गृहस्थ आश्रम व कुलवृद्धि से विरक्ति के कारण लेना पड़ता फिर से जन्मः विरक्त प्रजापति रूचि का पितरों के आदेश से वृद्धावस्था में विवाह, रौच्य मनु का जन्म

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गृहस्थ आश्रम को मनुष्य के लिए आवश्यक और मोक्ष का कारक बताया गया है. मार्कंडेय और गरुड़ पुराण में प्रजापति रुचि की कथा से यह बात स्पष्ट हो जाती है.
प्रजापति रुचि की किसी भी भौतिक वस्तु में कोई रुचि न थी. सांसारिकता उन्हें छू भी नहीं गयी थी. रुचि ने न तो अपना घर बसाया और न ही किसी ऐश्वर्य भोग की चाहत. वह विरक्त-भाव से संसार में विचरण करते थे.
ब्रह्माजी ने प्रजापति की व्यवस्था सृष्टि की वृद्धि और उसकी रक्षा के लिए की थी. यदि प्रजापति विरक्त हो जाए तो सृष्टि के कार्य में बाधा पड़ती है. इससे ब्रह्मा की अवहेलना होती है.
उनके पितर भी दुखी थे कि यदि रुचि ने विवाह न किया तो कुल ही डूब जायेगा. अपनी संतान-परंपरा वह कैसे चला सकेंगे. पितरों ने रुचि को कर्तव्य बोध कराने का निर्णय लिया ताकि संसार का कल्याण हो सके.
रुचि के पितर रुचि के पास आए और कहा, ‘बेटा! गृहस्थ पुरुष ही समस्त देवताओं, पितरों, ऋषियों और अतिथियों की पूजा करके पुण्यमय लोकों को प्राप्त करता है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
अत: तुम गृहस्थ आश्रम स्वीकार करो तथा विवाह करके संतान उत्पन्न करो. अन्यथा तुम्हें इस कार्य को पूरा करने के लिए फिर जन्म ही नहीं लेना पड़ेगा बल्कि जन्म जन्मान्तर तक कष्ट उठाना पड़ेगा.
सांसारिकता की बात रुचि की समझ में न आई, उन्होंने कहा- पितरो! आप मुझे इस कर्म जाल में न फंसाएं. मैंने स्त्री-परिग्रह इसलिए नहीं किया क्योंकि ये ही दु:ख व पाप का कारण है. पुरुष को इंद्रियों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए.
पितर बोले- जो कर्म आसक्ति रहित होकर किया जाता है, वह बंधन का कारण नहीं बनता. अपने सांसारिक कर्म का पालन करते हुए जो मनुष्य संयम करते हैं, उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है.
अत: हमारा कहना मानकर विधिपूर्वक स्त्री-परिग्रह करो. किसी कन्या का हाथ ग्रहण करने और विवाह कर लेने में ही समाज, संसार और तुम्हारी सब की सब प्रकार से भलाई है. इतना कहकर पितर अदृश्य हो गए.
पितरों के इस आदेश से रुचि बहुत असमंजस में पड़ गये, बहुत सोच-विचार के बाद अंत में उन्होंने अपनी उलझन को दूर किया और समझ में आया कि पितरों की बात ठीक ही है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
इस सोच विचार में इतना समय निकल गया कि उनकी अवस्था ठीक न रही. विवाह करने के लिए रुचि अपनी वृद्धावस्था के विषय में सोचकर चिंतित थे क्योंकि न केवल यौवन बीत चुका था. तपस्या से उनका शरीर जर्जर हो गया था.
ऐसे में कौन उन्हें अपनी कन्या देगा? रुचि की चिंता पितरों तक पहुंची तो पितरों ने लीला से उनकी बुद्धि में प्रेरणा भरी कि तुम ब्रह्माजी की उपासना करो. वह पितामह हैं. उनकी कृपा से तुम्हारा मार्ग प्रशस्त होगा.
रुचि ने इस ज्ञात प्रेरणा से प्रेरित हो कर ब्रह्मा जी की आराधना आरंभ कर दी. शीघ्र ही ब्रह्मा जी महात्मा रुचि के तप से संतुष्ट हो गए. प्रसन्न होकर उन्हें वर प्रदान किया और कहा कि तुम श्रेष्ठ पत्नी की प्राप्ति हेतु अपने पितरों की स्तुति करो,
ब्रह्मा जी ने बताया, ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे तुम्हारे पितर संतुष्ट होकर तुम्हें न दे सकें. रुचि ने ब्रह्माजी के कथनानुसार एक नदी के एकान्त तट पर पितरों का तर्पण करने के बाद उनकी पूर्ण श्रद्धा व विश्वास से स्तुति की.
उस समय रुचि ने जो स्तुति की उसे ‘पितृ-स्तोत्र’ का नाम दिया गया. स्तुति पूरी होते होते रुचि के समक्ष एक बहुत ऊंचा तेज पुंज प्रकट हुआ, जो पूरे आकाश में व्याप्त हो गया.
तत्पश्चात् उस तेज से पितर प्रकट हुए, रुचि ने फल, फूल तथा अन्य सामग्री उन्हें अर्पित की, पितरों ने सब ग्रहण किया. पितर उनके स्वागत से बहुत प्रसन्न हुए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
प्रसन्न पितरों ने वर मांगने को कहा तो उसने अपने मनोनुकूल पत्नी प्राप्ति का वर मांगा. पितरों ने कहा, ‘तुम्हें शीघ्र ही एक दिव्य मनोहर पत्नी प्राप्त होगी. ऐसा कहकर वे अंतर्धान हो गए.
महात्मा रुचि पितरों की इस लीलामयी कृपा पर मुग्ध हो ही रहे थे कि उसी समय नदी के भीतर से, प्रम्लोचा नामक अप्सरा सभी सुलक्षणों से सम्पन्न एक मनोहर कन्या को लेकर प्रकट हुई.
रूपवती अप्सरा प्रम्लोचा रुचि से प्रार्थना करने लगी- महात्मन् यह मेरी अत्यन्त प्रिय तथा सभी प्रकार से मनोहर कन्या है, यह वरुण के पुत्र महात्मा पुष्कर से उत्पन्न हुई है. मैं इस सुन्दर कन्या को आपको समर्पित करती हूं, इसे ग्रहण कीजिये.
रुचि ने प्रम्लोचा की बात स्वीकार ली. विधि विधान से प्रम्लोचा ने कन्या प्रदान कर कहा- इससे तुम्हें एक महान् पुत्र प्राप्त होगा जो ‘मनु’ नाम से प्रसिद्ध होगा. रुचि सोचने लगे प्रलोम्चा भी वही कह रही है जैसा पितरों ने कहा था.
इसका अर्थ है कि उनका वर अमोघ-अचूक है. समय बीता और महात्मा रुचि की एक गृहस्थी बनी तो पितरों की कृपा से, संतान-परम्परा का क्रम निरन्तर बना रहा.
कुछ समय पश्चात रुचि के घर एक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ. रुचि का पुत्र होने से वह रौच्य-मनु के नाम से विख्यात हुआ. यही रौच्य ‘मनु’ होकर संपूर्ण पृथ्वी का स्वामी बने.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली