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तांत्रिक के फेर से महाकाली ने मासूम को बचाया(सत्यकथा)

तांत्रिक के फेर से महाकाली ने मासूम को बचाया(सत्यकथा)

तांत्रिक के चक्कर में कैसे जीवन पर बन आती है, उसकी मिसाल है यह सत्यकथा है। तंत्र-मंत्र और तांत्रिक के फेर से दूर रहने में ही भला है। आँखें खोलती सत्यकथा।

 

पश्चिम बंगाल की ये घटना बिल्कुल वास्तविक है, बस पात्रों की पहचान बदल दी गई है। कहानी है एक मासूम लड़की की, जो एक महिला तांत्रिक के वशीकरण प्रयोग में आकर सबकुछ भुला बैठी। नौबत यहां तक पहुंच जाती है, कि वह तांत्रिक अपनी काली साधना के लिए इसे एक पिशाच को अर्पित करने की तैयारी कर लेती है। लेकिन तभी इस लड़की ने सच्चे दिल से माता काली की प्रार्थना की, जिससे उसकी रक्षा हुई।

इस वास्तविक घटना को कथा के रुप में विशेेष तौर पर प्रभु शरणम् के पाठकों के लिए लिखा गया है। इस कहानी में एक बड़ा संदेश है, कि कभी भी अनजान तांत्रिकों के चक्कर में न पड़ें। अन्यथा इस कहानी की नायिका जैसी दुर्दशा हो सकती है।

तांत्रिक पुजारिन के शिकंजे में

मुझे आज भी वह दिन याद है | मुझे बस उस दिन ऑफिस जाना था और उसके बाद मैं एक लंबी छुट्टी पर जाने वाली थी | मैने किसी को कुछ नही बताया था, सोचा था कि, सब दोस्तों और सहेलियों को एक सरप्राइज दूंगी। काफ़ी दिनो से वह लोग मेरे साथ मिलकर एक पार्टी का प्लान बना रहे थे लेकिन मेरे पास टाइम ही नही होता था।  क्या करुं, मैं अब काम करने लगी थी और मेरे ज़्यादातर दोस्त अभी कॉलेज में ही थे।

खैर, आज सुबह उठने मे काफ़ी देर हो गई थी, इसके लिए मैं मौसम को ज़िम्मेदार ठहराउंगी, कल रात से ज़ोरदार बारिश हो रही थी और बिजली कड़क रही थी, इस लिए मैं जल्दी जल्दी नहा धो कर तैयार हो गई पर मुझे ड्राइयर से बाल सुखाने का मौका नही मिला, इसलिए मैने अपने अध गीले बालों का एक ढीला सा जूड़ा बनाया और एक अच्छी सी साड़ी और मैचिंग ब्लाऊज पहनकर अपना पर्स और एक छतरी लेकर निकल पड़ी ट्रेन पकड़ने|

स्टेशन के रास्ते मे फुटपाथ पर लगी खाने की दुकानो मे से ज़्यादातर अभी खुली ही नही थी।  पर चाय की दुकानें खुल चुकी थीं।  बरसात के मौसम मे गरम चाय की चुस्कियों का मज़ा ही कुछ और होता है। लेकिन मुझे थोड़ी हिचक महसूस हो रही थी | क्योंकि चाय की दुकानो मे खड़े मजदूर मुझे घूर रहे थे।

इसमें उनका भी क्या दोष? मेरी उम्र तो सिर्फ़ इक्कीस साल की थी। लोग बाग और दोस्तों के अनुसार मैं बेहद सुंदर हूं।

कुछ भी हो अभी चाय के लिए वक़्त भी नही था, अगर मैं चाय के लिए स्टेशन के स्टॉल मे भी रुकी तो मेरी 7.20 की ट्रेन छूट जाएगी | मैने घड़ी देखी और तेज़ कदमों से स्टेशन की ओर बढ़ने लगी |

चलते चलते अचानक मेरी नज़र एक बुज़ुर्ग औरत पर पड़ी वह कुछ उदास होकर एक बंद दुकान की सीढ़ियों पर बैठी हुई थी और आते जाते लोगों की ओर एक दबी हुई इच्छा ले कर देख रही थी, शक्ल और कपड़ों से तो वह कोई भिखारिन नहीं लग रही थी- शायद आसपास के किसी गाँव से आई होगी – जैसे ही उसकी नज़र मुझ पर पड़ी, ना जाने क्यों मुझे उस पर दया आ गयी -मैने घड़ी देखी, ७:१५ हो चुके थे।  पाँच मिनट में मैं दौड़ कर ट्रेन नही पकड़ सकती थी और अगली ट्रेन 07.45 की थी।|

मैने उस पास जा कर पूछा, “माता जी- क्या बात है, आप कुछ परेशान सी लग रही हैं?”

रास्ते से गुज़रता हुआ एक ट्रक ज़ोरदार हर्न बजा रहा था। शायद इसलिए शायद उस औरत को मेरी बात सुनाई नही दी, इसलिए मैने उसके पास जा कर झुक कर उससे दोबारा पूछा, “माता जी- क्या बात है, आप कुछ परेशान सी लग रही हैं?”

इतने मे ना जाने क्यों मेरा जूड़ा खुल गया और मेरे बाल खुलकर उस औरत के चेहरे के उपर बिखर गये। मेरा पल्लू भी सरक गया। जल्दबाजी में मैं पिन लगाना भूल गयी थी | मैनें जल्दी जल्दी अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और अपने बालों को समेट कर एक जूड़े में बाँधा और उनसे माफी माँगी | वह औरत मुस्कुरा कर बोली, “कोई बात नही बेटी, तू एक नारी है ..लंबे घने बाल औरत का गहना होता है”

मैं थोड़ा शर्मा गयी, “लेकिन आप कुछ परेशान सी लग रहीं हैं ..क्या बात है?”

“क्या बतायूं बेटी, मैं कल रात शहर आई थी दवाई लेने, पर मेरा सारा पैसा खो गया।  तब से मैं यहीं बैठी हुई हूँ आज कल बिना टिकट ट्रेन मे जाना मुनासिब नही है, अगर पकड़ी गई तो?”

“कहाँ जाना है, आपको?”

“धूमिया”, फिर से अचानक बिजली कडकी और तेज़ बारिश शुरू हो गयी |

धूमिया की गाड़ी प्लॅटफॉर्म नंबर पाँच से चलती थी और मेरी लोकल ट्रेन प्लॅटफॉर्म नंबर दो से | अगर मैं इसकी मदद करूँ तो मेरी ७: ४५ की ट्रेन भी छूट जाएगी | लेकिन ना जाने क्यों उस औरत को सिर्फ़ टिकट के पैसे देकर उसको उसके हाल पर छोड़ने का मेरा मन नहीं मान रहा था |

“आप मेरे साथ आइए, मैं आपको टिकट दिला कर ट्रेन मे बैठा दूँगी| “लेकिन उससे पहले आप मेरे साथ चाय ज़रूर पीजिये…”, मैने कहा |

यह बात तय थी उस औरत ने रात भर कुछ भी नही खाया होगा| अगर दुकाने खुली होती, तो शायद मैं कुछ खाने का इंतज़ाम भी करती, लेकिन इस वक़्त सारी दुकानें बंद थी |

उस औरत को उठने मे शायद सहारे की ज़रूरत थी, जो की मैने उसको दिया और तब मैने गौर किया कि उस औरत के हाथों की उंगलियों में तरह तरह कीअंगूठियाँ थी, कलाई और गले में रुद्राक्ष की माला |

पता नही क्यों उस औरत ने मुझ से कहा, “बेटी, अभी तेरे बाल गीले हैं| अपने बालों को खुला छोड़ दे…”

ना जाने उस औरत की बातों मे क्या जादू था मैने उसे अपनी छतरी के नीचे लेने के बाद अपने बाल खोल दिए |

वह मेरे बालों को सहलाती हुई मेरे से लिपट कर चल रही थी और बार बार बोल रही थी, “तू एक बहुत अच्छी लड़की है… मुझे तेरे जैसी किसी लड़की की तलाश थी।”

तब मुझे थोड़ा शक हुआ, इस औरत के हाथों मे अंगूठियाँ, गले और कलाई में रुद्राक्ष की माला… कहीं यह जादू टोने वाली तो नही है?धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-मैं जानती थी कि मुझे आज ऑफिस जाने में काफ़ी देर हो जाएगी, इसलिए मैने उस बुज़ुर्ग औरत को टिकट काउंटर की सीढ़ियों पर बिठा कर टिकट की लाइन मे खड़े होकर, अपने बॉस को फ़ोन लगाया, “सर, आज बारिश की वजह से ट्रेन लेट चल रही है | मुझे आने में देर होगी।”

“कोई बात नही संध्या, तुम एक काम क्यों नही करती? तुम्हारी छुट्टियाँ तो कल से शुरू हो रही है | आज मौसम भी कुछ ठीक नहीं है। तुम एक काम करो, तुम आज से ही छुट्टी ले लो।”

“लेकिन, सर, बॉस के मूड का कुछ पता नही, मैने तो सोचा था की वह मेरी हमेशा के लिए छुट्टी कर रहे हैं |

“अरे बाबा, तुम आज से ही छुट्टी लेलो | तुम्हे पाँच दिन की छुट्टी चाहिए था ना, उसकी जगह छह दिन की छुट्टी ले लो और इस महीने एक दिन शनिवार को शिफ्ट कर लेना। बस ख़तम हो गई बात। छुट्टी ले लो आज से ही…”

बाप रे बाप! जान में जान आई | पता नही आज बॉस इतना मेहरबान क्यों है?

“अरी बिटिया, किससे बात कर रही थी?”

“जी मैने अपने बॉस को फोन लगाया था… कह रही थी कि आज मुझे आने में देर हो जाएगी…”

“हाँ देर तो होगी ही… उसने तुझे आज छुट्टी दी की नहीं?”

