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जाहि विधि राखें राम ताहि विधि रहिएः निष्काम भक्ति की प्रेरक कथा

जाहि विधि राखें राम ताहि विधि रहिएः निष्काम भक्ति की प्रेरक कथा

krishna

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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। इस लाइऩ के नीचे फेसबुकपेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलती रहे.ठाकुरजी का एक भक्त अपने नियम-विधान को लेकर पक्का था. नियमित ठाकुरजी के मंदिर जाकर दर्शन करता. चाहे कुछ भी हो जाए तीनो संध्या नियम से पूजा-पाठ करता.

इसी दिनचर्या में उसके 20 साल पूरे हुए. नगर के सभी छोटे-बडे व्यक्ति को ठाकुरजी के प्रति उसकी अगाध भक्ति के बारे में पता था. इस कारण उसका सभी बड़ा सम्मान करते.

ठाकुरजी का वह भक्त पूजा पाठ के बाद मंदिर में एक ही स्थान पर बैठा करता. लोग उसका सम्मान करते और उसके बैठने की जगह पर कोई और नहीं बैठता था. उस जगह को खाली रखकर भक्त को सम्मान देते थे.

जिस दीवार के सहारे वह मंदिर में बैठता था उस दीवार में गड्ढ़ा पड गया था. अब तो उस स्थान को देखकर लोगों में उसकी भक्ति के प्रति श्रद्धा सम्मान आता और भक्त के लिए सहानुभूति.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक दिन मंदिर में दर्शनार्थियों की बड़ी भीड़ थी. भक्त संध्या करके उठने ही वाला था कि आकाशवाणी हुई. “तेरी 20 साल की मेहनत बेकार गई. 20 साल से की हुई संध्या में से एक भी भगवान ने स्वीकार नहीं की.”

यह सुनते ही वहां मौजूद लोग अफसोस व्यक्त करने लगे. सबको भक्त की 20 साल की मेहनत बर्बाद होते देख सहानुभूति हो रही थी. लेकिन सब यह देखकर हैरान थे कि भक्त खुश होकर नाच रहा है.

सबको लगा कि शायद भविष्यवाणी सुनकर भक्त पागल हो गया. उसे सांत्वना देकर बिठाया और पूछा कि आप अपनी मेहनत के व्यर्थ जाने से दुखी होने की बजाय खुश हो रहे हैं, ऐसा क्यों?

भक्त ने जवाब दिया- ठाकुरजी को यह ध्यान में तो है कि मै 20 साल से उनकी भक्ति में रगड़ कर रहा हूं. उनकी नजर है क्या यह पर्याप्त नहीं! मुझे कुछ चाहिए भी नहीं. परमात्मा की नजर मुझ पर है इस खुशी में क्यों न नाचूं भला!हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भक्त जब भगवान में मिल जाता है तो भगवान उसकी हर छोटी-बड़ी बात को अभिभावक की तरह देखते हैं. अभिभावक को हमें कुछ बताने की जरूरत कहां होती है!

ईश्वर तो अंतर्यामी है, उनसे क्या छुपा जो हम अपनी पीड़ा उन्हें बताएं. यदि प्रार्थना में प्रभु से कुछ मांगना हो तो क्षमा मांगिए उन अपराधों के लिए जो जाने-अंजाने में आपसे हुए हों. निष्काम भक्ति सर्वोच्च है.

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए!

संकलनः महंथ श्रीभरतदासजी
संपादनः राजन प्रकाश

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