपमान और अर्जुन के जाने की सारी पीड़ा सुनाई.
महर्षि बृहदश्व ने युधिष्ठिर को सांत्वना देते हुए कहा- राजन! विधि के विधान कोई नहीं टाल सकता. अर्जुन दिव्यास्त्रों का ज्ञान ले रहे हैं. आप उनकी ओर से निश्चिंत रहें. जुआ मनुष्य के पतन का कारण होता है. शिवजी के परमप्रिय राजा नल को जुए की लत लगी. इस लत के कारण सभी कष्टों को भोगने वाले राजा नल की कथा आपको सुनाता हूं.निषध देश के राजा वीरसेन के प्रतापी और धर्मात्मा पुत्र का नाम था नल. नल प्रजापालक और उत्तम गुणों से युक्त थे लेकिन एक अवगुण राजा में यह था कि वह जुए का शौक रखते थे. विदर्भराज भीम भी नल के समान ही सर्वगुण सम्पन्न थे. उन्होंने दमन ऋषि को प्रसन्न करके वरदान से चार उत्तम संतान प्राप्त किए- तीन पुत्र और एक पुत्री.
पुत्रों के नाम थे दम,दान्त व दमन और पुत्री थी दमयन्ती. दमयन्ती, देवी लक्ष्मी के समान रूपवती थीं. उनके रूप की बराबरी देवताओं और यक्षों की कन्या भी नहीं कर सकती थी.
एक दिन राजा नल ने अपने महल के उद्यान में कुछ हंसों को देखा. उन्होंने एक हंस को पकड़ लिया.
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हंस ने कहा- राजा नल यदि आप मुझे छोड़ दें तो हम सभी दमयंती के पास जाकर आपका ऐसा बखान करेंगे कि वह आपको पतिरूप में चुनेंगी.
नल ने हंस को छोड़ दिया. वे सब हंस उड़कर राजकुमारी दमयंती के पास गए. दमयन्ती उन्हें देखकर बहुत खुश हुई पकडऩे के लिए दौडी. दमयन्ती जिस हंस को पकड़ती, वही हंस बोल उठता- निषध का राजा नल सौंदर्य में साक्षात कामदेव का स्वरूप है. वह अश्विनी कुमार के समान गुणवान है. जैसे तुम स्त्रियों में रत्न हो, वैसे ही नल पुरुषों में भूषण है. तुम दोनों की जोड़ी बहुत सुंदर है. तुम दोनों की जोड़ी संसार की सर्वश्रेष्ठ जोड़ी होगी.
सभी हंस बार-बार ऐसा ही कहते तो दमयंती नल के प्रति आकर्षित होने लगी.नई कथाओं के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें.
दमयन्ती ने कहा- हंस, तुम राजा नल के पास जाओ और उन्हें मेरी ओर से भी ऐसी ही बात कहना. उनसे कहना कि तुम्हारे मुख से प्रशंसा सुनकर मैं उनसे प्रभावित हूं. हंस ने राजा नल को दमयंती का संदेश दिया. हंस फिर आए और नल दमयंती के संदेशों का आदान-प्रदान किया. हंसों ने नल दमयन्ती में प्रेम करा दिया.
नल के प्रेम में डूबी वह रात दिन उनका ध्यान करती. शरीर धूमिल और दुबला हो गया. सहेलियों ने राजा से दमयंती के स्वास्थ्य के बारे में बताया. राजा को पुत्री के विवाह की चिंता हुई. दमयन्ती के स्वयंवर का आयोजन हुआ.
सभी राजाओं के साथ-साथ इन्द्र और समस्त लोकपाल भी स्वयंवर के लिए चल पड़े. राजा नल को भी निमंत्रण मिला और वह चल पड़े. नल के रूप को देखकर इंद्र ने रास्ते में अपना विमान रोक लिया. सभी देवता नल की वहीं प्रतीक्षा करने लगे.इंद्र देवताओं समेत रथ से उतरकर आए और नल से अनुरोध किया- राजा नल आप बड़े सत्यव्रती हैं. हमें आपकी सहायता चाहिए. आप हमारी सहायता का वचन दें. आपको हमारा दूत बनकर किसी तक संदेश पहुंचाना होगा.
उनके आग्रह को देखकर नल ने वचन दे दिया, फिर पूछा कि आपसब कौन हैं?
इन्द्र ने कहा- हम देवतागण हैं. हम दमयन्ती के लिए यहां आएं हैं. आप हमारे दूत बनकर दमयन्ती के पास जाइए. दमयंती से कहिए कि इन्द्र, वरुण, अग्रि और यम तुमसे विवाह की इच्छा रखते हैं. इनमें से किसी को अपना पति स्वीकार लो.
नल ने हाथ जोड़कर कहा- आप जिस प्रयोजन से जा रहे हैं, मैं भी उसी प्रयोजन से जा रहा हूं. इसलिए मेरा दूत बनना उचित नहीं. किसी स्त्री को पत्नी के रूप में पाने की जिसकी स्वयं इच्छा हो चुकी हो वह भला उसे कैसे छोड़ सकता है! आप जगतपूज्य देवों को तुच्छ मानव को ठगने में दया नहीं आयी? मैं मनुष्य हूं, आपसब देव. मैं अत्यन्त तुच्छ आपसब श्रेष्ठ. फिर भी आपका यह आचरण मुझे समझ नहीं आया. मुझे क्षमा करें, मैं आपके काम नहीं आ सकता.देवताओं ने नल को याद कराया- तुम क्षत्रिय राजा हो. तुमने दूत बनने का वचन दिया है. वचन से पीछे हटकर आप कुल को कलंकित करेंगे. यह आपको शोभा न देगा राजा नल. क्षत्रिय धर्म की रक्षा के लिए वचन को पूरा करो. अविलम्ब दमयंती के पास जाकर हमारा संदेश दो.
मन मसोसकर नल दूत बनने को राजी हुए. इंद्र के प्रभाव से नल अदृश्य रूप में दमयंती के पास पहुंच गए. दमयन्ती और उसकी सहेलियां नल को देखकर मुग्ध हो गईं पर लज्जावश कुछ बोल न सकीं.
नल ने दमयंती से कहा- मैं नल हूं. लोकपालों का दूत बनकर तुम्हारे पास आया हूं. सुन्दरी ये देवतागण तुमसे विवाह करना चाहते हैं. इनमें से किसी देवता को विवाह के लिए चुन लो. मैंने देवताओं का संदेश कह दिया. अब आपको उत्तर में जो उचित लगे वह कहें, वह करें.नई कथाओं के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें.
दमयन्ती ने देवताओं को प्रणामकर कहा- राजा नल, मैं आपको ही अपना सर्वस्व मानकर स्वयं को आपके चरणों में सौंपना चाहती हूं. जब से मैंने हंसों की बात सुनी है, तभी से मैं आपके लिए व्याकुल हूं. यदि आप अस्वीकार कर देंगे तो मैं प्राण त्याग दूंगी.
नल ने दमयन्ती से कहा- लोकपालों को छोड़कर तुम मुझ मनुष्य से क्यों विवाह करना चाहती हो. मैं तो देवताओं के चरणों की धूल के बराबर भी नहीं. तुम अपना मन उन्हीं में लगाओ. देवताओं का अप्रिय करने पर तुम्हारी और मेरी मृत्यु हो सकती है. तुम मेरी रक्षा करो और उनका वरण कर लो.नल की बात सुनकर दमयन्ती घबराकर रोने लगी. दमयन्ती ने साफ कह दिया कि प्राण जाते हैं तो जाएं पर वह नल के अलावा किसी और से विवाह नहीं करेगी. नल ने समझाया कि मैं लोकपालों का दूत हूं. कर्तव्य से बंधा हुआ हूं. यदि मैं अपने विवाह की बात करूं तो यह अपराध होगा.
दमयंती रूपवती के साथ बुद्धिमति भी थी. उसने नल को एक उपाय बताया- आप वचनबद्ध हैं मैं नहीं. एक उपाय है. आप सभी लोकपालों के साथ स्वयंवर में आएं. मैं आपको वर लूंगी. तब आपको दोष भी नहीं लगेगा, मेरा मनोरथ भी पूरा हो जाएगा.
नल ने देवताओं को महल के अंदर हुई सारी बात बता दी.
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नल ने कहा- मैं आपसब की आज्ञा से दमयंती के पास गया. आपका संदेश दिया और दमयंती को आपसे विवाह के लिए बहुत समझाया पर उसने हठ लगा रखी है. वह मुझसे ही विवाह करेगी अन्यथा प्राण दे देगी. उसकी बात में दृढता थी. मुझे विश्वास है वह ऐसा ही करेगी. आपसब उसके असमय मृत्यु का दोष लेना चाहेंगे?