यह सुन कर मैं बिल्कुल दंग रह गयी, “जी हाँ दे दी। लेकिन आपको कैसे मालूम?”

“अरी मेरी काफ़ी उमर हो गयी है, मैने तेरे से ज़्यादा दिन देखें हैं। आज का मौसम देख। अगर दिन ढलते ढलते मौसम और खराब हो गया तो? कौन ज़िम्मेदारी लेगा कि तू काम के बाद घर पहुँची कि नही?”

बात तो सही है |

फिर वह मुझ से कहने लगी, “बेटी, अगर हो सके तो तू मुझे मेरे घर तक छोड़ दे… मैं कल रात की जगी हुई हूँ… अगर ट्रेन मे ही सो गयी तो ना जाने कहाँ से कहाँ पहुँच जाउंगी”

मैने कुछ देर सोचा उसके बाद मैने तय किया कि आज तक कभी भी मैने गाँव नही देखा था, यह तो एक बेचारी सीधी साधी बुढ़िया है मेरा क्या बिगाड़ेगी।

वैसे आज घर जाने के बाद दिन भर सिवाय झख मारने के मैं करूँगी भी क्या? सारे के सारे दोस्त भी आज घर मे ही रहेंगे, आज कहीं प्लान बनाने का सवाल ही नही उठता… मौसम जो इतना खराब है…

“क्या सोच रही है”, बिटिया?”, उस बुज़ुर्ग औरत ने पूछा |

“जी, माता जी…कुछ नही”, मुझे समझ मे नही आ रहा था कि क्या कहूँ |

“यही ना, कि मैं तुझे अपने साथ कहीं चुरा के ना ले जाउँ?”

हाँ मेरे दिमाग़ में यह ख्याल एक बार आया ज़रूर होगा, लेकिन मैं बोल पड़ी, “जी माता जी, कुछ भी तो नही…”, फिर थोड़ा सोच कर मैंने फ़ैसला किया, “ठीक है, मैं आपके साथ धूमिया गाँव जाउंगी… आप को घर तक छोड़ कर आउंगी”

“मेरी अच्छी बिटिया, तू ना होती तो मेरा क्या होता? हाँ एक बात और बेटी… गाँव में लोग बाग मुझे माई कहते हैं… अगर तू भी मुझे माई बोलेगी तो मुझे अच्छा लगेगा…”

मैने मुस्कुरा कर कहा, “जी, माई- अब से मैं आपको माई कह कर ही बुलाउंगी”

“और हाँ मेरी बच्ची, जब तक मैं ना कहूं, अपने बाल खुले ही रखना… तेरे बाल तेरी कमर तक लंबे और घने हैं… खुले बालों में तू अच्छी लगती है…”, माई ने मेरे बिल्कुल कान के पास आ कर कहा |

मैं शर्मा गयी और ना जाने क्यों मेरे मेरे मुंह से निकला, “जी, माई… जब तक आप ना कहें, मैं अपने बाल खुले ही रखूँगी”

“बहुत अच्छा…”, न ज़ाने उसकी मुस्कान मे एक अजीब सी बात थी…. शायद वह खुश हो रही थी कि – ना जाने क्यों मैं उसकी एक एक बात मान रही हूँ… और शायद मैं धीरे धीरे उसके वश में चलती चली रही थी |

वह दोबारा सीढ़ियों पर जा कर बैठ गयी लेकिन इस बार उसने अपने गले से रुद्राक्ष की माला निकाल कर जपने लग गयी |

टिकट की लाइन धीरे धीरे आगे बढ़ती गई और जल्दी ही मैंने धूमिया की दो टिकटें खरीद ली |

लेकिन जब मैने मुड़ कर सीढ़ियों की तरफ देखा तो हैरान रह गयी क्योंकि माई वहाँ से गायब थी |

मैं उसे ढूँढने के लिए इधर उधर देख ही रही थी कि पीछे से उसने मुझे पुकारा, “कहाँ ढूँढ रही है, मेरी बच्ची? मैं तो यहाँ हूँ…”

“आप कहाँ चली गयी थी, माई?”

“पास वाले मंदिर से पवित्र भस्मी लाने – आ बैठ; तेरे माथे पर एक टीका लगा कर, तेरे बालों का एक जूड़ा बाँध दूं…”

मैं माई से लंबी थी, इस लिए मैं सीढ़ियों पर ही बैठ गयी, माई ने मेरे माथे पर भस्मी का टीका लगाया और मेरे बालों को समेट कर एक जूड़े में बाँध दिया।

जैसे ही मैं उठ कर खड़ी हुई मुझे जैसे एक चक्कर सा आ गया… पर मैं सम्भल गयी, आज यह क्या हो रहा है?

“चलिए माई, ट्रेन का टाइम हो रहा है”, मैने कहा |

शायद बारिश और तूफान की वजह से ट्रेन रुक रुक कर चल रही थी| मुझे ना जाने क्यों नींद आने लगी, माई के कहने पर मैं उनके गोद में सर रख कर सो गयी… कहाँ तो माई कह रही थी कि वह कल रात की जागी हुई है और ना जाने क्यों मुझे ही नींद आ रही थी | जैसे ही मैं उनकी गोद में लेटी, उसने एक हाथ से मेरा माथा प्यार से सहलाना शुरू किया। मुझे नींद आ रही थी, ना जाने कब मैं सो गयी |

आख़िरकार ट्रेन धूमिया स्टेशन के से कुछ दूर पहले जा कर रुकी | तब माई ने कहा, “चल बिटिया, हम लोग यहीं उतार जाएँगे, यहाँ से मेरा घर पास है”

ट्रेन जहाँ रूकी थी, वहाँ आस पास घना जंगल था, पर मैने कहा, जी माई।

ट्रेन से  उतर कर हमलोग जंगल के रास्ते चलने लगे, मुझे याद है कि मैने माई से दुबारा कोई सवाल नही किया कि हम लोग इस जगह क्यों उतर रहे हैं या फिर माई का घर वहाँ से कितनी दूर है, बस हम लोग उतर गये और मैं जैसे मंत्रमुग्ध हो कर माई के साथ चल रही थी | ना जाने कितनी दूर चलने के बाद माई एक पुराने से एक मंज़िला मकान के पास आ कर रुकी |

घर छोटा सा ही था, पर उसके आँगन के बीचोबीच एक बड़ा सा पेड़ था | उस घर को देख कर ऐसा लग रहा था कि, मानो उस पेड़ को घेर कर ही माई के घर का आँगन और उसका घर बनाया गया हो | पेड़ के पास ही में एक कोने में एक कुँआ भी था |

माई ने कहा, “बेटी, यही मेरे घर है, चल अंदर चल। थोड़ा आराम कर ले उसके बाद मैं तुझे बाज़ार से कुछ सामान लाने भेजूँगी। घर के थोड़े बहुत काम भी हैं, वह तुझे करना होगा। उसके बाद मुझे तुझ से बहुत सी बातें करनी है।  मुझे बहुत दिनों से तेरे जैसी किसी लड़की की तलाश थी।” धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-ना जाने माई के मन में क्या था

मैं सब कुछ सुन रही थी और समझ भी रही थी, लेकिन मुझे ना जाने क्यों कैसा बेसुध सा महसूस हो रहा था, और मेरे मुंह से ज़वाब में निकला, “जी, माई”

मुझे क्या मालूम था कि दरअसल मैं माई के मंत्र फूँके हुए भस्मी के टीके की वजह से उसके वश में थी |

थोड़ा आराम करने के बाद मैं माई के कहे के मुताबिक बाज़ार के लिए निकल गयी, माई के  घर के आसपास सिवाए जंगल के कुछ भी नही था…लेकिन थोड़ी दूर चलने के बाद  ही था धूमिया गाँव का बाज़ार |

माई की दी हुई फेहरिस्त में सब्जियों के साथ ज़्यादातर पूजा पाठ की सामग्री ही लिखी हुई थी, लेकिन उसके साथ सूअर के माँस का कीमा और चार बोतल देशी शराब का भी ज़िक्र था |

मैं वैसे तो माँस मछली नही खाती, लेकिन फिर भी माई के कहे अनुसार मैने सारा सामान खरीद लिया। कहां तो मुझे शहर में चाय की दुकान पर निम्न वर्गीय लोगों के साथ खड़े हो कर चाय पीने में झिझक हो रही थी। लेकिन ना जाने क्यों मैं बिना दोबारा सोचे सीधे बाज़ार में लगी देसी शराब की दुकान में बेझिझक पहुँच गयी।

शराब खरीदते वक़्त एक आदमी ने मुझसे कहा, ” यहाँ की तो नही लगती… किसके घर आई हो?”

“मैं माई के घर आई हूँ”

यह सुनते ही उसका चेहरा जैसे उतर गया। मानो वह डर गया हो |

लगता है कि माई की इस गाँव में बहुत चलती है। लोग बाग उसे जानते हैं और मानते भी हैं |

मुझे अभी भी याद है की माई के घर पहुँचने के बाद, मैने देखा की वह पेड़ के नीचे बैठ कर फिर से अपनी रुद्राक्ष की माला जप रही थी | उसके आगे एक छोटी सी थाली में एक सेब रखा हुआ था |

मुझे देखते ही वह बोली, “बिटिया, शराब ले कर आई है ना?”

