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भक्त-भगवान की स्नेह कथा,आंखें छलछला आएंगी.

भक्त-भगवान की स्नेह कथा,आंखें छलछला आएंगी.

कुछ कथाएं ऐसी होती हैं जो बचपन में कभी सुनी गई हों लेकिन मन में ऐसी गहरी बैठ जाती हैं कि प्राणांत तक भुलाती नहीं वैसे ही जैसे ईश्वर के प्रति श्रद्धा अंतिम सांस तक बनी रहेगी.  कथा को अंत तक पढ़िएगा. अगर आंखे छलछला आएं या हृदय प्रेम से गदगद हो जाए तो समझना आपके अंदर बैठे ईश्वर तक बात पहुंची है. श्रीकृष्ण लीला और कृष्ण भक्ति की ऐसी कथाएं बहुत कम ही सुनने को मिलती हैं.

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यह कहानी है कृष्णा की जो एक मासूम बच्चा था. उसे भगवान कृष्ण अपने बड़े भाई लगते थे. वह बड़े ही भोलेपन से अपने गोपाल भैया को बुलाता था.

यह कहानी है उस विश्वास की जो हमें ईश्वर से जोड़ता है. इस विश्वास की डोर इतनी पक्की हो जाती है कि ईश्वर को सभी परंपराओं, मान्यताओं को तोड़कर भक्त के लिए भागकर आऩा होता है.

लीलाधर को तो हर समय लीला करने में आनंद ही आता है. वह अपने उसी गोपाल यानी गोकुल में गाएं चराने वाले ग्वाले के भेष में आ जाते थे.

कृष्णा को जन्म देते समय उसकी मां गुजर गई थी. बाद में पिता का भी स्वर्गवास हो गया था. बस एक बूढ़ी दादी थी. बेचारे दादी पोता बड़ी ही मुश्किल से जी रहे थे.

जब कृष्णा पांच साल का हुआ तो दादी को उसकी पढ़ाई की चिंता हुई.

उन्होंने एक गुरुकुल में गुरुजी से प्रार्थना की. गुरुजी निशुल्क पढ़ाने के लिए तो तैयार हो गए लेकिन विद्यालय जंगल के उस पार था. कृष्णा और उसकी दादी जंगल के इस पार गांव में रहते थे. जंगल काफी घना हिंसक जानवरों से भरा था.

कृष्णा गुरूकुल पहुंचेगा कैसे, यही सोचते दादी लौट रही थी. साथ में कृष्णा भी था. दादी उसे रास्ते भर घर से विद्यालय तक का रास्ता दिखाती समझाती आई.

कृष्णा तो गुरुकुल जाने के लिए उत्साहित था बूढ़ी दादी समझती थीं कि जंगल पार करना कितना कठिन है. दादी और पोता घर पहुंचे. अगली सुबह कृष्णा को पाठशाला जाना था. दादी का मन भर आया.

उसने कृष्णा को कहा- अगर रास्ते में उसे डर लगे तो अपने गोपाल भैया को पुकारना.

कृष्णा ने पूछा- ये गोपाल कौन है?

तो दादी ने कहा कि यह गोपाल तुम्हारे दूर के रिश्ते का बड़ा भाई है. वह उसी जंगल में गाएं चराता है. सहायता के लिए बुलाने पर तुरंत आ जाता है.

कृष्णा खुश हो गया कि उसका रिश्ते का भाई भी है जो सहायता को आ जाएगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कृष्णा जंगल में दादी के बताए रास्ते पर बढ़ने लगा पर आज अकेला था. उसे डर लगने लगा.

डर में उसने पुकार लिया- गोपाल भैया तुम कहां हो। मेरे सामने आ जाओ, मुझे डर लग रहा है. लेकिन जंगल में उसकी अपनी ही आवाज गूंज गईं.

पांच साल का छोटा बालक कृष्णा डरता सहमता अपने रास्ते पर बढ़ता रहा. आगे जाकर जंगल और घना हो गया. कृष्णा ने फिर पुकारा गोपाल भैया तुम कहां हो. मुझे डर लग रहा है, आ जाओ. दादी ने तो कहा था तुम पुकारते ही चले आओगे.

नन्हे से बालक कृष्णा की आवाज में जो विश्वास था. भगवान उसकी उपेक्षा नहीं कर पाए और तत्काल चले आए. कृष्णा को अपने कानों में मुरली की मधुऱ धुन सुनाई देने लगी.

सहसा कृष्णा ने देखा जो जंगल अभी तक डरावना लग रहा था, अचानक मनोरम हो गया. जंगली जानवरों की आवाजें बंद हो गईं. उनकी जगह गायों के रंभाने और बछड़ों के किलकने की आवाज आने लगीं.बालक कृष्णा ने देखा, दूर से एक चौदह पंद्रह साल का किशोऱ बांसुरी बजाते हुए उसकी ओर चला आ रहा था. बालक कृष्णा बिना कुछ कहे समझ गया कि यही उसका भैया गोपाल है.

