क्यों करते हैं हम थोड़ा-थोड़ा आत्मनाश!

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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए? किसी के साथ प्रतिस्पर्धा? सामने किसी की छवि को रख लेना और बस वैसा ही बन जाने की होड़ में शामिल हो जाना. इससे तो हम अपनी मौलिकता से दूर हो सकते हैं.
क्या पता हमे ईश्वर ने उससे बेहतर बनने के लिए भेजा था किंतु अपनी संकुचित सोच के कारण हमने अपना लक्ष्य ही बहुत छोटा कर लिया.
चलिए इस बात को आपको एक प्रेरक कथा के माध्यम से समझाता हूं. मुझे अपनी बात कहने का यही तरीका आता है.
बुद्ध ने जब ज्ञान प्राप्त कर लिया और उनका संदेश धीरे-धीरे समाज में फैलने लगा तो अपार जनसमुदाय प्रेरित हुआ, आकर्षित हुआ. जिन राजाओं ने उनका कड़ा विरोध किया था वे अपने पुत्रों को बुद्ध के पास भेजने लगे.
ऐसे ही एक राजकुमार थे- श्रोण. सच्चे हृद्य के शांत और संयमित. विद्वान और गुणवान. राजकुमार श्रोण ने बुद्ध से दीक्षा ली और भंते जैसा जीवन जीने को प्रेरित हुए.
बुद्ध भी राजकुमार थे. उन्होंने सारा राजसी ठाठ त्यागा था. साधना की और ऐसे हो गए कि संसार उनका अनुसरण कर रहा है. एक राजकुमार रहते और फिर राजा बन जाते तो क्या खास बात थी.
ऐसे तो अनगिनत राजा हैं, हुए हैं और आगे भी होंगे. पर बुद्ध वाली प्रसिद्धि सबको कहां! श्रोण के मन में यही बात सबसे ज्यादा टिकी रही.
श्रोण का जीवन राजसी ऐशो-आराम में बीता था. वह तो राजकुमार बुद्ध के साथ अव्यक्त प्रतिस्पर्धा में थे. यही सोचकर श्रोण कठिन तप करने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
तप को इतना कठिन कर दिया कि वह सीमाएं पार करने लगा. दो-तीन दिनों में एक बार थोड़ा कुछ आहार लेते फिर लागातार साधना में लीन रहते.
यही उनका नियम बन गया था.
परिणाम यह रहा कि बलिष्ठ शरीर केवल हड्ड़ियों का ढांचा होकर रह गया. शिष्य चिंतित थे. उन्होंने अपनी चिंता बुद्ध को बताया.
श्रोण अच्छे सितारवादक थे. बुद्ध दो सितार लेकर श्रोण के पास आए. एक सितार के तार उन्होंने बहुत ढीले कर दिए थे. दूसरे के तार बहुत कड़े.
बुद्ध ने श्रोण से कहा- आज मुझे सितार सुनने की इच्छा है क्या मुझे सितार बजाकर सुना सकते हो. श्रोण तो सहर्ष तैयार हो गए.
बुद्ध ने उन्हें पहले ढीले तारों वाला सितार दिया और कहा- यह जैसा है वैसे ही तुम इसे बजाकर सुनाओ.
श्रोण ने सितार पकड़ा लेकिन तार ढीले होने से स्वर ही नहीं निकलते थे. श्रोण जैसे सधे हुए सितारवादक से स्वर ही नहीं फूट रहे, यह सोचकर वह शर्मिंदा होने लगे.
श्रोण जितना प्रयास करते संगीत का रस उतना ही बिगड़ने लगता. झुंझलाहट में श्रोण ज्यादा प्रयास करते और माहौल उतना ही असहज हो गया.
बुद्ध उस संगीत पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे. श्रोण की झुंझलाहट जब बहुत ज्यादा हो गई तो बुद्ध ने उन्हें दूसरा सितार बजाने को दिया.
श्रोण ने उसका तार जैसे ही छेड़ा तो वह टूट गया. अब राजकुमार श्रोण लज्जा से गड़े जा रहे थे.
बुद्ध ने कहा- श्रोण तुम्हारे सितारवादन की प्रतिभा की हर तरफ प्रशंसा होती है लेकिन तुम आज अपने गुरू की प्रसन्नताा के लिए नहीं बजा पाए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
श्रोण कमी तुम्हारी वादनकला में नहीं है. कमी इस सितार में थी. तुम्हारा जीवन इस सितार सा रहा.
राजमहल में रहकर तुम्हें विलास की आदत थी इसलिए मन से ज्ञान का संगीत नहीं फूटा.
मानसिक शांति और ज्ञान प्राप्ति के लिए तुमने तप की राह चुनी. तुम्हारा जीवन दूसरे सितार के जैसा हो गया. तुमने इसके तार इतने कस दिए हैं कि बहुत से ज्ञान को तो प्रवेश का रास्ता ही नहीं मिल रहा.
विलास और अनिवार्यता में बड़ा फर्क है. हम जीवन को कई बार ऐसे पैमानों पर कसने लगते हैं जो व्यवहारिक नहीं है. जाहिर है कि हमें जल्दी ही पीछे भी हटना पड़ेगा और फिर हम उस लक्ष्य को लिए दोबारा सोचने में डरेंगे.
लक्ष्य असंभव नहीं था, वह रास्ता भी बुरा नहीं था, कमी थी तो हमारे धैर्य में. छोटी प्रतिस्पर्धाओं में जब हमें कामयाबी मिलने लगती है तो हम उच्छृंखल हो जाते हैं. अपने सामने किसी को लगाते ही नहीं.
लेकिन हर सेर पर सवा सेर भी तो होता है. उसके सामने आते ही हम बेचैन होने लगते हैं. खीझने लगते हैं.
इतने गर्व में न रहें कि सबको दबा देने और सबकुछ हथिया लेने का भाव जागने लगे क्योंकि ऐसे लोग धरातल पर जब आते हैं तो उन्हें समेटने के लिए भी कुुछ शेष नहीं रहता.
सच पूछें तो यही आत्महत्या है. अपने विनाश की पृष्ठभूमि हम रोज तैयार करते हैं, दुखद बात यह है कि हमें इसका अहसास भी नहीं होता.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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