मैने कहा, “जी हाँ, माई…”

“ठीक है, सारा सामान पेड़ के नीचे रख दे… मैं यह सारा समान ‘उसको’ पहले भेंट चढ़ाउंगी। अभी मेरी पूजा में थोड़ा सा वक़्त और लगेगा। तब तक तू कुँए के पानी भर ले। खाना बनाना है और मैने तुझे नहलाना भी तो है।”

जितनी देर में मैने कुँए से पानी निकाल कर हौदी, बल्टियों और मटकों मे भर दिया। उतनी देर में माई की पूजा ख़तम हो चुकी थी और ऐसा लग रहा था कि मानो वह मेरा ही इंतज़ार कर रही हो |

“ले बेटी, तोड़ा सा प्रसाद खा ले”, यह कह कर उसने मुझे उस छोटी सी थाली में रखा हुआ सेब खाने को दिया |

मैने उसके कहे अनुसार पूरा सेब खा लिया |

खाने के साथ ही मेरा सिर दोबारा से चकराने लगा। जैसा कि मुझे स्टेशन पर महसूस हुआ था |

शायद उसने मेरे मन की बात जान ली, ” अभी तू मेरे साथ कमरे में चल।  कुछ ही देर में बारिश शुरू होने वाली है, अगर तू भीग गई तो तेरा टीका धुल जाएगा।  मेरे वश का असर तेरे से हट जाएगा।  पर ‘वह’ चाहता है कि मैं तुझ जैसी एक लड़की की ही भेंट उसे चढ़ाउँ।

तू बहुत सुंदर है… कमसिन है, भोली भाली है और कुँवारी है…

लेकिन ‘उसने’ ना जाने क्यों बार बार मुझ से कहा था कि था कि ‘उसको’ बिल्कुल तेरे जैसी कोई लड़की चाहिए… जब मैने तुझे दूर से ही चल कर आते हुए देखा था, तभी मैं समझ गई थी की मेरी तलाश ख़तम हो गई…

जैसा कि मैने कहा की मैं सब कुछ सुन रही थी और समझ भी रही थी, लेकिन मुझे ना जाने  क्यों कैसा बेसुध सा महसूस हो रहा था… और मुझे अज़ीब सा लग रहा था, लेकिन मेरे मन को लग रहा था कि माई जब इतने प्यार से मुझ से यह सब बोल रही है तो वह शायद मेरी तारीफ ही कर रही होगी | इस लिए मैं चुपचाप सर झुकाए खड़ी रही |

“तू इतनी चुप क्यों हैं?”, फिर वह मुस्कुरा कर बोली , “तू बहुत सुंदर स्त्री है… तेरी अंतर आत्मा तुझे जबाब देने से रोक रही है…चल बेटी अंदर चल और एक अच्छी बच्ची की तरह अपनी माई का कहा मान…कमरे में जा कर के अपने सारे कपड़े उतार दे।

उसके बाद तुझे घर के काम भी तो करने हैं और देख अब तक तो दोपहर होने को आई…. देख घर कितना गंदा हुआ पड़ा है… और अब तक चूल्हा भी ठंडा पड़ा हुआ है … तुझे झाड़ू पोंछा, चूल्हा चौका भी तो करना है… घर में तुझ जैसी जवान लड़की के होते हुए यह सब मैं बुढ़िया करूँगी क्या?… और उसके बाद मैने तुझे नहला धुला के भेंट के लिए तैयार भी तो करना है… चल बिटिया अंदर चल.. ‘वह’ सब जानता है, ‘वह’ सब कुछ देख सकता है…

कुछ ही देर में डोम भी आता होगा; श्मशान की राख और मिट्टी लेकर के।  चल अंदर चल,  और एक अच्छी बच्ची की तरह अपनी माई का कहा मान।

माई मुझे कमरे में ले गयी | कमरे में एक खटिया एक पुरानी लकड़ी की अलमारी और कुछ घरेलू सामान रखा हुया था | दीवार में एक बड़ा सा आईना भी टंगा हुआ था।  माई ने मुझे उस आईने के सामने ला कर खड़ा किया और बोली, “अब मैं तेरे कपड़े उतारने जा रही हूँ।”

उसके बाद माई ने एक एक करके मेरे सारे कपड़े उतार दिए। यहाँ तक कि मेरे हाथ की चूड़ियाँ, गले से सोने का हार और कान से सोने की बालियां भी उतार दी। इसके बाद वह मुझ से बोली, “चल बेटी पहले मैं तुझे नहला दूं उसके बाद तुझे घर के काम भी तो करने हैं।

फिर ना जाने क्यों वह थोड़ी संजीदा सी हो गयी और बोली, “लेकिन उससे पहले मैं तुझे एक अहम फ़ैसला करने मौक़ा ज़रूर दूँगी…”

मैं तब तक पूरे घर और आँगन में झाड़ू लगा चुकी थी |धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-माई मुझे कुँए के पास ले गयी, वहाँ पर रखी हुई एक छोटी लकड़ी की चौपाई  पर माई ने मुझे बैठने को कहा। फिर मेरे पीछे खड़ी होकर उसने मेरे बालों को दोबारा समेट कर मेरी गर्दन के पास अपने बाँये हाथ मुठ्ठी मे एक पोनी टेल जैसे गुच्छे में करके पकड़ा। अपने दाहिने हाथ से एक पीतल का लोटा बाल्टी में डुबो कर उसमें उसने पानी भरकर उसे अपने होंठों के पास लाई।

कुछ मंत्र बड़बड़ाकर उसने लोटे से भरे हुए पानी में एक बार थूका और फिर लोटे का पानी मेरे ऊपर डाल दिया। उस थूक मिले पानी से मैं जैसे ही थोड़ा सा भीगी मुझे लगा मेरे हाथ पैर बिल्कुल शिथिल हो गए।  मानो लकवा मार गये हों।

माई यह जानती थी इस लिए वह बोली, “बिटिया, तेरे ऊपर तीन चार लोटा पानी डालने के बाद तेरे माथे और बलों में लगी वशीकरण भस्मी धुल जाएगी। तेरे ऊपर से मेरे वश का असर ख़तम हो जाएगा। तुझे सब कुछ याद आएगा कि तू अब तक मेरी सारी बातें बिना झिझक मान रही थी।

तुझे बहुत अज़ीब लगेगा, लेकिन चौंकना नही।  लेकिन जब तक मैने तेरे बाल पकड़ रखें हैं, तू यहाँ से हिल भी नही पाएगी। अब मैं तुझे एक फ़ैसला करने का मौका ज़रूर दूँगी।”

यह बोल कर माई मेरे ऊपर जल्दी जल्दी लोटे से पानी डालने लगी |

उसका कहना बिल्कुल सही था। पानी से मेरे माथे और बालों में लगी वशीकरण की भस्मी धुलने लगी; मुझे ऐसा लग रहा था की मेरे दिल और दिमाग़ से किसी तरह के बादल जैसे छँट रहे हों। मेरे मन में आज सुबह से ले कर अब तक की सारी घटनाओं की तस्वीरें तैरने लगी।

मेरा माई को उसके घर तक ले आना, फिर बाज़ार जाना, उसके लिए कुँए से पानी भरना और अब उसके कहे अनुसार उसके सामने  नहाने बैठना। जैसे ही मेरे ऊपर से माई के वशीकरण का असर ख़तम हुआ मुझे लगा कि मेरे ऊपर एक बिजली सी गिरी।

मैं वहाँ से उठ कर भाग जाना चाहती थी लेकिन माई ने मेरे बाल कस कर पकड़ रखे थे और मेरे हाथ पैरों में तो जैसे जान ही नही थी |

“मैं जानती हूँ कि तुझे कैसा महसूस हो रहा है बेटी।” यह कह कर उसने मेरे बाल छोड़ दिए।

मुझे लगा की मेरे हाथ- पैरों में जान लौट आई, मैं तुरंत उठ कर कमरे में भागी और गीले बालों और भीगे बदन ही मैने जल्दी जल्दी अपना पेटीकोट चढ़ाया, ब्लाऊज पहना और साड़ी लपेटने लगी। पर ना जाने क्यों मैं अपने पूरे बदन में एक जलन सी महसूस करने लगी। लेकिन मुझे यहाँ से भागना था।

इसलिए उस वक़्त मैने उस पर उतना ध्यान नही दिया, पर यह जलन धीरे धीरे बर्दाश्त के बाहर होती जा रही थी।  मुझे ऐसा लगने लगा था, कि मेरे सारे बदन में आग लगी हुई है और मैं ज़िंदा जल रही हूँ |

मैं चीखते चिल्लाते हुए अपने कपड़े उतार कर फेंकने लगी, और फूट फूट कर रोने लगी |

हाँ, मुझे अब समझ में आ रहा था। जब स्टेशन में माई ने मेरे माथे पर टीका लगाया था तब भी मुझे एक चक्कर सा आया था और सेब खाने के बाद भी ऐसा ही हुआ। इसका मतलब की वह जब भी मेरे ऊपर कोई टोना या टोटका करती, मुझे हल्का सा चक्कर आ जाता था।

कुछ देर बाद माई कमरे में आई। मैं कमरे के एक कोने में बिल्कुल सिकुड़ बैठ कर अपने हाथों से अपने तन को ढकने की कोशिश कर रही थी।

उसने कहना शुरु किया, याद है ना बेटी।  मैने तुझे एक सेब खाने को दिया था? यह उसी का असर है। सेब अब तक तेरे पेट में पच कर तेरे शरीर के खून से मिल गया है।  मैने उस पर टोटका कर रखा था।  अ

ब जब तक मेरा काम पूरा नहीं हो जाता तू कपड़े के एक टुकड़े से भी अपना बदन ढंक नही पाएगी। अगर तुझे यकीन नही होता है तो तू खुद ही देख ले”।

यह कह कर उसने मेरी साड़ी उठा कर मेरे ऊपर फैंकी | जैसे ही साड़ी मेरे ऊपर आ कर पड़ी, मुझे लगा कि किसी ने मेरे ऊपर आग फेंक दी हो।

मैं दर्द से कराह कर साड़ी को दूर फेंक दिया और चीख कर रोती हुई बोली, “आख़िर आप मुझ से चाहती क्या हैं। मैं तो आपकी मदद करना चाहती थी। क्यों कर रही हैं यह सब मेरे साथ?”

