जीवन में उतारने योग्य, काम की तीन बातें

जीवन में उतारने योग्य, काम की तीन बातें

सीखने की कोई उम्र नहीं होती, ज्ञान कभी पूर्ण नहीं होता. जिज्ञासु ही संसार में सफल होते हैं. काम की बात जहां मिले, ग्रहण कर लें. आपके लिए सीखने योग्य काम की तीन बातें. 
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धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-सीखने के लिए यह जीवन थोड़ा है. यह कथा नहीं काम की बात है, जो आपको प्रेरित करेगी. किसी को प्रेरित करने की राह दिखाएगी. आइए छोटी सी कथा से जानें कुछ काम की बात, कुछ व्यवहारिक सीख.

बहुत समय पहले की बात है. सुदूर दक्षिण में किसी प्रतापी राजा का राज्य था. राजा के तीन पुत्र थे. तीनों होनहार थे. राजकाज में कुशल तो थे पर राजा को उन्हें व्यवहारिक ज्ञान प्रदान करने की धुन रहती थी. एक अच्छे पिता को ऐसा करना भी चाहिए.एक दिन राजा के मन में आया कि पुत्रों को को कुछ ऐसी शिक्षा दी जाये कि समय आने पर वे राज-काज सम्भाल सकें.

इसी विचार के साथ राजा ने सभी पुत्रों को दरबार में बुलाया और बोला- “पुत्रों, मुझे सूचना मिली है कि हमारे राज्य में नाशपाती का कोई वृक्ष नहीं है. नाशपाती जैसे औषधीय गुण वाला वृक्ष हमारे राज्य में न हो, यह तो अच्छी बात नहीं. मैं चाहता हूँ तुम सब चार-चार महीने के अंतराल पर एक-एक करके नाशपाती के वृक्ष की तलाश में जाओ. पता लगाकर आओ कि कैसा होता है नाशपाती का पेड?”

राजा की आज्ञा पाकर तीनों पुत्र चार-चार महीने के अंतराल पर बारी-बारी से नाशपाती का पेड़ खोजने गए और अपनी खोजबीन करके वापस भी लौट आये.

साल भर बाद जब तीनों पुत्र नाशपाती के पेड़ की खोज का कार्य पूरा कर चुके तो राजा ने पुनः सभी को दरबार में बुलाया. राजा ने तीनों को बारी-बारी से नाशपाती के पेड़ के रंग-रूप, आकार प्रकार, फल-फूल का वर्णन करने को कहा.तीनों ने पेड़ के बारे में बताना शुरू किया. सबसे पहले सबसे बड़े राजकुमार को बोलने का अवसर मिला.

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पहला राजकुमार बोला-“ पिताजी मैंने नाशपाती का पेड़ अपने राज्य में ही खोज निकाला. वह तो बिलकुल टेढ़ा-मेढ़ा और सूखा हुआ था.”

बड़ा राजकुमार अभी बोल ही रहा था कि दूसरे राजकुमार ने बीच में ही टोक दिया.

बात काटते हुए वह बोल पड़ा, “नहीं-नहीं नाशपाती का पेड़ को मैंने भी अपने राज्य में खोज निकाला लेकिन पेड़ तो बिलकुल हरा–भरा था. हां एककमी दिखी. उस वृक्ष में एक भी फल नहीं लगा था.

दोनों बड़े भाइयों की बात सुनकर सबसे छोटे राजकुमार से धैर्य न रखा गया.वह भी बीच में बोल पड़ा, “भैया, लगता है आप दोनों ही कोई गलत पेड़ देख आए क्योंकि मैंने सचमुच नाशपाती का पेड़ देखा. वह बहुत ही शानदार था और फलों से लदा पड़ा था.”

इसके बाद तीनों राजकुमार अपनी-अपनी बात को लेकर आपस में विवाद करने लगे. तीनों ने नाशपाती का पेड़ देखा था. वे सही वर्णन कर रहे थे इसलिए झुकने का प्रश्न ही नहीं था.