देवताओं को चिंता तो हुई पर उन्होंने आस नहीं छोड़ी. इंद्र ने नल से कहा- इसका निश्चय स्वयंवर के बाद होगा. संभव है हमारा वर्णन करने में तुमसे कोई कमी रह गई हो. कल स्वयंवर में हमें देखकर वह विचार बदल ले.
राजकुमारी दमयंती के स्वयंवर का भव्य आयोजन किया. दमयन्ती स्वयंवर में आईं. सभी राजाओं का परिचय दिया जाने लगा. दमयन्ती की आंखें तो राजा नल को खोज रही थीं.यह बात इंद्र समेत चारों देवता जानते थे. सभी देवताओं ने नल का रूप धारण कर लिया. दमयंती को एक साथ पांच नल दिखाई पड़े. दमयन्ती समझ गईं कि ये वही देवतागण हैं जिन्होंने विवाह का प्रस्ताव भेजा था.नई कथाओं के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें.
नल की पहचान असंभव लगने लगी तो दमयंती ने उन्हीं देवों की मदद मांगी. उसने हाथ जोड़कर देवताओं की स्तुति की.
दमयंती ने कहा- हे मेरे आराध्य देवताओं, हे लोकपालों हंसों के मुंह से राजा नल का वर्णन सुनकर मैंने उन्हें पतिरूप में वरण कर लिया है. मैं नल के अतिरिक्त किसी और से विवाह की सोच भी नहीं सकती. आप लोग अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे मैं राजा नल को पहचान लूं. मेरी श्रद्धा मेरी भक्ति की लाज रखें देव.
देवता दमयन्ती के अटूट प्रेम से प्रसन्न हो गए. वे अपना रूप सबके सामने तो बदल नहीं सकते थे. इसलिए दमयंती को ऐसी शक्ति दी जिससे वह देवता और मनुष्य में अंतर कर सके.दमयंती ने नल को पहचान कर उनका वरण किया. इस तरह राजा नल और दमयन्ती का विवाह हो गया. नल वचन के पालन के लिए अपने प्रेम के त्याग को तैयार हुए थे. इससे प्रसन्न देवताओं ने राजा नल को भी कई वरदान दिए.
इंद्र ने वरदान दिया- मैं तुम्हें यज्ञ में प्रत्य दर्शन देकर सद्गति प्रदान करुंगा.
अग्नि ने कहा- राजा नल तुम जहां चाहोगे मैं वहां प्रकट हो जाउंगा.
धर्मराज ने कहा- तुम्हारी धर्म में निष्ठा बनी रहेगी और तुम्हारे पकाए भोजन में उत्तम स्वाद होगा.
वरुण बोले- तुम्हारी इच्छानुसार जल प्रकट हो जाएगा. तुम्हारी पुष्पमालाओं में दिव्य सुगंध होगी जिनका कभी नाश नहीं होगा.
उत्तम वरदान देकर देवता अपने-अपने लोकों की ओर चले पर होनी तो कुछ और ही थी.
देवता अपने लोक की ओर चले. मार्ग में देवताओं की भेंट कलयुग और द्वापर से हो गई. इन्द्र ने कलयुग से पूछा कि कहां जा रहे हो?
कलियुग ने कहा- मैं दमयन्ती के स्वयंवर में उससे विवाह के लिए जा रहा हूं.
इन्द्र ने बताया कि स्वयंवर पूरा हो गया है. दमयन्ती ने राजा नल का वरण कर लिया है. हम लोग देखते ही रह गए. यह सुनकर कलयुग बड़ा क्रोधित हुआ.
आवेश में आकर वह बोला- उसने देवताओं की उपेक्षा करके मनुष्य को अपनाया. इस बात का दमयंती को दंड मिलना चाहिए.
देवताओं ने कहा- दमयंती ने हमारी आज्ञा लेकर ही नल का वरण किया है. वास्तव में नल सर्वगुण सम्पन्न और उसके योग्य हैं. वह धर्मपरायण और वेदों के ज्ञाता हैं. उन्हें शाप देना नरक में धधकती आग में गिरने समान है.
कलयुग ने द्वापर से कहा- मैं अपने क्रोध को शान्त नहीं कर सकता. इसलिए मैं नल के शरीर में निवास करूंगा. मैं उसे राज्यविहीन कर दूंगा तो वह दमयंती के साथ नहीं रह सकेगा. द्वापर तुम जुए के पासों में प्रवेश करके इस कार्य में मेरी सहायता करना.