“मैने कहा ना, मैं तुझे अपनी बेटी बना कर रखना चाहती हूँ, गाँव की बहू बेटियाँ घर के सारे काम करती है। तुझे भी करना पड़ेगा। उसके बाद मैं तुझे ‘उसको’ तेरी भेंट चढ़ाउंगी”

“आप मुझे भेंट चढ़ाएँगी? क्या मतलब है आपका?”

“तू अच्छी तरह से जानती है बेटी…”

“तो क्या आप यह सब पैसों के लिए कर रही हैं?”

“पैसा? किसने कहा की मुझे पैसे चाहिए? क्या पैसा ही सब कुछ है, मेरी बच्ची?

मैं जो चाहती हूँ वह इस दुनिया से परे है। मुझे चाहिए बेइन्तिहा तांत्रिक शक्तियाँ… आज से तीन दिन बाद पूर्ण अमावस की रात है, ऐसा योग सौ सालों में एक बार ही आता है। और उस रात ‘वह’ बहुत प्यासा होता है। यह प्यास सिर्फ़ तुझ जैसी एक सुंदर लड़की ही बुझा सकती है। उस रात तू ‘उसकी’ प्यास बुझाएगी।

तेरी भेंट पा कर ‘वह’ संतुष्ट हो जाएगा। और मुझे मेरी सिद्धि मिल जाएगी। और मैं एक वादा करती हूँ। मेरी सिद्धि मुझे मिल जाने के बाद मैं तुझे आज़ाद कर दूँगी। बस तीन दिन की ही तो बात है। किसी को कुछ पता नही चलेगा। तुझे तेरी ज़िंदगी वापस मिल जाएगी”

मैं दोबारा फूट फूट कर रोने लगी | माई ने जो टोटका मेरे उपर कर रखा था उसकी वजह से मैं कपड़े नही पहन सकती थी, मुझे पूरी तरह समझ में आ गया था कि मैं उसके घर में क़ैद हो चुकी थी क्योंकि बिना कपड़ों  के मैं उसके घर से निकल के भाग भी नही सकती थी |

“अब तुझे एक फ़ैसला करना है बिटिया, या तो तू जो मैं कहूँ वह राज़ी खुशी करेगी या फिर मजबूरी में। अगर राज़ी खुशी करेगी तो इसका तुझे फल भी मिलेगा। और मैं यह चाहती हूँ कि तुझे तेरे त्याग का फल मिले।  तभी मैनें तेरे ऊपर से अपना वशीकरण हटाया, ताकि तू अपने पूरे होशोहवास में सब जान सके और समझ सके कि मैं तुझे यहाँ क्यों लाई हूँ।  नही तो मुझे यह सब तुझ से तेरे को अपने वश में ला करके करवाना होगा। और तेरे हाथ कुछ नही लगेगा। इसलिए अच्छी तरह से सोच समझ कर फ़ैसला करना। मैं बाहर तेरा इंतज़ार कर रही हूँ।”

यह कह कर मुझे कमरे में रोता बिलखता छोड़ कर माई बाहर चली गयी |धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-मैं ना जाने कमरे में बैठ कर कब तक रोती रही, एक बार मैनें अपना पर्स खोल कर अपना मोबाइल फ़ोन भी देखा- वह टावर नही पकड़ रहा था और बैटरी भी ख़तम होने को आई थी। मेरा मोबाइल बस कुछ ही देर में बंद हो जाएगा।  मेरे पास चार्जर तो था लेकिन माई के घर बिजली नही थी।  निराश हो कर मैंने अपना मोबाइल फ़ोन ऑफ कर दिया।

माई के घर ना तो क़ैदखाने की उँची उँची दीवारें थी और ना तो लोहे की मोटी मोटी सलाखें।  लेकिन फिर भी मैं उसके घर में क़ैद हो चुकी थी |

आख़िरकार मैने फ़ैसला किया मैं माई का कहा मानूँगी, क्योंकि इसके अलावा मेरे पास और कोई चारा भी नही था कम से कम एक उम्मीद तो रहेगी कि माई अपना काम पूरा होने के बाद मुझे आज़ाद कर देगी |

मैं यह सब सोच ही रही थी कि घर के बाहर से एक आदमी की आवाज़ आई- “माई… ओ माई…”

मुझे यह आवाज़ कुछ जानी पहचानी सी लगी…

“कल्लू? दिन भर कहाँ मर गया था… रे डोम की औलाद?”, माई गुस्से से बोली |

“गुस्सा क्यों करती हो माई, रात भर श्मशान में काम करने बाद, गया था बाज़ार को दारू पीने… की इतने में खबर आई की रामुआ का बेटा दुखिया बेचारा लंबी बीमारी के बाद मर गया है।  तुम ही ने तो कहा था की तुम्हे तुम्हे श्मशान की राख और मिट्टी की ज़रूरत है, राख और मिट्टी किसी कुंवारे लड़के की हो तो और अच्छा होगा।  मैं उसी को तो जला कर आ रहा हूँ। उसके घरवाले उसकी अस्थियाँ चुन रहे थे।  बस मैं भी उनकी मदद कर रहा था।  तुम्हारे लिए उसकी चिता में से थोड़ी राख और मिट्टी चुरा कर लाया हूँ।  यह देखो, उन लोगों ने मुझे सौ रुपये का इनाम भी दिया है।”

उस आदमी ने नादान बनने का नाटक करते हुए कहा और माई के सामने के पोटली रख दी, जिसमें की वह श्मशान की राख और मिट्टी चुरा कर लाया था |

“और तुझे याद हैं ना मैं ने क्या कहा था?”

“हाँ, माई… घर के दरवाज़े के आस पास की झाड़ियों को काट कूट कर साफ कर दूँगा और तुम्हारे आँगन में एक गढ्ढा भी खोदना है मुझे…”,फिर वह बोला,'”माई, आज बाज़ार में मैने एक लड़की को देखा… वह कह रही थी कि वह तुम्हारे यहाँ आई है, बस ऐसा कुछ करो कि…”, वह बोल ही रहा था, कि माई ने उसे टोक दिया |

“तो तू जानता है की मेरे यहाँ एक लड़की आई हुई है और तूने उसे देखा भी है?”, माई के बोलने का अंदाज़ कुछ ऐसा था की मुझे एक खटका सा लगा।

माई ने नाराज होकर कहा, बेटी लगती है वो मेरी.”

“अरी! अरी!! अरी!!! गुस्सा क्यों करती हो माई? मुझ डोम को क्या मालूम क़ि वह तुम्हारी बेटी लगती है… हा हा हा … दारू पी रखी है तो मुँह से अन्ट सन्ट निकल गया…”

“अब खड़े खड़े मेरा मुँह मत देख, जल्दी अपना काम पूरा कर और दफ़ा हो यहाँ से…”

“पर माई, वह लड़की कहाँ है?”

“आई थी मेरे पास पूजा पाठ करवाने, चली गयी…”

“सच्ची में चली गई?”

मैने खिड़की से झाँक कर देखा कि हाँ, यह वही आदमी था, जिसने देसी शराब के ठेके में मुझसे कहा था कि ‘अरी यहाँ की तो नही लगती… किसके घर आई है?

उसके उजाड़ गाँव में मुझ जैसी शहर की लड़की को देख कर वाजिब है की उसका दिल आ गया होगा… पर कहाँ वह डोम और कहाँ मैं शहर की एक जानी मानी सॉफ्टवेर कंपनी की काम करनेवाली एक प्रोफेशनल |

वह काला और मोटा था। उम्र शायद २७ या २८ साल का ही होगा, लेकिन उसकी तोंद निकल आई थी, वह अपनी उम्र के मुक़ाबले ज़्यादा बड़ा दिखता था, उसका सर भी लगभग गंजा होने को आया था। दिन के उजाले में उसकी टाँट चमक रही थी।  कोई भी उसे देख कर शायद यह सोचता की उसकी उम्र कम से कम ४५ साल की होगी |

माई ने उसे बड़ी चालाकी से यकीन दिलाया कि मैं उसके घर किसी  काम से आई थी और अपना काम निपटा कर चली गई हूँ।  उसने दोबारा नहीं पूछा। |

धूप ढल चुकी थी, शाम होने वाली थी- आसमान में बादल छाए हुए थे इसलिए आज अंधेरा कुछ ज़्यादा ही लग रहा था, पर कल की तरह अब तक बारिश शुरू नही हुई थी | कल्लू डोम माई के कहे अनुसार  अपना काम ख़तम करके चला गया |

उसके जाने के करीब पन्द्र्ह या बीस मिनट बाद मैं शरमाई और सिमटी हुई सी अपने हाथों से अपना निर्वस्त्र शरीर ढकने की व्यर्थ कोशिश करती हुई धीरे धीरे कमरे से बाहर आई |

मुझे बड़ा अज़ीब सा लग रहा था कि बड़ी होने के बाद शायद आज पहली बार मैं बिना कपड़ों के एक खुले आँगन में कदम रख रही हूँ |

“मेरी अच्छी बच्ची”, माई ने बड़े लाड़ से कहा, “चल थोड़ा सा पी ले, तेरा जी हल्का हो जाएगा उसके बाद बिटिया तुझे रसोई संभालनी है… देख शाम होने को आई हमने कुछ भी नही खाया”, यह कह कर माई ने अपना जूठा गिलास मेरी तरफ बढ़ा दिया |

मैंने उसी गिलास से एक बड़ा घूँट लिया और पी कर खांसने लगी, “माई बोली, धीरे बेटी धीरे… यह देसी दारू है। अगर जैसा मैं कहूँ वैसा तू करती रही तो सब कुछ तेरे रंग चढ़ जाएगा”

मैंने पूछा,”माई आप जिसका ज़िक्र करतीं हैं, – ‘वह’.. आख़िर यह ‘वह’ है कौन?”

