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कुंभ कथाः नागों की माता कद्रू ने बहन विनता से लगाई बाजी, छल से शर्त जीतकर बना लिया बहन को दासी

कुंभ कथाः नागों की माता कद्रू ने बहन विनता से लगाई बाजी, छल से शर्त जीतकर बना लिया बहन को दासी

krishna
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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कुंभ की दो कथाओं में से एक का नाता गरूड़ का अपनी माता को दासता से मुक्त कराने से जुड़ा है. अपनी माता को दासता से मुक्त करने के लिए अमृत लाने की शर्त रखी गई थी. अमृत कलश लेने के लिए गरूड़ को देवताओं से युद्ध करना पड़ा.

इंद्र के वज्र प्रहार से गरूड़ डगमगाए और कलश से अमृत छलककर पृथ्वी पर चार जगह गिरा. वहां कुंभ आय़ोजन होता है. कथा संक्षेप में सुनाने में कुछ छूट न जाए, अतः विवाद व उसकी पृष्ठभूमि की कथा भी सुना देते हैं. शुरूआत गरूड़ की जन्मकथा से.

दक्ष प्रजापति ने अपनी कई बेटियां कश्यप ऋषि से ब्याहीं थीं. बाद में अपनी दो अन्य बेटियों, कद्रू और विनता का विवाह भी कश्यप से ही कर दिया. कद्रू और विनता दोनों का आपस में अगाध प्रेम था.

एक शाम कश्यप ने दोनों से प्रसन्न होकर कहा- मैं तुम दोनों की सेवा से संतुष्ट हूं. कोई मनचाहा वर मांग लो. कद्रू ने मांगा- मैं एक हजार तेजस्वी नागों की माता बनूं.

कश्यप ने विनीता से पूछा तो वह बोलीं- स्वामी, मुझे तो भले ही बस दो ही संतानें हों पर वे शरीर, बल और विक्रम में कद्रू के समस्त पुत्रों से बढ-चढ कर हों. कश्यप ने वरदान दे दिया.

दोनों कश्यप के वरदान के फलीभूत होने की प्रतीक्षा अधीरता से करने लगीं. सौ वर्ष पूरे होने पर कद्रू ने हजार अंडे जन्म दिए जिसमें से तत्काल हजार चपल चमचमाते विषधर नाग निकले.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वरदान के अनुसार विनता ने भी संतान रूप में दो अंडे जन्मे पर उनमें से बच्चे नहीं निकले. वह अंडे से संतान के बाहर निकलने की प्रतीक्षा करने लगी. कद्रू के बच्चों को देख विनता को भी संतान की ललक लगती पर वह मन मसोस कर रह जाती.

आखिर एक दिन विनता का धैर्य जवाब दे गया. उसने अपने ही हाथों से एक अंडा फोड़ डाला. उस अंड़े से जो बच्चा निकला वह ऊपरी आधे शरीर से तो हृष्ट पुष्ट हो चुका था पर उसके नीचे का आधा शरीर अभी अविकसित और कमजोर था.

नवजात शिशु अपनी मां के इस कृत्य पर बहुत क्रोधित हुआ. उसने अपनी माता विनता को श्राप दिया कि तूने लोभ और डाहवश मेरे अधूरे शरीर को ही निकाल लिया इसलिए तू जिससे डाह करती है अपनी उसी सौत की पाँच सौ वर्ष तक दासी रहेगी.

विनता बहुत घबरायी और उसने श्राप मुक्ति का उपाय पूछा. शिशु बोला- दूसरा बालक बलवान और तेजस्वी होगा. चाहे तो पाँच सौ वर्ष तक प्रतीक्षा कर. वही बालक तुझे इस श्राप से मुक्त करेगा.

इस प्रकार शाप देकर वह बालक आकाश में उड़ गया और सूर्य के रथ का सारथी अरूण बन गया. भगवान सूर्य के तेज के आगे कुछ भी नहीं दिखता परंतु सूर्योदय से ठीक पहले भोर की जो लालिमा है वह उसी बालक की झलक है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.विनता अपने दूसरे पुत्र की प्रतीक्षा करने लगी. इसी बीच देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र-मंथन किया. कद्रू और विनता भी मंथन स्थल पर पहुंचकर अन्य लोगों के साथ मंथन देखने लगे.

मंथन से निकले उच्चैःश्रवा घोड़े को देखकर कद्रू ने विनता से पूछा- जल्दी से बताओ इस घोड़े का रंग क्या है. विनता ने कहा निश्चय ही यह अश्वराज श्वेत है. कद्रू ने कहा- इस घोड़े का शरीर तो सफेद है, पर पूंछ काली है.

विनता ने कहा- नहीं तुम्हें दृष्टिभ्रम हुआ है. मैं शर्त लगा सकती हूं. यह अश्व पूर्णरूप से श्वेत है. कद्रू को क्रोध आया. वह विनता से बोली- यदि तुम्हारी बात ठीक हो तो मैं तुम्हारी दासी बनकर रहूंगी और मेरी बात ठीक हो तो तुम मेरी दासी बनोगी.

दोनों बहनों में तय हुआ कि घोड़े को कल समीप से देखा जाएगा. विनता यह सोचते-सोचते वापस गई कि जब अश्व पूरी तरह सफेद है तो कद्रू ने पूंछ को काला कह कर शर्त क्यों लगायी?

उधर कद्रू ने विनता को धोखे से हरा देने के विचार से अपने हजार पुत्रों को आज्ञा दी कि तुम लोग काले बाल बनकर उच्चैःश्रवा की पूंछ ढंक लो, जिससे मैं बाजी जीत जाऊं. अन्यथा मुझे दासी बनना पड़ेगा.

पुत्रों ने कहा- माता यह सरासर धोखा है और यह अनैतिक कार्य स्वीकारने योग्य नहीं है. सर्पों के इस तरह के नकार से कद्रू कुपित हो उठी. कद्रू ने अपने पुत्रों को शाप दे दिया कि तुम सभी राजा जनमेजय के यज्ञ में जल कर भस्म हो जाओगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पहले तो इस क्रूर श्राप का समाचार को सुनकर देवतागण चिंतित हुए पर फिर सबकी राय बनी कि सांप न केवल लगातार बढते जा रहे हैं और किसी को भी डस लेते हैं सो श्राप बहुत अनुचित नहीं. उन्होंने कद्रू के श्राप को निरस्त नहीं किया.

कद्रू ने बेटों के बात न मानने पर पूरी योजना चौपट होने की आशंका में रात बिताई. दूसरे दिन भोर में ही घोड़े को निकट से देखने चलीं. उधर सर्पों ने आपस में विचार कर तय किया कि हमें माता की आज्ञा का पालन करना चाहिए.

यदि उसके मन का न हुआ तो हमें जला देगी. अगर इच्छा पूरी हो गयी तो हो सकता है प्रसन्न हो शाप से मुक्त कर दे. इसलिए चलो, समुद्र पार चल कर घोड़े की पूंछ काली कर ही दें.

वे घोड़े की पूंछ से बाल बनकर लिपट गए जिससे वह काली दिखने लगी. इधर कद्रू और विनता ने घोड़े के पास पहुंचकर देखा कि घोड़े का शरीर तो उज्जवल है पर पूंछ काली है. यह देखकर विनता उदास हो गई. कद्रू ने उसे अपनी दासी बना लिया.

(विनता के दूसरे अंडे का क्या हुआ. पुत्र के शाप के कारण मिली दासता से कैसे हुई मुक्ति यह कथा अगली पोस्ट में)

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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