द्वापर, कलियुग की बातों में आ गया.नई कथाओं के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें.
कलियुग और द्वापर दोनों नल की राजधानी में आ बसे. दो युगों के मिलन से अनिष्ट तो होना ही था. राजा नल यज्ञों का आयोजन करते रहे. धर्मकार्यों से देवताओं को प्रसन्न करते रहे. दमयंती ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया.
बारह वर्ष तक द्वापर और कलियुग नल में किसी दोष की ताक में रहे. एक दिन वह समय आ गया जब उन्हें प्रतिशोध का अवसर मिला.
एक बार की बात है. संध्या के समय नल लघुशंका से निवृत होकर आए. भूलवश वह पैर धोए बिना ही आचमन करके संध्यावंदना करने बैठ गए. अपवित्र अवस्था में देखकर कलियुग नल के शरीर में प्रवेश कर गया. कलयुग ने दूसरा रूप धारण कियाऔर नल के भाई पुष्कर को अपनी बातों में उलझा लिया.उसने पुष्कर को समझाया कि नल को जुए में हराकर उसका राज-पाट मांग लो. मैं और द्वापर मिलकर तुम्हारी जीत पक्की करेंगे. पुष्कर ने कलियुग के सिखाने पर नल को जुए की चुनौती दी.
द्वापर ने पासे का रूप धारण किया और पुष्कर की सहायता के लिए उसके साथ चला. पुष्कर बार-बार राजा नल को जुए की चुनौती देने लगा.
दमयंती ने नल को हर बार रोका पर नल पत्नी के सामने भाई की बार-बार की ललकार सह न सके. उन्होंने जुआ खेलने का निश्चय किया. दमयंती समझ गई कि अब विपत्ति का समय आ चुका है. उसने अपनी संतानों को तत्काल अपने पिता के पास रवाना कर दिया. कलियुग के प्रभाव में नल जुए में सर्वस्व हार गए.
मंत्रियों के रोकने पर नल न माने तो दरबारियों ने रानी से आग्रह किया. दमयंती उन्हें विनाश से सावधान करती रोने लगी लेकिन कलियुग के प्रभाव में पड़े नल शून्य रहे.
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सर्वस्व गंवाकर नल अपनी पत्नी के साथ सिर्फ एक वस्त्र में राज्य से निकले. पुष्कर ने घोषणा कर दी थी कि जो भी प्रजा नल की सहायता करेगी उसे प्राणदंड मिलेगा. नल को कोई आश्रय न मिला. जुए का दंड इतना ही न मिलना था. अभी तो बहुत कुछ बाकी था.
एक दिन नल को बहुत से पक्षी दिखाई दिए जिनके पंख सोने के समान चमक रहे हैं. नल ने सोचा इनकी पंख से कुछ धन मिलेगा. नल ने अपनी धोती सोने के पक्षियों को फंसाने के लिए उछाल दी. पक्षी नल का वस्त्र लेकर ही उड़ गए. अब नल निवस्त्र होकर दीनता के साथ खड़े थे.
पक्षियों ने कहा- तुम नगर से एक वस्त्र पहनकर निकले थे. उसे देखकर हमें बड़ा दुख हुआ था. अब हम तेरे शरीर का वस्त्र लिए जा रहे हैं. हम पक्षी नहीं जुए के पासे हैं.नल ने दमयन्ती से पासे की बात बताई. ऐसी स्थिति में अपनी पत्नी के समक्ष उन्हें अपमान भी महसूस होता था. दमयंती परम रूपसी है, राजकुमारी है. उसे अपना भविष्य तय करने का अवसर दे देना चााहिए. यह सोचकर नल दमयंती को उस नगर के बारे में बताने लगे.
नल ने कहा- तुम देख रही हो, यहां बहुत से रास्ते हैं. एक अवन्ती की ओर जाता है, दूसरा दक्षिण देश को. सामने विन्ध्याचल पर्वत है. सामने का रास्ता विदर्भ को जाता है. यह कौसल देश का मार्ग है. नल दमयन्ती को भिन्न-भिन्न मार्ग बताने लगे.