” ‘वह’ एक निशाचर है- बहुत ही ताकतवर शैतानी आत्मा है ‘वह’ मैं उसी को खुश करने के लिए काफ़ी दिनों से साधना कर रही हूँ, मैं तुझे ‘उसको’ ही तो भेंट चढ़ाउंगी…

मुझे याद आया की जब मैं छोटी ही थी, तो एक पंडित जी हमारे घर आए हुए थे, उन्होंने मेरी कुंडली देख कर कहा था की बीस-इक्कीस साल की उम्र में मेरी ज़िंदगी में एक बड़ा हादसा लिखा हुआ है।

तभी माई ने कहा, मैं जानती हूँ कि तुझे पा कर ‘वह’ बड़ा खुश होगा, और मेरा यकीन मान… ‘वह’ तुझे भोगने के बाद कुछ ना कुछ दे कर जाएगा… तू दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करेगी, तेरा बदन हमेशा सोने से लदा हुआ रहेगा… तुझे कभी किसी मर्द की गुलामी नही करनी होगी…तेरे बच्चे आसमान को छुएँगे… तेरे लंबे घने रेशमी खुले बालों की तरह… तेरे भाग्य खुल जाएँगे… बस पहली बार तुझे थोड़ी तकलीफ़ होगी। लेकिन तू एक अच्छी बच्ची की तरह माई का कहा मान |”

मैं चुपचाप बैठी यह सब सुन रही थी |

अब तक मेरे साथ जो कुछ भी हुआ उससे मुझे माई की तांत्रिक शक्तियों का अंदाज़ा लग चुका था।  मैने अपने हाथ में थामे हुए गिलास से शराब की एक और घूँट पी और बोली, “माई, आप जैसा कहेंगी मैं वैसा ही करूँगी।”

“ कुछ नियम और क़ानूनो का पालन करना होगा मेरी बच्ची”, फिर माई बोली, “यह लो कर लो बात, मैं लड़की चुरा कर लाई, और वह मेरे बगल में अभी बिना कपड़ों के बैठी हुई है और मैने उससे उसका नाम भी नही पूछा.. अच्छा बेटी, तेरा नाम क्या है?”

“मेरा नाम संध्या है, माई |”

माई ने मुझे गले से लगा लिया और बोली, “काश तू मुझे कुछ साल पहले मिली होती…”

माई मुझे सीने से लगा करके मुझे दुलार रही थी फिर ना जाने क्यों वह थोड़ा नाराज़ सी होकर बोली,“हरामज़ादा, कल्लू फिर वापस आ रहा है…जा मेरी बच्ची, अंदर जा…

मैं अंदर चली गई |

कुछ मिनट बाद ही कल्लू की आवाज़ घर के दरवाज़े के पास से आई, “माई- ओ माई!”

“क्या बात है, कल्लू?”

“हे हे हे लगता है मैं अपना हंसिया यहीं भूल गया…”, कल्लू माई के घर का काम करने के लिए फावड़ा, हंसिया आदि इत्यादि अपने साथ ले कर आया था, “वह देखो वह तो रहा पेड़ के पास…”

“कल्लू! ज़रा हंसिया दिखना…”, माई बोली |

कल्लू से हंसिया ले कर माई ना जाने उसमे क्या परखने लगी, फिर वह बोली, “यह तो काफ़ी बड़ा और भारी है…”

“हाँ माई, और बहुत धार है इसमें… चाहो तो एक ही वार में तुम किसी की गर्दन भी उड़ा सकती हो…”

“जानती हूँ, तू एक काम कर इसे फिलहाल यहीं छोड़ कर जा, अगर तुझे ज़रूरत पड़ी तो ले जाना…”

“ठीक है माई! पर तुम इसका करोगी क्या?”

“क्या जाने यह मेरे कुछ काम आ जाए….”

अंधेरा हो गया था | आसपास से टिड्डियों और मेंढकों की आवाज़ों से जैसे वातावरण गूँज रहा था | धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-यों तो मैं सिर्फ़ पार्टियों या फिर दोस्तों के साथ मिल कर ही शराब पीती हूँ- लेकिन एक तांत्रिक पुजारिन के घर बैठकर शराब पीने का यह पहला मौका था, शराब की बोतल पर एक लेबल लगा हुआ था, जिस में लिखा हुआ था टाइगर और उसमें सलमान ख़ान की फोटो भी लगी हुई थी- मुझे मालूम था कि माई मेरे उपर नज़र रखे हुए थी।  वह समझ रही थी की धीरे धीरे मेरे उपर नशा चढ़ रहा है, क्योंकि वह मेरी मानसिक हालत से मानो हमेशा वाकिफ़ थी।

उसने तब मेरे बालों का फिर से एक जूड़ा बाँध दिया और बोली, “चल बेटी इससे पहले कि तू नशे में बेसुध हो जाए चूल्हा चौका संभाल ले। आज सुबह से इस घर में चूल्हा नही जला।  आज से हम सिर्फ़ माँस खाएँगे और शराब पिएँगे, और हाँ संध्या, तू जब घर के काम करेगी या फिर बाथरुम जाएगी, तो अपने बाल बाँध लेना…”,

थोड़ा रुक कर माई ने कहा, “और हाँ बिटिया, तू एक काम कर। बस मेरे से कह देना, तेरे बाल मैं ही बनाउंगी।”

वह ऐसे बोल रही थी की मानो एक माँ अपनी दस साल की बेटी को समझा रही हो, “और खाली वक़्त अपने बाल खुले ही रखना,

मुझे एक बात बड़ी अजीब सी लगी, माई के घर के आँगन के बीचों बीच इतना बड़ा और घना सा पेड़ था- पर उसमें से मुझे सुबह से किसी चिड़िया या और कोई पक्षी की आवाज़ नही सुनाई दे रही थी | यहाँ तक कि जब मैं आँगन में झाड़ू लगा रही थी, तब भी मुझे पेड़ के आस पास ज़मीन पर किसी भी चिड़िया का पंख या फिर मल नहीं दिखा ।

शहर में मैं जिनके यहाँ मैं किराए पर रहती हूँ, उनके घर में भी एक बड़ा सा पेड़ है। जिसकी छाँव से छत हमेशा ठंडी रहती है, लेकिन छत पर कपड़े सुखाना नामुमकिन है, क्योंकि धुले हुए कपड़ो पर चिड़िया हमेशा गंदगी कर देती है। लेकिन यह पेड़ जैसे वीरान सा था। किसी चिड़िया का कोई घोंसला नही। एक गिलहरी तो दूर एक छिपकली भी नही।

अच्छा है मुझे छिपकलियों से बहुत डर लगता है |

मैं शाकाहारी परिवार की लड़की हूँ। मुझे माँस पकाना नही आता लेकिन जैसे जैसे माई ने कहा मैं वैसा ही करती गई। इसके बाद मांस तैयार हो गया।

फिर माई ने कहा, बिटिया आज से ले कर अमावस की रात तक तुझे सिर्फ़ माँस ही खाना होगा।  मैने तुझे भेंट चढ़ने के लिए तैयार जो करना है।  खूब शराब भी पीना होगा तुझे।  मैं चाहती हूँ कि तू हमेशा नशे में रहे।

मुझे मालूम था कि मेरे साथ क्या होने वाला है और मैने अपनी नियति को स्वीकार भी कर लिया था; “लेकिन, मैं तो कभी भी इतना नही पीती”

“मैं पिलाउंगी ना तुझे।  अब चल यह गिलास ख़तम कर ले”

कुछ देर बाद मैने माई से झिझकते हुए कहा, “माई, मुझे बाथरूम जाना है…”

“क्या?”, माई को समझ में नही आया |

मैने उसके कान के पास जा कर कहा।  माई थोड़ा मुस्कुराई और एक लोटा पानी ले कर मुझे आँगन के पिछले दवाज़े से बाहर ले गई | घर के इस हिस्से को देखने का मुझे पहले मौका नही मिला था | पिछली तरफ एक पतला सा रास्ता जंगल की तरफ़ जाता था और रास्ते के बाँई तरफ एक बड़ा सा तालाब था और दांई तरफ की ज़मीन खाली पड़ी हुई थी…और घर से कुछ ही दूर एक टूटा फूटा सा शौचालय था… पुराने ज़माने के घरों के शौचालय घर के बाहर ही हुआ करते थे।

मैं उसे देखते ही डर गई, ना जाने उसके अंदर कितने भयानक छिपकिलियाँ और कीड़े मकोड़े होंगे।

” तुझे डर लगता है, बेटी?”, माई हंस पढ़ी |

मैने कहा, “हाँ”

“कोई बात नही तू यहीं कहीं झाड़ियों में बैठ जा…”

“लेकिन…”, मैं थोड़ा झिझक रही थी

“लेकिन वेकिन मत कर बेटी, टॉयलेट कर ले।

और हाँ बिटिया अकेली घर से बाहर मत निकलना… हमेशा मेरे साथ ही जाना |”

मेरे पास और कोई चारा नही था, मैं उस शौचालय में जाने से क़तरा रही थी,  इस लिए मैं रास्ते के दांई तरफ़ की खाली ज़मीन की ओर बढ़ी, माई ने झट से मेरा हाथ पकड़ के मुझे रोका और बोली, “पागल हो गई है क्या… देख नही सकती कहाँ जा रही है? वह खाली ज़मीन – ज़मीन नही है- दलदल है वह… एक बार तेरा पाँव पड़ गया बस अंदर धँसती चली जाएगी तू…”

“मुझे क्या मालूम, माई”,मैनें कहा

माई  मेरा हाथ पकड़ कर मुझे उस टूटे फूटे शौचालय के पास ले गयी और पास ही की झाड़ियों की तरफ इशारा करके बोली यहीं बैठ जा।

मैने वैसा ही किया।

माई ने लोटे से पानी लिया और धुला दिया।

माई ने पूछा, जैसा मैं कहूंगी वैसा करेगी ना बेटी।

“हाँ माई, मैने कहा ना… आप जैसा कहेंगी मैं वैसा ही करूँगी…”, मैने दलदल की तरफ देखते हुए कहा |

