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महादेव और विष्णु जी में क्या भेद की अनुमति है?

महादेव और विष्णु जी में क्या भेद की अनुमति है?

महादेव और विष्णुजी में जो लोग भेद देखते हैं उनके लिए यह कथा बहुत जरूरी है. हर और हरि एक हैं. शैव-शाक्त-वैष्णव का प्रतिद्वंद्व भाव मानव की मूर्खता है. ईश्वर आपस में प्रतिस्पर्धा भाव नहीं रखते. महादेव और विष्णुजी एक दूसरे की पूजा करते हैं.

महादेव और विष्णु की पूजा करते समस्त देवतागण

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Pमहादेव और विष्णु जी के बीच क्या कोई वैमनस्या कोई झगड़ा है! यह प्रश्न बहुत से लोगों के मन में आता है जब वे पुराणों को पढ़ते हैं. हर पुराण के आधार देवता एक विशेष देव हैं. उनको केंद्र में रखकर पुराण रचना हुई है. इसके पीछे एक कारण है. इस कारण पर भी जल्दी ही आपको पुनः बताऊंगा. वैसे विषय पर चर्चा प्रभु शरणम् ऐप्प में हो चुकी है. आप प्रभु शरणम् ऐप्प से जुड़े रहें. वहां बहुत अच्छी-अच्छी चर्चाएं होती रही हैं.  मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि ऐप्प पर पोस्ट करना बहुत सरल है, वेबसाइट पर पोस्ट करने में कई झमेले हैं. ऐप्प का  लिंक पुनः दे रहा हूं-

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महादेव और विष्णु जी के साथ किसी विवाद की कल्पना करने वाले भक्त अज्ञानी और मूढ हैं. इस प्रकार वे शिवनिंदा और विष्णु निंदा दोनों ही करते हैं. शिव के मानने वाले शैव और विष्णु के मानने वाले वैष्णव संप्रदाय के गुरुओं ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए यह विवाद हमेशा बनाए रखना चाहा है. महादेव और विष्णु में कोई भेद नहीं है. न ही इस भेद की अनुमति है. तुलसीदासजी ने रामचरितमानस लिखकर इस भेद को झूठा साबित किया भी है. आप एक कथा सुनिए. आपको आनंद भी होगा. महादेव और विष्णु में परस्पर कैसा रिश्ता है यह भी आप समझेंगे.

एक समय की बात है की महर्षि गौतम ने भगवान शंकर को अपने आश्रम में भोज पर आमंत्रित किया. उनके इस आग्रह को शिवजी ने तो स्वीकार कर ही लिया, विष्णुजी और श्रीब्रह्माजी भी साथ चलने को तैयार हो गए. महादेव और विष्णु जी के संग ब्रह्मा भी चले.

तीनों महर्षि गौतम के आश्रम में पहुंचे. फिर भोजन परोसे जाने की प्रतीक्षा करने लगे. भोजन की तैयारियों में कुछ विलंब होता देख महादेव और विष्णु जी कुछ देर आपस में हंसी-मजाक करते रहे. फिर सोचा क्यों न इस समय का लाभ लिया जाए. आश्रम के पास ही एक तालाब था, दोनों परमदेव वहां स्नान को चले गए.महादेव और विष्णु जी तालाब में स्नान को गए तो भूलोक पर होने के कारण पृथ्वीवासियों जैसे कौतुक करने लगे.  महादेव और विष्णु जी एक दूसरे पर इस प्रकार जल फेंक रहे थे जैसे पुराने बिछड़े मित्रों का लंबे समय बाद मिलना हुआ है. दोनों ही आनंद में भरकर लीलाएं कर रहे थे.

दोनों एक दूसरे पर पानी उछालते तो कभी दूसरे को पकड़कर पानी में डुबकी लगा देते.  भोजन तो तैयार हो चुका था पर महादेव और विष्णु जी की जलक्रीड़ा जारी थी. दोनों के इस प्रकार के आनंद को देखकर देवतागण हर्षित थे. कोई नई लीला समझकर मन ही मन प्रणाम कर रहे थे.