दमयन्ती आशय समझ गई. दमयंती ने कहा- क्या आपको लगता है कि मैं आपको छोड़कर अकेली कहीं जा सकती हूं! दुख के समय पत्नी पुरुष के लिए औषधि समान है. वह धैर्य देकर पति के दुख कम करती है. लेकिन राजा नल दमयंती को त्यागने का फैसला कर लिया था.
कल तक नल राजा थे, आज शरीर पर वस्त्र नहीं है. सोने को चटाई तक नहीं है. उनकी करनी को पत्नी क्यों भरे. वह तो अपने पिता के पास जा सकती है. दमयंती सो गई तो नल ने एक कड़ा निर्णय किया.
दमयन्ती के सो जाने पर नल सोचने लगे कि दमयंती मुझ से बड़ा प्रेम करती हैं. प्रेमवश उसे इतना दुख झेलना पड़ेगा. यदि मैं इसे छोड़कर चला जाऊं तो संभव है कि इसे सुख प्राप्त हो. दमयन्ती सच्ची पतिव्रता है. इसके सतीत्व को कोई भंग नहीं कर सकता. अपने सतीत्व की रक्षा करने में समर्थ है. मैं नंगा हूं और दमयन्ती के शरीर पर भी केवल एक ही वस्त्र है.
नल ने दमयंती की साड़ी आधी फाड़ ली और उससे शरीर ढंककर दमयंती को वहीं छोड़कर निकल पड़े. उन्हें विचार आ रहा था कि दमयंती आज अनाथ के समान आधा वस्त्र पहने धूल में सो रही है.
यह मेरे बिना दुखी होकर वन में कैसे रहेगी? नल ने दमयंती से क्षमा मांगते हुए मन में विचारा- मैं तुम्हे छोड़कर जा रहा हूं. सभी देवता तुम्हारी रक्षा करें.नल का हृदय बैठा जा रहा था. नल के शरीर में कलियुग का वास था इसीलिए वह अपनी पत्नी को वन में अकेली छोड़कर वहां से चले गए. जब दमयंती की नींद टूटी, तब उसने देखा कि राजा नल वहां नहीं है. वह नल को चारों तरफ खोजने लगी.
दमयंती हारकर विलाप करने लगी. वह भटकती हुई जंगल के बीच जा पहुंची. वहां एक अजगर दमयंती को निगलने लगा. दमयंती मदद के लिए चिल्लाने लगी.
उधर से गुजर रहे एक व्याध(शिकारी) ने सुन लिया. उसने तेज शस्त्र से अजगर का मुंह चीर डाला. फिर दमयन्ती को छुड़ाकर नहलाया, आश्वासन देकर भोजन करवाया.
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व्याध दमयन्ती पर मोहित हो चुका था. वह दमयंती से मीठी-मीठी बातें करके उसे प्रभावित करने की कोशिश करने लगा. दमयन्ती उसके मन के भाव समझ गई. व्याघ ने दमयंती के साथ व्याभिचार का प्रयास किया.
दमयंती ने क्रोधित होकर शाप दिया- मैंने राजा नल के अलावा किसी और का चिंतन कभी नहीं किया हो तो यह व्याध मरकर गिर पड़े. दमयंती के कहते ही व्याध के प्राण निकल गए.
दमयंती राजा नल को खोजती चलती रही. तीन दिन रात दिन रात बीत जाने के बाद दमयंती एक तपोवन दिखा जहां बहुत से ऋषि निवास करते हैं. दमयन्ती ने ऋषियों को अपना परिचय देकर सारी कहानी सुनाई. तपस्वियों ने उसे आशीर्वाद दिया कि नल को शीघ्र ही निषध का राज्य वापस मिल जाएगा. उसके शत्रु भयभीत होंगे व और कुटुंबी आनंदित होंगे. ऋषि अंर्तध्यान हो गए.दमयंती रोती हुई एक अशोक के वृक्ष के पास पहुंचकर बोली तू मेरा शोक मिटा दे. तू अपने शोक नाशक नाम को सार्थक कर. दमयन्ती ने अशोक की परिक्रमा की और वह आगे बढ़ी.
आगे उसे व्यापारियों का एक झुंड दिखा. वे चेदिदेश जा रहे हैं. उनके साथ दमयंती चल पड़ी. रास्ते में जंगली हाथियों के झुंड ने दल पर धावा बोला. दमयंती वहां से किसी तरह जान बचाकर भागी और राजा सुबाहु के नगर में पहुंची. उस समय राजमाता महल के बाहर खिड़की से देख रही थीं.