विवाद बढ़ता देख राजा अपने सिंहासन से उठे और बोले, “ पुत्रों, तुम्हें आपस में बहस करने की कोई आवश्यकता ही नहीं. दरअसल तुम तीनों ही नाशपाती के वृक्ष का सही वर्णन कर रहे हो. मैंने ही जानबूझ कर तुम्हें अलग-अलग मौसम में वृक्ष खोजने भेजा था. तुमने जो देखा वह उस मौसम के अनुसार था. जिस मौसम में वृक्ष जैसा होता है वैसा तुम्हें दिखा.ऐसा करने के पीछे मेरा एक बड़ा उद्देश्य था. मैं तुम लोगों को एक व्यवहारिक बात सिखाना चाहता था. जो मैं कहने जा रहा हूं उसे वह ध्यान से सुनना. मेरी इस बात में मेरे पूरे जीवन के अनुभव का निचोड़ है इसलिए तुम मेरी तीन बातों को गांठ बाँध लो-हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पहली बात, किसी चीज के बारे में सही और पूर्ण जानकारी चाहिए तो तुम्हें उसे लम्बे समय तक देखना-परखना चाहिए फिर चाहे वो कोई विषय हो, वस्तु हो या फिर कोई व्यक्ति ही क्यों न हो.

किसी भी बात पर आवेश में आकर या जल्दबाजी में किया गया निर्णय ज्यादातर गलत ही होता है. समझदार व्यक्ति वही है जो किसी बात के निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उसे अच्छी तरह तोल ले. जो ऐसा करता है उसके निर्णय पर लोगों की विश्वसनीयता बढती है साथ ही उस व्यक्ति का अपना विवेक भी जागृत रहता है.दूसरी बात, हर मौसम एक सा नहीं होता. समय अपने क्रम के अनुसार बदलता रहेगा. जीवन का चक्र यही है. जिस प्रकार वृक्ष मौसम के अनुसार सूखता, हरा-भरा या फलों से लदा रहता है उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में भी उतार चढाव आते रहते हैं.

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अतः अगर तुम कभी भी बुरे दौर से गुजर रहे हो तो अपनी हिम्मत और धैर्य बनाए रखो, समय अवश्य बदलता है. यदि तुमने बुरा दौर देखा ही नहीं तो अच्छा दौर कितना सुखदायी होगा इसका अहसास कैसे होगा.

कमजोर लोग विपत्ति के आगे घुटने टेक देते हैं. भाग्य को कोसते रोते रह जाते हैं. मजबूत इंसान विपत्ति को चुनौती की तरह लेता है. इससे वह ज्यादा सख्त और तगड़ा होता है.

विपत्ति काल में अर्जित अनुभव और ज्ञान ही सबसे उपयोगी साबित होता है. जैसे वृक्ष पतझड़ में स्वयं को कठोर बना लेता है. याद रखो वृक्ष तब उतने नहीं गिरते जब वे विपत्ति काल यानी पतझड़ में हों. तब ज्यादा गिरते हैं जब वे लदे होते हैं. कुशल नेतृत्व के लिए यह गुण आवश्यक है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तीसरी बात- अपनी बात को ही सही मानकर उस पर अड़े मत रहो. अपना दिमाग खोलो और दूसरों के विचारों को भी जानो. यह संसार ज्ञान से भरा पड़ा है. चाहकर भी तुम अकेले सारा ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते. इसलिए भ्रम की स्थिति में किसी ज्ञानी से सलाह लेने में संकोच मत करो. संसार में कोई ज्ञान पूर्ण नहीं है. जो सीखने को लालायित रहता है वही ज्ञान का पात्र होता है.

प्रजा कभी किसी अज्ञानी के साथ खड़ी नहीं होती. वह अपने राजा में बल के साथ बुद्धि भी देखना चाहती है.राजा द्वारा राजकुमारों को दी गई यह सीख कितनी व्यवहारिक है. यदि संकट काल में हम इन्हें गांठ बांध लें तो जीवन का नजरिया बदल सकता है. संकट काल शक्तियां जुटाने के लिए होता है. इसका सदुपयोग खूबियां बढ़ाने के लिए होना चाहिए.

दुनिया के सभी सफलतम लोगों की जीवनी उलटकर देख लें. उन्होंने जीवन में बहुत कठिनाइयों का सामना किया. उसमें तपे और निखर कर आए. जो संकटकाल के ताप को नहीं झेल पाते वे साधारण जन बनकर रह जाते हैं. इसलिए आपतकाल में भी अवसर खोजने का प्रयास करें.

इसके दो फायदे हैं. पहला तो आपका ध्यान संकट से थोड़ा हटेगा, दूसरा आप कुछ ऐसे नए गुर सीख लेंगे जो संकट से निकालने में सहयोगी हो सकते हैं. जब विपत्तिकाल निकल जाए तो ये कई गुणा फल देने लगें.

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