आनंदकंद भगवान अपने गोपाल स्वरुप में लीला के लिए एक बार फिर से उपस्थित थे क्योंकि ये बालक कृष्णा के विश्वास की पुकार थी. उसकी दादी की कृष्णभक्ति की परीक्षा थी.

बालक कृष्णा दौड़कर गोपाल भैया के गले लग गया और उन्हें देखता रह गया. माथे पर मोर मुकुट, पीले रंग की धोती, कंधे पर कंबली और हाथों में हरे बांस की मधुर बांसुरी. सभी भुवनों में प्रकाशित वो दिव्य स्वरूप बालक कृष्णा की भोली पुकार पर सम्मुख था.

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कृष्णा ने अधिकारपूर्वक गोपाल भैया से कहा कि वो उसे जंगल पार करा दें क्योंकि उसे डर लग रहा है. गोपाल हंसे. उनकी हंसी से पूरा जंगल जैसे किसी अलौकिक रोशनी से जगमगा उठा.

वह बोले- छोटे भैया, मैं आ गया हूं. तुम्हें किसी से डरने की जरूरत नहीं. उन्होंने कृष्णा को जंगल पार कराया.

कृष्णा ने कहा- आप मेरे बड़े भैया हैं. छोटे भाई की सहायता को शाम को भी आ जाना बिना पुकारे. आप मुझसे प्रेम करते हो तो जरूर आओगे.

लीलाधारी ने चिरपरिचित मुस्कान बिखेरी. उनके मुस्कुराने से जंगल में मंगल हो गया फिर वह बोले- कृष्णा तुम अपने सारे भय त्याग दो, आज से मैं तुम्हारे साथ हूं. सदैव तुम्हारे साथ हूं.

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कृष्णा खुशी-खुशी विद्यालय चला गया. दिनभर पढ़ाई की लौटकर देखा तो जंगल के मुहाने पर गोपाल भैया खड़े थे. उनके साथ बहुत सारी गैया और बछड़े भी थे. बालक कृष्णा अपनी सारी थकान भूल गया और दौड़कर भगवान के पास पहुंच गया.

गोपाल भैया मुरली बजाते हुए उसे जंगल के दूसरे मुहाने तक छोड़ आए. रास्ते में गोपाल भैया ने उसे पीने के लिए गाय का ताजा दूध भी दिया.

उधर दादी दिनभर बेचैन कृष्णा की चिंता कर रही थी. शाम को उन्होंने कृष्णा को आते देखा, तो जान में जान आई. उन्होंने पूछा कि आखिर तुम्हें जंगल में डर तो नहीं लगा कृष्णा?कृष्णा ने सारी कहानी बताई. दादी को लगा किसी चरवाहे ने कृष्णा को जंगल पार करा दिया होगा. वह तो सोच भी नहीं सकती थी स्वयं लीलाधारी भगवान श्रीकृष्ण ही प्रकट हो गए थे.

यह रोज का नियम हो गया. कृष्णा को गोपाल भैया विद्यालय से घर और घर से विद्यालय छोड़ा करते थे.

एक बार विद्यालय में गुरुजी का जन्मोत्सव मनाया जा रहा था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सभी बच्चों ने तय किया कि वे अपने अपने योगदान से गुरुजी का जन्मोत्सव मनाएंगे. यहीं पर भोजन बनाया जाएगा. कृष्णा ने गोपाल भैया को भी जन्मोत्त्सव की बात बताई. भगवान ने भी कृष्णा के उत्साह को देखकर खुशी जताई.

कृष्णा ने दादी से उत्सव के लिए पैसे या कुछ सामान देने की बात कही तो दादी ने बता दिया कि उनके पास कुछ भी नहीं है जो दे सकें. आस-पड़ोस की दया से तो दोनों पल रहे हैं.

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अगले दिन कृष्णा भारी मन से विद्यालय को चला. वह जाना नहीं चाहता था लेकिन जन्मोत्सव में पहुंचना जरूरी था. रास्ते में गोपाल भैया मिले लेकिन उन्हें देखकर कृष्णा ने रोज की तरह कोई खुशी नहीं जाहिर की.

भगवान से कुछ भी छुपा हुआ नहीं था.

उन्होंने भोले बनकर कृष्णा से पूछा- छोटे भैया तुम दुखी क्यों हो तो कृष्णा ने अपनी गरीबी की व्यथा सुनाई. आंखों में आंसू भर आए. भगवान से देखा नहीं गया.