राजमहल की छत से रानी ने दमयंती को देखा तो सोचा ऐसी रूपवती से शृंगार के गुर सीखने चाहिए. उसे अपने आप बुलाकर अपनी सेवा में लगा लिया. दमयंती ने रानी की सेवा की बात तो स्वीकार ली किंतु तीन शर्त रखे.
दमयंती ने कहा- पहली शर्त है मैं झूठा नहीं खाऊंगी. दूसरी शर्त मैं किसी कै पैर नहीं धोऊंगी. तीसरी शर्त कि मैं परपुरुष से बात नहीं करुंगी.
रानी ने शर्तें मंजूर कर लीं. दमयंती महल में ही रहने लगी.जिस समय राजा नल दमयन्ती को सोती छोड़कर आगे बढ़े, उस समय वन में आग लग रही थी. तभी नल को आवाज आई. राजा नल- मुझे बचाओ. नागराज कुंडली बांधकर पड़ा हुआ था.
उसने नल से कहा- मैं कर्कोटक नाम का सर्प हूं. मैंने नारद मुनि को धोखा दिया था. उन्होंने शाप दिया कि जब तक राजा नल तुम्हें न उठावें, तब तक यहीं पड़े रहना. उनके उठाने पर तू शाप से छूटेगा. शाप के कारण मैं यहां से एक भी कदम आगे नहीं बढ़ सकता.
नल कर्कोटक को उठाकर दावानल से बाहर ले आए. कार्कोटक ने कहा तुम अभी मुझे जमीन पर मत डालो. कुछ कदम गिनकर चलो. राजा नल गिनती करके कदम रखने लगे.
करीब पांच लाख लोग रोज सुबह प्रभु शरणम् की सहायता से अपनी दैनिक पूजा करते हैं. ऐसा कई साल से लगातार हो रहा है. आप भी देखें.
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उन्होंने ज्योंहि पृथ्वी पर दसवां कदम रखा तो उनके मुंह से निकला-दस. कर्कोटक ने उन्हें डस लिया. कर्कोटक ने नियम बना रखा था कि जब कोई बोलेगा डंस तभी वह किसी को डंसेगा, अन्यथा नहीं.
नल हतप्रभ थे. उपकार का बदले में ऐसा अपकार.
तब कर्कोटक ने कहा- महाराज इसी में आपका लाभ है. आपको कोई पहचान ना सके इसलिए मैंने डंस के आपका रूप बदल दिया है. कलियुग ने आपको बहुत दुख दिया है. अब मेरे विष से वह आपके शरीर में बहुत दुखी रहेगा. आपने मेरी रक्षा की है. मेरे प्रभाव से हिंसक पशु-पक्षी शत्रु का कोई भय नहीं रहेगा.आपपर किसी भी विष का प्रभाव नहीं होगा. युद्ध में हमेशा आपकी जीत होगी.नई कथाओं के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें.
कर्कोटक ने नल को दो दिव्य वस्त्र दिए. उसने नल से कहा कि जब भी अपने पूर्व रूप में आना हो यह वस्त्र पहन लेना. कर्कोटक अंर्तध्यान हो गया. नल वहां से चलकर दसवें दिन राजा ऋतुपर्ण की राजधानी अयोध्या में पहुंच गए.
वहां वह बाहुक के नाम से रहने लगे. राजा के घोड़ों के प्रशिक्षण का कार्य मिल गया. राजा नल रोज दमयन्ती को याद करते और दुखी होते कि दमयन्ती भूख-प्यास से परेशान ना जाने किस स्थिति में होगी. सांप के डसे जाने से वह कुरूप हो गए थे. इसलिए ऋतुपर्ण के पास उन्हें कोई ना पहचान सका.
राजा विदर्भ को समाचार मिला कि दामाद नल और पुत्री राजपाटविहीन होकर वन में चले गए हैं. उन्होंने सुदेव नामक ब्राह्मण को नल दमयंती का पता लगाने के लिए चेदिनरेश के राज्य में भेजा.खोजते-खोजते सुदेव को दमयंती राजमहल में दमयंती में दिख गई. दमयंती ने भी सुदेव को पहचान लिया. वह परिवार में सबका कुशल-मंगल पूछते रो पड़ी. सुदेव ने राजमाता को दमयंती का वास्तिवक परिचय दिया. दमंयती वास्तव में राजमाता की बहन की पुत्री थी.