“बस तीन दिन की ही तो बात है- फिर मैं तुझे हमेशा के लिए आज़ाद का दूँगी…”, माई ने मुस्कुरा कर कहा |

अपना घर और अपना बिस्तर- तकिया ना हो तो मुझे ठीक से नींद नही आती और वैसे भी मैं तो माई ने तो मुझे क़ैद करके रखा था- ‘भेंट चढ़ने के लिए ‘- यह शायद देशी शराब का असर था कि मुझे थोड़ी नींद आ गई | लेकिन आँख खुलते के साथ ही, मैं मानो अपने हालत से दोबारा वाकिफ़ हो गई |

माई के कहे अनुसार मुझे आज से कुछ ख़ास नियम क़ानूनों को मान कर चलना था।

कुछ भी हो इस गाँव की आबोहवा में ऐसी ताज़गी थी जो कि शहर के वातावरण में नही होती है| आज घने बादल भी छाए हुए थे बिजली भी कड़क रही थी, लगता है कि ज़ोरों की बारिश होने वाली है |

मैंने धीरे धीरे उठ कर कमरे के बाहर आँगन में कदम रखा, माई तब भी सो रही थी | किसी भी दरवाज़े पर कोई भी ताला नही था, पर मैं भाग भी नही सकती थी, क्योंकि माई का टोटके की वजह से मैं अपने बदन पर कोई कपड़ा नही पहन सकती थी। बिना कपड़ो के इस वीरान इलाक़े से बाहर जाना नामुमकिन है |

मैं यह सब सोच ही रही थी कि अचानक मेरा ध्यान कहीं दूर से आ रही मंदिर की घंटियों और शंख की आवाज़ पर गया | मैं आवाज़ को सुनती हुई ना जाने कब घर के पिछले दरवाज़े से निकल कर जो पतला सा रास्ता शौचालय की तरफ जाता था-वहाँ खड़ी हो कर जंगल कि तरफ़ देखने लगी कि मंदिर की घंटियों, ढाक-ढोल की आवाज़ की आवाज़ और शंख ध्वनि जो मेरे अंदर एक जोश सा भर रही है – किस तरफ से आ रही है… मुझे लगा कि कुछ ही दूर ज़रूर कहीं माँ काली का कोई मंदिर होगा।

जहाँ सुबह सुबह आरती हो रही है, मैने तालाब में उतर कर एक डुबकी लगाई और अपने हाथ जोड़ कर माँ काली का स्मरण किया – “हे माँ काली, मेरी रक्षा करो…”

तभी ज़ोर से बिजली कड़क उठी और तेज़ बारिश शुरू हो गई |

मैं तालाब के पानी से निकल कर माई के घर के आँगन में गई और जल्दी जल्दी आँगन में सूख रहे माई के कपड़ों को उतारने लगी, फिर घर के बरामदे में आ कर एक गमछा ले कर अपने बाल और बदन पोंछने लगी, शुक्र है कि माई तब भी सो रही थी। उसे मालूम था कि मैं उसके घर कहीं भाग भी नही सकती थी, लेकिन उसने मुझे घर के बाहर अकेले जाने से माना कर रखा था |धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-जब मैं कमरे में गई तो माई उठ चुकी थी | मैंने माई के कहे अनुसार ज़मीन पर घुटनो के बल बैठ कर अपना झुका कर ज़मीन पर टेक कर अपने बालों को सामने की तरफ़ फैला दिया, और बोली, “प्रणाम, माई!”

माई ने अपने दोनो पैर के तलवे मेरे बालों पर रख कर मुझे ‘आशीर्वाद’ दिया, और बोली, “आ बिटिया मेरे पास आ कर बैठ… बारिश हो रही है क्या?”

हाँ माई…”

“हाय दैया! मेरे कपड़े भीग जाएँगे…”

“मैं कपड़े उतार के ले आई…”

“और तू बारिश में भीग भी गई? तभी तो तेरे बाल गीलें हैं”

“हाँ, माई”

“माई, यहाँ आस पास कोई मंदिर है क्या?”

“हाँ, थोड़ी दूर ही काली मां का एक मंदिर है”

“आप कभी गई हैं वहाँ?”

“नही बेटी, मेरा रास्ता अलग है- मैं काली माँ के मंदिर के आस पास भी नही जा सकती …पर यह सब तू क्यूँ पूछ रही है?”

“जी कुछ नही… आप बैठिए, मैं पानी लाती हूँ आप मुंह हाथ धो लीजिए |”, ना जाने क्यों मुझे लग रहा था कि माई कुछ कमज़ोर सी लग रही थी…

“और हाँ, बिटिया- उसके बाद शराब की बोतल, दो गिलास और बचा हुआ माँस भी ले कर आना… बहुत भूख लगी है मुझे…और हाँ बिटिया, अब से हर रोज़ कल्लू आ कर खाने पीने का सामान दे कर जाएगा, याद रही उसकी नज़र तुझ पर नही पड़नी चाहिए |”

मुझे लग रहा था कि जैसे जब व्रत रखा जाता है, तो लोग ख़ान पान में परहेज़ करते हैं- वैसे ही शायद माई आज कल सिर्फ़ माँस और शराब पी रही थी और मुझे भी वैसा ही खिला पिला रही थी |

“जी माई..”, यह बोल कर मैं रसोई से शराब और माँस ले आई , माई मुंह हाथ धो कर पहले से ही ज़मीन पर उकड़ू हो कर बैठ कर खाने का इंतेज़ार कर रही थी। मैने दो थालियों में माँस परोसा और गिलास में शराब डाल कर माई की ओर बढ़ाया… माई ने मुझे अपने बिल्कुल पास आकर उकड़ू हो कर बैठने को कहा और अपने हाथों से मुझे उसने शराब का एक घूँट पिलाया।

माई बड़े लाड़ से बोली, “अब ऐसे आँखे फाड़ फाड़ कर मत देख बेटी, चल शराब पी कर नशा कर ले…तुझे घर के काम भी तो करने हैं… थोड़ी देर में कल्लू भी आता होगा माँस और शराब ले कर, उससे पहले जा कर पानी भर ले… बरसात भी तेज़ हो रही है…कोई बात नही… मैं बदन पोंछ दूँगी और तेरे बाल सूखा कर कंघी कर दूँगी… आज रात से तुझे तो मेरी तांत्रिक पूजा में मदद भी करनी होगी…”

आधी रात होने को आई थी, बारिश रुक चुकी थी माई मेरे बालों को समेट कर मेरी गर्दन के पास अपने बाँये हाथ मुठ्ठी मे एक पोनी टेल जैसे गुच्छे में करके पकड़ कर बड़े जतन के साथ मुझे कुँए के पास ले गई और उसने मुझे दोबारा नहलाया लेकिन इसबार उसने मेरे बाल नही सुखाए और बदन भी नही पोछा। कल्लू जो श्मशान की राख और मिट्टी ले कर आया था, उसमे से थोड़ा सा अपनी मुठ्ठी में ले कर उसने मेरे माथे पर मल दिया |

फिर उसने मुझे थोड़ी और शराब पिलाई।

मैं तो पहले से ही नशे में लड़खड़ा रही थी; लेकिन जैसा जैसा माई ने कहा मैं करती गई |

माई के कहे अनुसार मैंने रसोई से लकड़िया ला कर कल्लू के खोदे हुए गढ्ढे में डाला और फिर आग जलाई… माई न ज़ाने क्या मंत्र वंत्र बड़बड़ाती हुई अपनी माला जपने लगी और उनके इशारे पर मैं आग में घी डालती रही |

माई उस शैतानी आत्मा को खुश करने की कोशिश कर रही थी… मेरे पास माई का कहा मानने के अलावा और कोई चारा नही था |

माई की तांत्रिक क्रिया ख़तम होने के बाद उसने मुझे कुँए के पास ले जा कर फिर से नहलाया और मेरा गमछे से मेरे बाल और बदन को सूखाया फिर मुझे खाना खिलाने के बाद वह मुझसे लिपट कर सो गई |यह सिलसिला अगले तीन दिन तक चलता रहा, लेकिन हर सुबह मेरी नींद दूर से आ रही मंदिर में चल रही आरती की आवाज़ से खुल जाती और मैं चुपके चुपके घर से निकल कर तालाब में डुबकी लगा कर सिर्फ़ एक ही प्रार्थना करती-“हे मां काली, मेरी रक्षा करो!”

आज अमावस है | सुबह काफ़ी बारिश हुई थी बादल छाए हुए थे, चारों तरफ़ मानो एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था और बादलों की वजह से एक धुँआ सा छाया हुआ था | हर रोज़ की तरह मैं चुपके चुपके तालाब में डुबकी लगा कर अपनी प्रार्थना कर आई थी | बूंदा बाँदी चल रही थी, मैने देखा की आँगन की नाली में कुछ फँस गया है, इसलिए आँगन में पानी जाम रहा था और धीरे धीरे कल्लू के द्वारा माई के लिए खोदे हुए अग्नि कुंड की तरफ बढ़ रहा था |

मैंने झाड़ू ले कर नाली की रुकावट को दूर किया, जमा हुआ पानी तेज़ी से निकल ने लगा। बारिश थोड़ी तेज़ हो गई और तब तक माई भी उठ गई थी मुझे अपने बगल में ना पाकर शायद थोड़ा परेशान सी हो गई थी- आज वह जैसे और भी कमज़ोर लग रही थी- मेरा अंदाज़ा सही था; तांत्रिक क्रियाओं का कुछ असर उसके शरीर पर पड़ रहा था।

“क्या कर रही है मेरी बच्ची?”, माई ने पूछा“आँगन में पानी जाम रहा था, माई… और हवन कुंड की तरफ आ रहा था, इस लिए मैने नाली साफ करके झाड़ू लगा रही थी…”

“हाय- हाय, मुझे उठा तो दिया होता, मैं तुझे अपने हाथों से थोड़ा शराब पीला देती- तेरे बदन में गर्मी तो रहती, आज तू भेंट चढ़ेगी बेटी। बीमार पड़ गई तो?”