उन्होंने एक छोटी सी मिट्टी की लुटिया में दूध भरा और गोपाल को दे दिया. गोपाल खुश हो गया कि चलो आखिर उसके पास कोई न कोई उपहार तो है. आखिर उसे खाली हाथ तो विद्यालय नहीं जाना पड़ेगा.

गुरुजी की पत्नी को दूध की लुटिया दे दी. इतनी छोटी लुटिया में दूध देखकर हंसी.

गुरुपत्नी ने दूध की लुटिया एक तरफ रख दी थी और बाकी के कामों में फंसकर उसके बारे में भूल गई थीं.

कृष्णा जानना चाह रहा था कि उसके उपहार का क्या इस्तेमाल किया जा रहा है. इसलिए वह बार-बार झांककर देखता कि दूूध कहां रखा है. क्या इसे गुरूजी पीएंगे या किसी और काम में आएगा. गुरुमाता से भोलेपन में उसने यह बात कई बार पूछ भी ली.

इससे नाराज होकर गुरुपत्नी ने दूध की लुटिया उठाई और खीर के बर्तन में पलट दी. सोचा कि लुटिया अभी खाली हो जाएगी तो उठाकर दूर फेंक दूंगी.कृष्णा को भी ये संतोष हो जाएगा कि उसकी दूध की लुटिया का इस्तेमाल खीर बनाने में हो गया है लेकिन ये क्या! लुटिया में भरा हुआ दूध खाली ही नहीं हो रहा था.

गुरुपत्नी ने घबराहट में चीखकर गुरुजी को बुलाया. वह अपने सभी शिष्यों के साथ आए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उन्होंने देखा की दूध की लुटिया ज्यों की त्यों भरी हुई है. उसे बार-बार अलग-अलग बर्तनों में उडेला जाता पर वह खाली ही न होती. उसके दूध से एक के बाद एक बहुत सारे बर्तन भर गए. अब तो बर्तन बचे भी न थे.

जिसने देखा वही हैरान कि आखिर यह हो क्या रहा है. कहीं कोई माया तो नहीं है. कुछ भय भी हुआ.

गुरुजी ने कृष्णा से इसके बारे में पूछा तो उसने गोपाल भैया की सारी कथा विस्तार कहकर सुना दी.

गुरुजी ज्ञानी पुरुष थे. वह तुरंत समझ गए कि ये लीलाधारी की लीला है. उन्होंने तुरंत कृष्णा के चरण पकड़ लिए और भगवान के दर्शन की इच्छा जाहिर की.

बालक कृष्णा ने संध्याकाल में लौटते समय गोपाल भैया से अनुरोध किया कि वह गुरुजी और बाकी शिष्यों को भी दर्शन दें लेकिन भगवान ने उन्हें इस स्वरुप में दर्शन देने से इन्कार कर दिया और दूर से ज्योति रुप में दर्शन दिए जिससे कृष्णा के सभी साथियों सहित गुरुजी का जीवन धन्य हो गया.

यह कथा भक्ति और आस्था की ऐसी सुंदर कथा है जिसे हम सभी बचपन में सुनते-पढ़ते बड़े हुए और भगवान के प्रति समर्पण पक्का होता गया. आशा है आप भी अपने बच्चों को ऐसी कथाएं सुनाने की आदत डालेंगे.इसके दो लाभ हैं. पहला तो उसकी ईश्वर में आस्था बनी रहेगी. ईश्वर में आस्था बनी रहेगी तो शास्त्रों से जुड़ा रहेगा और संस्कारों से परिचित होगा. जाहिर है कि इस तरह वह माता-पिता, गुरुजनों, बड़े-बुजुर्गों को सम्मान देने वाला एक आदर्श संस्कारी संतान सिद्ध होगा तो आपको गर्व होगा.

दूसरा जिस पौधे में बचपन से धर्म और संस्कार रूपी देसी खाद डाला जाएगा उससे बढ़ने वाला पौधा उन्नत होगा- जीवन के प्रति, लक्ष्य के प्रति, समाज के प्रति.

ऐसे बच्चों में एक्रागता बहुत होती है और एकाग्रता ही तो सफलता का सूत्र है. जो भटकेगा नहीं वही तो मंजिल पर सरलता से पहुंचेगा.

अब बताता हूं कि आपको ऐसी सुंदर कथाएं कहां से मिल सकती है. आप प्रभु शरणम् ऐप्पस डाउनलोड कर लीजिए. वहां ऐसी कथाओं का विशाल संसार है. नीचे लिंक है. दावे के साथ कहते हैं आपको अनुभव होगा कि प्रभु शरणम् की आपको बड़ी जरूरत थी.

तो नटवर नागर लीलाधारी भगवान श्री कृष्ण का नाम लेकर इस लिंक को क्लिक करके प्रभु शरणम् से जुड़ जाइए. ईश्वर सबका कल्याण करें.

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