दमयंती पिता के पास आ गई थी और नल को भी एक आसरा मिल गया था. दमयंती नल के लिए उदास रहती थी. उसने अपनी माता से कहा- यदि मेरे पति से मेरा मिलन न हुआ तो तो मैं प्राण त्याग दूंगी. उन्हें खोजने के लिए लोगों को हर ओर भेजिए. नल को खोजने के लिए ब्राह्मणों का एक दल नियुक्त किया.
दमयंती ने ब्राह्मणों को एक रहस्य बताया- आप जहां भी जाएं वहां भीड़ में यह कहें कि तुमने आधी साड़ी में दासी को जिस अवस्था में छोड़ा था, वह आपकी प्रतीक्षा कर रही है. ब्राह्मण हर जगह जाकर यही बात सुनाने लगे. कई दिनों बाद एक ब्राह्मण वापस आया.एक ब्राह्मण ने राजा ऋतुपर्ण के यहां वही बात दोहराई. जब वह चलने लगा तब राजा के सारथी बाहुक ने जो कि नल थे उसे एकान्त में बुलाया.
बाहुक ने कहा- उच्चकुल की स्त्रियों के पति उन्हें छोड़ भी दें तो भी वे अपने शील की रक्षा करती हैं. त्याग करने वाला पुरुष विपत्ति का मारा है इसलिए उस पर क्रोध करना उचित नहीं. वह उस समय बहुत परेशान था. जब प्राणरक्षा के लिए जीविका चाह रहा था तब पक्षी उसके वस्त्र लेकर उड़ गए.नई कथाओं के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें.
ब्राह्मण ने यह बात दमयंती को बताई तो वह जान गई कि बाहुक ही राजा नल हैं. उसने माता को सारी बात बताई और बात को गुप्त रखने को कहा.
सुदैव को राजा का संदेश लेकर अयोध्या भेजा गया. दमयंती ने सुदेव से कहा- अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण से कहिए नल जीवित है या नहीं ईश्वर जाने. दमयंती पुनः स्वयंवर रचा रही है. बड़े-बड़े राजा और राजकुमार जा रहे हैं. कल सूर्योदय पूर्व वह पति का चयन करेगी. आप पहुंच सकें तो वहां जाइए.
सुदेव ने राजा ऋतुपर्ण से ऐसा ही कहा. ऋतुपर्ण ने बाहुक को बुलाया और कहा- कल दमयंती का स्वयंवर है. हमें शीघ्र वहां पहुंचना है. तुम मेरे शीघ्र पहुंचने का प्रबंध करो.ऋतुपर्ण की बात सुनकर नल का कलेजा फटने लगा. सोचा कि दमयंती ने दुखी और अचेत होकर ही ऐसा किया होगा. ऋतुपर्ण के रथ को नल हांक रहे थे. ऋतुपर्ण बाहुक पर विश्वास करते थे. रास्ते में ऋतुपर्ण ने कहा कि मैं तुम्हें पासे के वशीकरण की विद्या सिखा सकता हूं. बदले में तुम मुझे घोड़ों की विद्या सिखा दो.
नल ने पासे को वश में करने की विद्या जैसे ही सीखी, कलियुग नल के शरीर से बाहर आ गया. कलियुग ने नल का पीछा छोड़ दिया था लेकिन अभी नल का रूप नहीं बदला था. वह वैसे ही कुरुप थे. तेजी से रथ हांकते शाम होते-होते वे विदर्भ पहुंच गए. राजा भीमक ने ऋतुपर्ण को अपने महल बुलाया.
ऋतुपर्ण के रथ की गूंज से चारों दिशाएं गूंज उठीं. दमयंती रथ की घरघराहट से समझ गई कि जरूर इसको हांकने वाले मेरे पति हैं. अयोध्या नरेश ऋतुपर्ण का भीमक के दरबार में बहुत सत्कार हुआ. भीमक को पता नहीं था कि वे स्वयंवर का निमंत्रण पाकर आए हैं.
जब ऋतुपर्ण ने स्वयंवर की कोई तैयारी नहीं देखी तो समझ गए कि किसी ने गलत सूचना दी है. उन्होंने स्वयंवर की बात दबा दी.
