स्त्री ने की नाग की रक्षा और कहा भाई, नाग ने की धर्म बहन के मान-सम्मान की रक्षाः नागपंचमी की कथा

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.नाग शिवजी के कंठाहार है. शिवपुराण में नागों के बारे में वर्णन है. बुधवार यानी कल नागपंचमी है. नागों की पूजा से शिवजी प्रसन्न होते हैं. नागपंचमी पर करनी चाहिए विशेष पूजा?
पूजा की विधि विस्तार से महादेव शिव शंभु एप्प में देख सकते हैं. Play Store में सर्च करें Mahadev Shiv Shambhu और डाउनलोड कर लें. एप्प के डाउनलोड में दिक्क्त हो तो 9871507036 पर अपना और शहर का नाम WhaatsApp कर दें.
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एक सेठजी के सात पुत्र थे. सातों का विवाह हो चुका था. सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदुषी और सुशील थी, परंतु उसका कोई भाई नहीं था.
एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने को पीली मिट्टी लाने के लिए सभी बहुओं को साथ चलने को कहा तो सभी डलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगीं. तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी.
यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा- मत मारो इसे? यह बेचारा निरपराध है. यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा. सर्प एक ओर जा बैठा.
तब छोटी बहू ने उस सर्प से कहा- हम अभी लौट कर आते हैं तुम यहां से जाना मत. यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और वहां कामकाज में फंसकर सर्प से जो वादा किया था उसे भूल गई.
उसे दूसरे दिन वह बात याद आई तो सब को साथ लेकर वहां पहुंची और सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली- सर्प भैया नमस्कार! सर्प ने कहा- तू भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, नहीं तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता.
वह बोली- भैया मुझसे भूल हो गई, उसकी क्षमा मांगती हूं. तब सर्प बोला- अच्छा, तू आज से मेरी बहिन हुई और मैं तेरा भाई हुआ. तुझे जो मांगना हो, मांग ले. वह बोली- भैया! मेरा कोई नहीं है, अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया.
कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप रखकर उसके घर आया और बोला-मेरी बहिन को भेज दो. सबने कहा कि इसके तो कोई भाई नहीं था. तो वह बोला- मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूं, बचपन में ही बाहर चला गया था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया. उसने मार्ग में बताया- मैं वहीं सर्प हूं, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूछ पकड़ लेना.
उसने कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई. वहां के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई. एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा-मैं काम से बाहर जा रही हूं. तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना.
उसे यह बात ध्यान न रही और उसने गर्म दूध पिला दिया जिसमें उसका मुख बेतरह जल गया. यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई परंतु सर्प के समझाने पर चुप हो गई. तब सर्प ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए.
तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चाँदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुंचा दिया. इतना धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा- तेरा भाई तो बड़ा धनवान है. तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए.
सर्प ने यह वचन सुना तो और सब वस्तुएं सोने की लाकर दे दीं. यह देखकर बड़ी बहू ने कहा- सोने की चीजों को झाड़ने की झाड़ू भी तो सोने की ही होनी चाहिए. तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी.
सर्प ने छोटी बहू को हीरे-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था. उस हार की प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि- सेठ की छोटी बहू का हार यहां मेरे पास आना चाहिए.
राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो. मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि छोटी बहू का हार महारानी को चाहिए. वह उससे लेकर मुझे दे दो. सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मंगाकर दे दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी. उसने अपने सर्प भाई को याद किया. भाई आया तो उसने प्रार्थना की- भैया! रानी ने हार छीन लिया है. तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे तब तक के लिए सर्प बन जाए.
डरकर जब वह हार मुझे लौटा दे तब हार हीरों और मणियों का हो जाए. सर्प ने ठीक वैसा ही किया. जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया. यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी.
यह देखकर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो. सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा? वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर उपस्थित हुए.
राजा ने छोटी बहू से पूछा- तूने क्या जादू किया है, मैं तुझे दण्ड दूंगा. छोटी बहू बोली- महाराज! धृष्टता क्षमा कीजिए, यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है.
यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा- मेरे सामने अभी इसे पहिनकर दिखाओ. छोटी बहू ने हार लेकर जैसे ही उसे पहना वैसे ही वह हीरे-मणियों का हो गया.
यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं. छोटी बहू अपने हार और उपहार के साथ घर लौट आई.
उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है. यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- ठीक-ठीक बता ये धन तुझे कौन देता है? वह सर्प को याद करने लगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
तब उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा- यदि मेरी धर्म बहिन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूंगा. यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया.
उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियां सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं. भाई से अपने कुटुंबजनों की रक्षा का आशीर्वाद मांगती है.
कल हम सर्प पूजा से जुड़ी कई प्रचलित दंतकथाएं लेकर आएंगे.
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