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क्रोधित शिव के पसीने से जन्मे ग्रहों के सेनापति मंगल. स्कंद पुराण की कथा

क्रोधित शिव के पसीने से जन्मे ग्रहों के सेनापति मंगल. स्कंद पुराण की कथा

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पृथ्वी ने एक बार देवसभा में प्रार्थना की- सारे कष्ट सहकर मानवों को भोजन व आश्रय देती हूं पर मुझपर जब संकट आता है तो अकेली पड़ जाती हूं. स्त्री स्वामी के बिना असहाय है.

मेरी कोई संतान भी नहीं है. मैं बांझ नहीं कहलाना चाहती. अतः श्रीहरि मुझसे विवाह करें. मैं उनके अंश को जन्म देना चाहती हूं. प्रभु बोले- हरिरूप में यह संभव नहीं. परंतु उनका एक अवतार पृथ्वी की इच्छा पूरी करेगा.

हिरण्यकश्यपु के भाई हिरण्याक्ष ने देखा कि पृथ्वीवासियों के यज्ञ-हवन से देवों को शक्ति मिलती है तो उसने देवों को निर्बल करने के लिए पृथ्वी का हरण कर रसातल में छिपा दिया. पृथ्वी ने श्रीहरि से रक्षा की गुहार लगाई.

वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष का वधकर पृथ्वी को निकालकर सागर पर स्थापित कर दिया. बंधन से मुक्ति पाकर देवी पृथ्वी सकाम रूप में वराहरूप धारी श्रीहरि की वंदना करने लगीं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पृथ्वी के मनोहर सकाम रूप को देख श्रीहरि ने प्रेम निमंत्रण स्वीकार लिया और उनके साथ एक वर्ष बिताया. इस संयोग से पृथ्वी ने एक महातेजस्वी बालक को जन्म दिया. बालक में श्रीहरि सा तेज व शक्ति तथा पृथ्वी समान गंभीरता थी.

चार भुजाओं वाले उस परम तेजस्वी बालक का शरीर तेज के कारण लाल रंग का था. उसका नाम मंगल पड़ा और उसे ग्रहों का सेनापति बनाया गया.

उज्जयिनी में अंधकासुर दैत्य राज करता था. अंधकासुर ने भगवान शिव को प्रसन्न कर बहुत सारी शक्तियां प्राप्त की थीं. अंधक ने ब्रह्मा को प्रसन्न कर अमरता का वरदान मांगा.

ब्रह्मा ने असमर्थता जताई तो उसने मांगा- मेरी मृत्यु तभी हो जब मैं अज्ञानतावश अपनी जननी पर आसक्त हो जाउं. इस तरह शिव की कृपा और ब्रह्मा के वरदान के कारण अंधकासुर एक प्रकार से अविजीत हो गया था.

अंधक का पराक्रमी पुत्र था- कनक. एक बार कनक दानव ने युद्ध के लिए इन्द्र को ललकारा. दोनों में भयंकर युद्ध हुआ. संग्राम में इन्द्र ने कनक को मार गिराया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कनक का वध करने के बाद इंद्र अंधकासुर के भय से भगवान शिव की शरण में कैलाश पर चले गए. इन्द्र ने महादेव की स्तुति की और सारा हाल कहा.

इंद्र ने कहा- कनक ने मुझसे युद्ध ठाना था, मैंने नहीं. भगवन! मैं आपके भक्त अंधकासुर का अहित नहीं करना चाहता था. अंधकासुर से मुझे अभय दीजिए.

इन्द्र से सारा हाल सुनकर महादेव ने उन्हें अभय प्रदान किया. पुत्र के वध करने वाले को महादेव ने शरण दी! क्रोधित अंधक ने महादेव को युद्ध के लिए ललकारा.

दोनों में घमासान संग्राम हुआ. युद्ध करते हुए भगवान शिव के मस्तक से पसीने की बूंद पृथ्वी पर गिरी जिसे पृथ्वी ने धारण कर लिया.

उससे अंगार यानी प्रज्ज्वलित अग्नि के समान लाल वर्ण वाले, त्रिशूल, गदा, अभयमुद्रा और वरमुद्रा धारी एक परम तेजस्वी पुरुष का जन्म हुआ.

लाल मालाओं से युक्त इस तेजस्वी योद्धा स्वरूप शिव और पृथ्वी के अंश को ऋषियों ने अंगारक, रक्ताक्ष और मदादेव पुत्र कहकर स्तुति की.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अंधकासुर के आंतक से मुक्ति दिलाने के बाद महादेव ने अंगारक से कहा- तुम मेरे तामस गुण से उत्पन्न हुए हो. इसलिए तुम्हारे तेज को सहने में संसार को पीड़ा हो रही है.

तुम मंगल नाम से ग्रहों के मध्य सेनापति के रूप में विद्यमान होकर पृथ्वी का कल्याण करो. जिस स्थान पर मंगल की उत्पत्ति हुई थी वहां ब्रह्मा ने मंगलेश्वर शिवलिंग की स्थापना की.

वर्तमान में यह स्थान मंगलनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है, जो उज्जैन में स्थित है. मंगल ग्रह के उत्पत्ति की यह कथा स्कंद पुराण के अवंतिका खंड में आई है.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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