नारदजी से कोई बात छुपती नहीं है. वास्तव में पृथ्वीलोक की सूचनाएं देवलोक तक पहुंचाने वाले वही एक स्रोत हैं. अब यहां महादेव और विष्णु जी पृथ्वी पर लीला कर रहे हैं यह सुनते ही नारदजी झटपट भागे. इसका रस लेने का अवसर वह कैसे गंवा सकते थे. नारदजी सरोवर पर आए तो जो आनंद अनुभव हुआ वह उनकी कल्पना से भी अधिक था.

अब तो नारदजी विभोर हो गए. मधुर वीणा बजाते हुए स्तुति गाने लगे. महादेव और विष्णुजी ने देखा कि नारदजी तो झूमते हुए गा रहे हैं तो वे भी उनका साथ देने लगे. शिवजी तो जल पर थपकी देते हुए नारदजी के सुर में सुर मिलाने लगे, जैसे जलतरंग बजते हों.विष्णुजी पानी से बाहर आए और मृदंग बजाने लगे. अब तो वहां दिव्य माहौल बन गया था.

 हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.आश्रम पास ही था. जब ब्रह्माजी तक गाने-बजाने की आवाज पहुंची तो वे भी इस आनंद में शामिल होने के लिए चले आए. हनुमानजी भी कहीं आस-पास उपस्थित थे सो वह भी चले आए और राग अलापने लगे.

सभी देव, नाग, किन्नर, गन्धर्व आदि उस अलौकिक लीला को देख रहे थे. अपनी आंखें धन्य कर रहे थे. इधर तो आनंद चल रहा था उधर गौतम यह सोचकर परेशान थे कि स्नान को गए मेरे पूजनीय अतिथिगण आ क्यों नहीं रहे!उन्हें चिन्ता हो रही थी. इधर सब के गाने-बजाने मे इतने मगन थे कि उन्हें यह भी याद न रहा कि वे महर्षि गौतम के अतिथि बनकर आए हैं.

गौतम आए और स्मरणकराया- प्रभो भोजन के लिए विलंब हो रहा है. जब तक आप सब भोग न लगाएंगे कोई आश्रमवासी अन्न ग्रहण नहीं करेगा.

गौतम ने आनंद में डूबे देवों को बड़ी ही मुश्किल से भोजन के लिए मनाया और आश्रम लेकर आए और भोजन परोसा. तीनों ने भोजन शुरू किया. हनुमानजी ने फिर गाना शुरु कर दिया.

भोजन के बाद शिवजी संगीत में आनंदमग्न होकर खोए लेट गए और नींद आ गई. उनका एक पैर हनुमानजी के हाथों पर और दूसरा पैर हनुमानजी के सीने, पेट, नाक, आँख आदि अंगों का स्पर्श कर रहा था.यह देखकर विष्णुजी ने हनुमान से कहा- हनुमान आप बहुत भाग्यशाली हैं जो शिवजी के चरण आपके शरीर को स्पर्श कर रहे है. जिन चरणों को पाने के लिए सभी देव-दानव लालायित रहते हैं. उन चरणों का स्पर्श सहज ही तुम्हें प्राप्त हो गया है. मैंने भी सहस्त्र कमलों से इनकी अर्चना की थी पर ये सुख मुझे भी न मिला. आज मुझे आपसे ईर्ष्या का अनुभव हो रहा है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.नारायण ने कहा- सभी लोकों में सब जानते हैं कि भगवान शंकर को सर्वाधिक प्रिय नारायण हैं पर आज का यह दृश्य देखकर मुझे संदेह-सा हो रहा है. आपको संभवतः शिवजी मुझसे अधिक प्रेम करते हैं.

श्रीहरि भी उलाहने से भरी बातें कहकर हनुमानजी से विनोद कर रहे थे और अपनी लीला भी कर रहे थे. बात शिवजी के कानों में पड़ गई तो उनकी नींद खुल गई.