“आजकल आपकी तबीयत भी तो कुछ ढीली लग रही है माई, इसलिए मैने सोचा की नाली साफ कर दूं, वरना सारे आँगन में पानी पानी हो जाएगा…”

“हाँ, तूने सही कहा बिटिया | मेरी तबीयत थोड़ी ढीली है,पर आज रात के बाद मैं बिल्कुल ठीक हो जाउंगी… मेरी शक्तियाँ और बढ़ जाएँगी, पर बेटी यह सब तो तेरी वजह से ही तो होगा ना… आज तू भेंट चढ़ेगी उससे पहले अगर तू बीमार पड़ गई तो?”

मैं चुपचाप सर झुका कर हाथ में झाड़ू ले कर खड़ी बारिश में भीगती रही |

“अरी लड़की, खड़ी खड़ी मेरा मुंह क्या देख रही है? चल चल अंदर आ… थोड़ा पी कर अपना बदन गरम कर ले, अगर सारा दिन तू बारिश में भीगेगी तो भी तुझे ठंड नही लगेगी.. उसके बाद फिर कुँए से पानी भर लेना, चूल्हा चौका भी तो संभालना है तुझे… उसके बाद तेरे और भी काम हैं आज… और देख तेरे बदन पर तो कीचड़ के छींटे भी लग गये हैं… हाय रे दैया शराब पिलाने के बाद मैं तुझे नहला भी दूँगी…

थोड़ी देर में कल्लू भी आता होगा, शराब और माँस ले कर… मैं नही चाहती कि भेंट चढ़ने से पहले वह तुझे देखे…”

मेरे मन में एक ही बात गूँज रही थी – हे मां काली, मेरी रक्षा करो | धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-पता नही क्यों आज मई ने मुझे ज़रूरत से ज़्यादा ही शराब पिलाई, उसके बाद उसने मेरे बालों को समेट कर मेरी गर्दन के पास अपने बाँये हाथ मुठ्ठी मे एक पोनी टेल जैसे गुच्छे में करके पकड़ कर बड़े जतन के साथ मुझे कुँए के पास ले गई और उसने मुझे नहलाया…

लेकिन आज थोड़ी देर हो गई थी- कल्लू “माई ओ माई” आवाज़ देता हुआ, आँगन में घुस आया और मुझे नहाते हुए देख कर ठिठक सा गया |

माई गुस्से से बोली,”हरामज़ादे, तेरे को भी अभी आना था क्या?”

कल्लू आँखे फाड़ फाड़ कर मुझे घूर रहा था | माई बोली, “देख क्या रहा है? पहले लड़की नही देखी क्या?”कल्लू डरते डरते बोला,”माई, मैने इसी लड़की को तो बाज़ार में देखा था।

माई ने उसे डांटा,  अब आँखे फाड़ फाड़ कर मत देख, रख दे सारा सामान बारामदे में और दफ़ा हो यहाँ से… और खबरदार मेरी लड़की की ओर दुबारा आँख उठा कर भी देखा तो… यह बेटी है मेरी ….”

कल्लू को मानो साँप सूंघ गया हो, उसने चुपचाप वैसा ही किया जैसा माई ने कहा |फिर माई बोली, “और जैसा मैने कहा रात को वैसा ही करना वरना तेरे ही हँसिए से मैं तेरी गर्दन उड़ा दूँगी…”

कल्लू के जाने के बाद माई ने बड़े लाड प्यार के साथ मेरा बदन पोंछ कर मेरे बाल सुखाए और मेरे बालों में कंघी की और कहने लगी, “मैं सोच रही थी, आज रात भेंट चढ़ने के बाद तू तो चली जाएगी… तू एक काम क्यों नही करती? तू मेरे पास ही क्यों नही रह जाती… बेटी बना कर रखूँगी तुझे मैं…”

“नही माई, मुझे जाना ही होगा…”, मैने कहा |माई थोड़ा मुस्कुराई और फिर उसने मुझे थोड़ी और शराब पिलाई |फिर वह बोली, “बस बिटिया, अब तो सिर्फ़ रात का ही इंतज़ार है..

आज ना जाने क्यों माई मुझे ज़रूरत से ज़्यादा शराब पिला रही थी और खाना कम खिला रही थी।

लेकिन मैं मन ही मन बस एक ही बात दोहरा रही थी कि- “हे मां काली मेरी रक्षा करो”

ना जाने मैं कब शराब के नशे में बेसुध हो गई थी, जब माई मुझे उठाने लगी तब तक काफ़ी रात हो चुकी थी, उसने मुझे नहा कर आने को कहा, मेरा नशा तब भी नही उतरा था- मैं किसी तरह लड़खड़ाती हुई कुँए के पास जा कर नहा कर आई- माई ने मुझे कमरे में ही रहने को कहा – इतने में फिर से घर के दरवाज़े के पास से कल्लू की आवाज़ आई, “माई ओ माई…

“माई, यह कल्लू इतनी रात को यहाँ क्या कर रहा है?”, मैने गौर किया की मेरी ज़बान भी लड़खड़ा रही है, माई ने मुझे कुछ ज़्यादा ही पिला दिया था |

“अब क्या बतायूं, बिटिया, तुझे भेंट चढ़ने के लिए मुझे इसके अलावा और कोई मिला ही नही…”

“बात को समझ ने की कोशिश कर, बेटी… ‘वह’ एक आत्मा है, उसे  किसी मरद के शरीर की ज़रूरत पड़ेगी…मैं ‘उसकी’ आत्मा को कल्लू के शरीर में प्रवेश करवाउंगी… शरीर कल्लू का होगा और आत्मा ‘उसकी’…

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई, मेरा नशा मानो उतर सा गया… आज मेरा सर्वनाश होने वाला था वह भी कल्लू डोम के हाथों…

“आप को और कोई नही मिला, माई?”, मैने झुंझला कर पूछा

“अब क्या बतायूं, बिटिया… शैतानी आत्मा किसी राजा महाराजा, या फिर किसी राजकुमार के शरीर में तो आएगा नही… इसलिए मैने कल्लू डोम को ही चुना… कुछ देर बाद ही तुझे भेंट चढ़ना है…”, यह कह कर माई कमरे से चली गई |

मैं विस्मित हो कर कमरे में बैठी रही, मुझे समझमें नही आ रहा था कि मैं क्या करूँ… लेकिन फिर से मुझे दूर से मंदिर की घंटिया और शंख की ध्वनि सुनाई देने लगी… मैं मन ही मन दोहराने लगी, ‘हे मां काली मेरी रक्षा करो…’धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-करीब आधी रात हो चुकी थी, आँगन के पेड़ के नीचे आग जला कर माई निर्वस्त्र हो कर अपनी तांत्रिक पूजा कर रही थी; पास ही में एक चादर बिछी हुई थी।

बगल में कल्लू भी पालती मार कर बैठा हुआ था। पर शायद उसको कोई होश नही था… अचानक मुझे किसी के गुर्राने की आवाज़ सुनाई दी… मैने खड़की से झाँक कर देखा की कल्लू बड़े अज़ीब तरह से गुर्रा रहा था,

शायद वह शैतानी आत्मा उसके शरीर में प्रवेश कर चुकी थी…

इतने में माई ने आवाज़ लगाई, “संध्या? संध्या मेरी बच्ची… बाहर आ जा, तेरा वक़्त आ गया है… अब अच्छी बच्ची की तरह इस चादर पे लेट जा।  अब कितना इंतज़ार करवाएगी?…”

मैं कमरे में से हिली नहीं, मैं सिर्फ़ मां काली का स्मरण कर रही थी… मुझे ना आते देख कर माई उठ कर कमरे में आई, और बड़े प्यार से बोली, “शर्मा रही है, बेटी? चल मैं तुझे अपने साथ ले कर चलती हूँ…”

मैंने अपनी आँखें बंद की और इस बार मुझे मां काली का करुणामयी रूप नही दिखा बल्कि उनका एक रौद्र रूप दिखाई दिया… मेरा पूरा शरीर ना जाने क्यों काँपने लगा… मेरे पूरे बदन में जैसे एक बिजली सी दौड़ने लगी… बाहर जैसे मौसम का मिज़ाज़ भी बदल गया, एक तूफान सा जैसे आ गया और ज़ोर ज़ोर से बिजली कड़कने लगी…

माई ने मेरे पास आ कर मेरा हाथ पकड़ कर कहा, “चल अब उठ मेरी बच्ची…”

मैने पट से अपनी आँखे खोली, कमरे में लगे शीशे में मेने अपनी परछाई देखी- मुझे लगा कि नही- यह मैं नही हूँ… मैने बलपूर्वक अपना हाथ छुड़ाया और मैने माई के सीने में एक लात दे मारी |

माई चार पाँच फिट दूर कमरे के बाहर जा गिरी और भौंचक्की हो कर मुझे देखने लगी

मैं उठ कर कमरे से बाहर आई, कमरे के बाहर दरवाज़े के पास ही एक खूंटे से कल्लू का दिया हुआ हंसिया टंगा हुआ था, मैने उसे हाथ में ले लिया… माई डर गई… वह किसी तरह से उठ कर भागी और पेड़ के नीचे रखे हुए अपने लोटे में से हाथ में पानी ले कर कुछ मंत्र बड़बड़ा कर मेरे उपर पानी के छींटे मारने लगी… लेकिन इस बार मुझे उसके तंत्र मंत्र का कोई असर नही हुआ… माई ने अपनी पूरी ज़िंदगी में ऐसा होते हुए कभी नही देखा था…

मैं हाथ में हंसिया ले कर धीरे धीरे आगे बढ़ती गई, माई के कदम पीछे हटते गये, मेरे मुंह से एक चीत्कार निकली…

लेकिन यह चीत्कार किसी  दर्द या फिर विवशता की नहीं थी, बल्कि ये युद्ध का एक नाद था। मेरी चीत्कार मानों एक युद्ध का ऐलान कर रही थी…

माई डर के मारे घर के पिछले दरवाज़े से बाहर भागी |

मेरे पूरे बदन में एक दिव्य शक्ति कौंध रही थी, मैं भी माई के पीछे भागी… पिछला रास्ता घर के टूटे फूटे शौचालय की तरफ जाता था और उस पतले से रास्ते के एक तरफ तालाब था और दूसरी तरफ दलदल!

माई मेरे यह रूप देख कर बहुत डर गई थी, अंघेरे में भागते हुए उसका पैर फिसल गया और वह सीघे दलदल में जा कर के गिरी और धीरे धीरे उसमें धँसने लगी |

वह चीखती चिल्लती हुई मुझसे गुहार लगाने लगी, “बिटिया, मेरी मदद कर मैं दलदल में डूब रहीं हूँ… मुझे बचा ले …”

अब मेरे मुंह से एक भारी आवाज़ निकली, “संध्या ने एक बार निस्वार्थ भाव से तेरी मदद करनी चाही…और तू उसका क्या हश्र करने वाली थी?”

“ग़लती ही गई… ग़लती ही गई… यह सब ‘उसका’ किया धरा है… मुझे बचा ले बेटी… मुझे बचा ले…”, माई दलदल से निकल ने के लिए हाथ पैर मारती गई और वह जितना हाथ पैर मारती उतना ही दलदल में धँसती जाती… मैं हाथ में हंसिया उठाए दलदल के पास ही खड़ी रही… माई चीखती चिल्लती दलदल में समा गई..धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-अब मेरा ध्यान आँगन में बैठे उस शैतानी आत्मा की तरफ गया।

मैं आँगन घुसी।  मैनें देखा की कल्लू बिल्कुल नग्न अवस्था पेड़ के नीचे बैठा हुआ गुर्रा रहा है, उसकी आँखो की पुतलियाँ पलट कर मानो उसके सर में घुस गई थी, उसकी आँखों का सिर्फ़ सफेद हिस्सा ही नज़र आ रहा था.

मुझे अपने पास आते देख कर वह डरते डरते खड़ा हो गया पर ऐसा लग रहा था कि मानो उसे अपने शरीर पर काबू नही है, वह लड़खड़ा रहा था – क्योंकि उसके शरीर में जो शैतानी आत्मा प्रवेश कर चुकी थी अब वह निकल कर भागने की कोशिश कर रही थी…

मैं हाथ में हंसिया उठाए लंबे लंबे डग भरती हुई सीधे उसके पास जा कर अपने बाएँ हाथ से उसका गला पकड़ कर उसका भारी भरकम शरीर ज़मीन से उठा लिया – ना जाने मुझमें इतनी ताक़त कहा से आ गई थी।

“कौन है रे तू?”, मेरे अंदर से वही भारी आवाज़ निकली |

जवाब में कल्लू सिर्फ़ गुर्राता गया… मैने उसे उठा कर दूर फेंका, लेकिन कल्लू किसी तरह उठ कर भागने लगा… मैं भी उसके पीछे भागी – आज उस शैतानी आत्मा को उसके किए की सज़ा मिलनी थी |

गाँव के अंधेरे रास्ते में कल्लू गुर्राता हुया भागता रहा, मैं भी उसके पीछे हाथ में हंसिया उठाए नंगे बदन खुले बालों में तूफान को चीरती हुई भागती रही…

कल्लू भागते भागते अचानक एक बड़े से दरवाज़े के पास आ कर ठिठक कर रुक गया… यह गाँव के बीचोबीच मां काली का मंदिर था |

मंदिर के किवाड़ बंद थे और दूसरी तरफ मैं थी, मैं धीरे धीरे कल्लू के पास आई और उसके सीने में एक लात मारी…

कल्लू मंदिर के दरवाज़े की कुण्डी तोड़ता हुआ मंदिर के आँगन में जा गिरा और छटपटाने लगा… मंदिर की घंटिया खुद ब खुद बज रही थी… मंदिर का पवित्र वातावरण उस शैतानी आत्मा के लिए बर्दाश्त के बाहर हो रहा था – वह गुर्राता रहा चीखता रहा फिर अचानक उसके मूह से धुँए का एक गुबार सा निकला – यह उस शैतानी आत्मा का प्रतीक था- मैने हंसिया उस गुबार की तरफ फैंक मारा !

एक जबदस्त विस्फोट सा हुआ और हर तरफ चिंगारियों की बरसात सी होने लगी… कल्लू एकदम निढाल सा हो कर पड़ा हुआ था और अब मुझे चक्कर से आने लगे और मैं बेहोश हो कर मंदिर के आँगन में ही गिर पड़ी….

सुबह सुबह मंदिर में चल रही आरती की आवाज़ से मेरी नींद खुली, मैने देखा कि मैं एक बिस्तर पे लेटी हुई हूँ और मेरा बदन एक चादर से ढका हुआ है।

माई के तंत्र मंत्र का असर शायद जा चुका था वरना तो मैं अपने बदन पर कपड़े का एक कतरा भी नही रख पाती थी |

मैं याद करने की कोशिश कर रही थी कि मैं माई के घर से यहाँ कैसे पहुँची।  कुछ देर बाद कमरे के दरवाज़े खोल कर एक बुजुर्ग औरत अंदर आई और उसने मेरे पैर छू कर मुझे प्रणाम किया और बोली, “बेटी तुम कौन हो? इस गाँव की तो नही लगती। पर कल रात तुमने हम सब को स्वयं पर उतरी मां काली के दर्शन करवाए … तुम्हे प्रणाम! ”

मैंने रोते हुए उनको अपनी आपबीती सुनाई, मुझे तो लग रहा था कि उनको मेरी कोई भी बात का विश्वास नही होगा, लेकिन उन्होनें कहा, “मां काली का लाख लाख धन्यवाद! तुम्हारे जैसी कई लड़कियाँ उस तांत्रिक औरत की बलि चढ़ चुकी हैं … अपनी क्रिया पूरी होने के बाद शायद वह तुम्हे भी मार कर उस दलदल में फेंक देती… अच्छा हुआ कि  तुम बच गई और तुमने उस तांत्रिक औरत का भी नाश कर दिया।

लो यह कपड़े पहन लो … और मां काली के दर्शन कर लो…”

यह कह कर वह औरत कमरे के बाहर मेरा इंतज़ार करने लगी।

माई के मंत्रो का असर उसके साथ ही ख़तम हो चुका था कपड़ो से मुझे कोई जलन महसूस नही हो रही थी, उस औरत ने मुझे बंगाली तांत की बनी एक सुंदर सी साड़ी और एक ब्लाऊज दिया था।

मैं जब बाहर आने को हुई तब मुझे एक आदमी की आवाज़ सुनाई दी वह बांगला बोल रहा था, , “मेय टा की उठे पोड़ेछे? (वह लड़की जाग गई है क्या)?”

मैं बाहर आई, एक बुज़ुर्ग आदमी जो की उस औरत का पति और मंदिर का पुजारी भी था।

उसने भी मेरे पैर छू कर प्रणाम किया और बांग्ला मे ही बोले कि बेटी जाओ, मां काली के दर्शन कर लो |

मैं मंदिर के अंदर गई, वहाँ मां काली बड़ी सी मूर्ति थी – माता का वही करुणायी रूप और हाथों में कई तरह के अस्त्र- शस्त्र और एक हाथ में असुर का कटा हुआ शीश।

मैने आँखों में आँसू ले कर मां के चरणों में गिर पड़ी |

मंदिर के बाहर काफ़ी लोग इकठ्ठा हो चुके थे, मुझे आते देख कर सब के सब मुझे प्रणाम करने लगे।  मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था क्योंकि मैं जानती थी मैं इस सम्मान के लायक नहीं थी।  लेकिन इस गाँव के लोगों को कौन समझाए।

खास कर तब जब मैने एक दुष्ट तांत्रिक औरत का नाश किया था।  जाते जाते वर्दी में खड़े पुलिस इंस्पेक्टर को देख कर मैं ठिठक गई। पर उसने भी मुझे प्रणाम किया और बोले, “मैडम इस रिपोर्ट पर आप साइन कर दीजिए।”धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-मंदिर की पुजारी ने पूछा, “क्या लिखा है इसमें?”

“क्या लिखूं? आप ही बताइए? तंत्र मंत्र? जादू टोना? या फिर कल्लू डोम इस लड़की का रेप करने जा रहा था और बचाव के लिए इस लड़की ने हंसिया उठा लिया… कल्लू डर के मारे भागता रहा और मर गया ….”

“मौत की वजह?”, मैने पूछा

“दिल का दौरा….”

“और माई?”

“उसका कोई पता नहीं। अगर वह मर भी गई होगी तो पुलिस को उसकी लाश चाहिए। अब आप इस काग़ज़ पर साइन कर दें। मुझे और भी काम है।”, इंस्पेक्टर साहब बोले |

मेरे कपड़े, गहने और मोबाइल फ़ोन माई के घर में ही था। मंदिर की पुजारिन के ज़िद करने से मैं उनके साथ उसके घर तक गई, मेरे साथ गाँव के काफ़ी लोग भी थे | मैने एक एक करके अपना सारा सामान समेटा और निकल आई |

मुझे स्टेशन तक छोड़ने गाँव के लोगों के साथ पुजारी जी खुद अपनी पत्नी को ले कर आए थे | जाते जाते उन्होंने मुझे वह हँसिया थमाया और बोले, “बेटी, इस हँसिए को हमेशा अपने पास रखना…”

ट्रेन की सिटी बजी और मैंने दुबारा मां काली का स्मरण किया और निश्चय किया किया की हर साल दीवाली के मौके पर मैं माता काली के मंदिर में पूजा चढ़ाने धूमिया गाँव ज़रूर आउंगी |

दुष्टों की संहारक माता काली की जय

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