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भीमक ने आने का कारण पूछा तो ऋतुपर्ण ने कहा कि वह सिर्फ भीमक को प्रणाम कहने आए हैं. बाहुक अश्वशाला में ठहरकर घोड़ों की सेवा में लग गया. दमयंती नल के दर्शन के लिए व्याकुल हो रही थी पर नल कहीं दिखते ही न थे. नल तो यही जानते थे कि दमयंती पुनः विवाह कर रही है. अतः वह अपना वेश बदलकर ही रहे.
दमयंती ने दासी को अश्वशाला भेजा और सारथी के बारे में पता लगाने को कहा. दासी ने बाहुक से राजा नल के बारे में पूछा.
बाहुक ने कहा- मुझे उसके संबंध में कुछ भी मालूम नहीं. सिर्फ इतना पता है कि इस समय नल का रूप बदल गया है. वह छिपकर रहते हैं. उन्हें या तो स्वयं वह या उनकी पत्नी दमयंती ही पहचान सकते हैं. अब दमयंती को यकीन होने लगा कि यही राजा नल है.
उसने दासी से कहा- तुम बाहुक के पास जाओ. बिना कुछ बोले देखती रहो और उनकी भाव-भंगिमाओं पर ध्यान दो. आग मांगे तो मत देना, जल मांगे तो देर कर देना. फिर सारी बात मुझे आकर कहो.
दासी ने आकर बताया कि बाहुक ने हर तरह से अग्रि, जल व थल पर विजय प्राप्त कर ली है. वह देवताओं जैसे हैं. मैंने आज तक ऐसा पुरुष नहीं देखा. दमयंती को विश्वास हो गया कि बाहुक ही राजा नल है.नई कथाओं के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें.
दमयंती ने स्वयं बाहुक की परीक्षा लेने का निश्चय किया. बाहुक को महल में बुलवाया गया. दमयंती ने बाहुक के सामने फिर सारी बात दोहराई. दमयंती की आखों से आंसू टपकने लगे. इसे देखकर नल से रहा नहीं गया.
नल बोल पड़े- मैंने तुम्हें जानबूझकर नहीं छोड़ा. न ही जुआ खेला. यह सब कलियुग की करतूत है.
दमयंती ने कहा- मैं आपके चरणों को स्पर्श करके कहती हूं कि मैंने कभी परपुरुष का चिंतन नहीं किया. यदि किया हो तो मेरे प्राण निकल जाएं.
ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर राजा नल ने अपना संदेह छोड़ दिया. कार्कोटक नाग के दिए वस्त्र को ओढ़कर उसका स्मरण करके असली रूप में आ गए. दोनों ने सबका आर्शीवाद लिया. भीमक ने दमयंती को खूब धन देकर विदा किया.
उसके बाद नल व दमयंती अपने राज्य में आए. राजा नल ने पुष्कर से फिर जूआ खेलने को कहा तो वह खुशी-खुशी तैयार हो गया. नल को अब पासे के वशीकरण की कला आती छी. उसने पासे को अपने वश में कर लिया और जूए की हर बाजी जीत ली. इस तरह नल व दमयंती को फिर से अपना राज्य प्राप्त हो गया. वे अपने संतान के साथ सुखपूर्वक रहने लगे.
दमयंती को देवताओं का वरदान था. अखंड पतिव्रता थी. जहां पति-पत्नी में बहुत मतभेद हो जाए. तलाक की नौबत आ जाए तो दमयंती स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. इससे मनमुटाव दूर होता है और प्रेम जाग्रत होता है. दमयंती स्तोत्र का लाभ होता है. बहुतों की आजमाई हुई बात है.
कलियुग के षडयंत्र के कारण नल के साथ और भी बहुत कुछ बीता था. ऊपर की कथा मैंने छोटी करने के लिए वह भाग निकाल दिया. वह भाग महाभारत में विस्तार से नहीं आता पर कई ग्रंथों में आता है. नल पर शनि का प्रकोप भी हुआ था. जुआ खेलने से शनि क्रोधित होते हैं. नल ने जुआ खेला था. इसका साढ़ेसाती में कड़ा दंड उन्हें भोगना पड़ा था.
आपने शनि चालीसा पढ़ी हो तो उसमें चौपाई आती है- तैसे नल पर दशा सिरानी, भूंजी मीन कूद गई पानी. यह कहानी प्रभु शरणम् ऐप्प में शीघ्र प्रकाशित होगी. कृपया ऐप्प नीचे दिए लिंक से डाउनलोड कर लें.
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