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लीला तो बस नाम है, करना भक्तों का कल्याण है [श्रीकृष्ण कथा]

लीला तो बस नाम है, करना भक्तों का कल्याण है [श्रीकृष्ण कथा]

krishna balarama
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंभगवान श्रीकृष्ण को अर्जुन बहुत प्रिय थे. अर्जुन को अपनी वीरता पर अभिमान होने लगा था जिससे उनकी शक्ति क्षीण हो सकती थी. प्रभु अपने सखा, अपने शिष्य को मार्ग पर लाना चाहते थे इसलिए उन्होंने एक लीला रची.

जिन दिनों महाराज युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ा था उसी समय रत्नपुरा नरेश महाराज मयूरध्वज का भी अश्वमेध का घोड़ा छूटा था. पांडवों के अश्व रक्षा में अर्जुन के साथ स्वयं प्रभु श्रीकृष्ण थे जबकि मयूरध्वज का बेटा ताम्रध्वज अपने अश्व के साथ था. दोनों पक्षों के बीच युद्ध हुआ.

श्रीहरि की लीला से ताम्रध्वज ने अर्जुन को पराजित कर उनका घोड़ा ले लिया. अर्जुन की जब बेहोशी टूटी तो वह अपने घोड़े के लिए बेचैन हुए और श्रीहरि से लाज रखने की मदद मांगी.

माया से श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ने ब्राह्मण का वेश बनाया और मयूरध्वज के महल मदद मांगने पहुंचे. मयूरध्वज से मदद का वचन लेने के बाद श्रीकृष्ण ने बताया- मेरे पुत्र को सिंह ने पकड़ लिया है.मैंने बार-बार प्रार्थना की कि मेरे एकमात्र पुत्र को छोड़कर मुझे खा जाओ लेकिन वह नहीं मानता. बहुत प्रार्थना करने पर वह माना है लेकिन उसने एक शर्त रखी है कि अगर राजा मयूरध्वज के पत्नी और बेटे राजा के शरीर का दाहिना अंग चीरकर मुझे सौंप दें तो मैं तुम्हारे बेटे को छोड़ दूंगा.

राजा ने वचन पूरा करने के लिए पत्नी और बेटे को बुलाया. उनकी पत्नी और बेटे दोनों ने मयूरध्वज के बदले अपना शरीर देने की बात कही लेकिन श्रीकृष्ण नहीं माने. मजबूरन पत्नी और बेटे ने मयूरध्वज के शरीर को चीरना शुरू किया तो उनकी बायीं आंख से आंसू निकल आए.

श्रीकृष्ण ने कहा कि दुखी मन से दिया गया दान हमें स्वीकार नहीं है. मयूरध्वज ने कहा- आंसू निकलने का अर्थ यह नहीं है कि मैं दुखी हूं, बल्कि बायां अंग अपने दुर्भाग्य पर पछता रहा है कि वह क्यों नहीं आपके काम आया.श्रीकृष्ण अपने शंख, चक्र, गदा धारण किए अपने सौम्य रूप में प्रकट हुए और मयूरध्वज से वरदान मांगने को कहा. मयूरध्वज ने कहा- प्रभु, अर्जुन जैसे योद्धा को आपके अनन्य भक्त मेरे बालक ने परास्त कर दिया. उनकी लाज रखने स्वयं आप पधारे और फिर मुझे आपके दर्शन मिले.
अब संसार में भला ऐसी कौन सी बहुमूल्य वस्तु रह गई है जिसकी मैं कामना करूं.

अर्जुन को समझ में आ गया कि श्रीकृष्ण ने यह लीला क्यों रची. वह प्रभु के चरणों में गिर पड़े और भूल के लिए क्षमा मांगी.

वृंदावन विहारी लाल की जय
(जैमिनीय अश्वमेध पर्व की कहानी)

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