शिवजी बोले- हे नारायण आप यह क्या कह रहे हैं. आप तो जानते ही हैं मुझे आप सर्वाधिक प्रिय हैं. सभी लोकों में विदित इस सत्य में कोई परिवर्तन नहीं आया है.

उधर कैलाश पर भगवती पार्वतीजी सोचने लगीं कि भोज के लिए गए थे पर इतना विलंब क्यों हुआ. वह किंचित रुष्ट हो शिवजी को ढूंढते गौतम के आश्रम आ पहुंची.यहां पता चला कि उनके स्वामी, विष्णुजी और ब्रह्माजी महर्षि गौतम का आतिथ्य सत्कार ले रहे हैं. गौतम ने जगदंबा से भी भोजन का आग्रह किया तो उन्होंने भी स्वीकार कर भोजन लिया.

Mahadev aur Vishnu Ram ki Shiv pooja-Rameshwaram

भोजन के बाद हंसी-ठिठोली के क्रम में विनोदवश पार्वतीजी ने शिवजी की वेश-भूषा पर थोड़ी हंसी की. उन्होंने बहुत सी ऐसी उलाहने भरी बातें कहीं जो अक्सर पति-पत्नी प्रेमवश आपस में कह ही देते हैं. पर माता कुछ बातें ऐसी भी कह गईं जो सबके सम्मुख वहां नहीं कहनी चाहिए थीं.

काफी समय से चुपचाप बैठे यह सब सुनते रहे भगवान भगवान विष्णु अचानक अपने नाखूनों से अपना ही सिर फाड़ने लगे. उनके मस्तक से रक्त की धार फूट पड़ी.

सब सकपका गए और पूछा- प्रभो यह क्या अनर्थ किया?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उत्तर में श्रीहरि पार्वतीजी की ओर इशारा कर बोल उठे- देवी! यह आप क्या कह रही हैं? मुझसे आपकी बात सही नहीं जा रही. जहां शिवनिन्दा होती है वहां मैं अपने प्राण धारण किए नहीं रह सकता. यह कहकर वह और तेजी से मस्तक चीरने लगे.

महर्षि गौतम के साथ मां पार्वती और अन्य देवों, देवताओं सभी ने उन्हें रोकने का प्रयास किया पर वह नहीं मान रहे थे. अंतत: माता पार्वती के अपने वचन वापस लेने की बात और फिर महादेव के अनुरोध ही पर वह रुके.माता जगदंबा ने श्रीहरि से कहा-त्रिलोकीनाथ के प्रति आपका प्रेम-आदर देखकर मैं अभिभूत हूं. मेरे स्वामी भी आपके नाम को रटते रहते हैं. इससे मैं कई बार सोच में पड़ जाती थी कि आखिर ऐसा क्यों! आज समझ गई कि आप दोनों अलग हैं ही नहीं.

वहां उपस्थित देव समुदाय ने शिवजी और श्रीहरि के जयकारे लगाए.

शैव और वैष्णव संप्रदाय आपस में जो विवाद करते हैं, वह समझ से परे है. शिव और विष्णु अलग नहीं एक हैं.

जो शिवभक्त श्रीविष्णु की निंदा करता है उसे शिवजी न सिर्फ नकार देते हैं अपितु दंडित भी करते हैं. उसी प्रकार जो नारायणभक्त शिव का नाम नहीं लेता उसकी पूजा नारायण स्वीकार नहीं करते. यह पौराणिक कथा इस बात का प्रमाण है.आपको यह पोस्ट कैसी लगी, अपने विचार लिखिएगा. प्रभु शरणम् ऐप्प में ऐसे उपयोगी पोस्ट बहुत मिल जाएंगे. छोटा सा ऐप्प है. करीब पांच लाख लोग उसका प्रयोग करके प्रसन्न हैं. आप भी ट्राई करके देखिए. अच्छा न लगे तो डिलिट कर दीजिएगा.

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