हलषष्ठी पर पुत्रवती स्त्रियां लेती हैं बलरामजी से संतान के हृष्ट-पुष्ट, बलिष्ठ और निर्विघ्न होने का वरदानः हलषष्ठी व्रत की कथा

पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंभाद्रपद की षष्ठी को श्रीकृष्ण के बडे भाई बलरामजी का अवतार हुआ. बलरामजी श्रीहरि विष्णु सेवक शेषनागजी के अवतार कहे जाते हैं. भगवान ने जब रामावतार लिया था तो शेषजी छोटे भाई लक्ष्मण के रूप में आए थे.
कहा जाता है, मेघनाद के वध के लिए शेषजी ने कठिन तप किया था. उन्होंने श्रीराम की अद्भुत सेवा की थी. शेषजी की लीला का संवरण बहुत दुखद हुआ. श्रीराम ने उन्हें राज्य के त्याग का आदेश दिया.
लक्ष्मणजी अपने बड़े भैया के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते थे. इसलिए उन्होंने राज्य को त्यागे के स्थान पर जीवन ही त्याग दिया. श्रीराम ने शेषजी के सेवाभाव को देखकर अगले जन्म में उन्हें बड़े भाई बनने को कहा.
बलरामजी ने श्रीकृष्णजी की लीला में उनका साथ देते हुए कई असुरों का वध किया. वह मल्लयुद्ध और गदायुद्ध में पारंगत थे. बलरामजी का प्रधान शस्त्र हल तथा मूसल है. इसलिए हलधर भी कहे जाते हैं. उन्हीं के नाम पर हर छट रखा गया.हमारे देश के पूर्वी जिलों में इसे ललई छट भी कहते है. इस दिन महुए की दातुन करने का विधान है. इस व्रत में हल के द्वारा जुता हुआ अन्न और सब्जियों का प्रयोग वर्जित है. इस दिन गाय का दूध-दही खाना वर्जित है. भैंस के दूध-दही का सेवन होता है.
यह व्रत पुत्रवती स्त्रियां ही करती हैं और भगवान बलभद्र से अपनी संतान को निर्विघ्न और बलशाली रखने का वरदान लेती हैं. जो लोग व्रत नहीं कर पाते उन्हें श्रद्धापूर्वक इस व्रत कथा को अन्य स्त्रियों को अवश्य सुनाना चाहिए और बलभद्र का आशीष लेना चाहिए.
व्रत की विधि –
इस दिन प्रात:काल स्नानादि के पश्चात पृथ्वी को लीप कर एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है जिसमें झरबेरी पलास गूलर की एक एक शाखा बांध कर बनाई गयी हरछट को गाड़कर इसकी पूजा की जाती है.
पूजन में सात अनाजों (गेंहू, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा और जौ) आदि का भुना हुआ लावा चढाया जाता है,हल्दी में रंगा हुआ वस्त्र तथा सुहाग सामग्री चढाई जाती है.
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हलछट की कथा
एक गर्भवती ग्वालिन के प्रसव का समय समीप था. उसे प्रसव पीडा होने लगी थी. उसका दही मक्खन बेचने के लिये रखा हुआ था. वह सोचने लगी यदि बालक ने जन्म ले लिया तो दही मक्खन नहीं बिक पायेगा.
यह सोच कर वह उठी और सिर पर दही मक्खन की मटकी रखकर बेचने चल दी. चलते-चलते उसकी प्रसव पीडा बढ गयी. वह झरबेरी की ओट में बैठ गयी और उसने एक पुत्र को जन्म दिया.
ग्वालिन ने बालक को एक कपडे में लपेटकर वहीं लिटा दिया और स्वयं मटकियां उठाकर आगे बढ गयी. उस दिन हरछट पर्व था. हालांकि उसका दूध-दही गाय भैंस दोनों का मिला जुला था पर उसने बेचते समय बताया कि दूध और दही भैंस का है इसलिए पूरा बिक गया.
जहां पर ग्वालिन ने बच्चे को लिटाया था वहां पर एक किसान हल चला रहा था. उसके बैल बच्चे को पडा देख बिदक गये और हल की नोक बच्चे के पेट से लगने के कारण उसका पेट फ़ट गया.किसान ने तत्काल झरबेरी के कांटों से बच्चे के पेट में टांके लगाकर उसे वहीं पडा रहने दिया. ग्वालिन लौटकर आयी तो बच्चे को मृत पाया. ग्वालिन ने सोचा यह उसके पाप का फ़ल है.
उसने गाय का दूध-दही झूठ बोलकर बेचा है और कितनी ही स्त्रियों का व्रत खराब किया है. आज उसी का उसे दंड मिला है. उसने सोचा इसका प्रायश्चित करना ही उचित होगा.
यह सोचकर वह वापस जहां जहां दूध दही बेच कर आयी थी उसने सभी को बता दिया कि उसके अन्दर गाय का दूध दही मिला हुआ है. सभी स्त्रियों ने उसे आशीर्वाद दिया.
वह वापस लौटकर आयी तो बच्चा जीवित अवस्था में मिला. उसी दिन से उस ग्वालिन ने सभी को इस बात का रहस्य बताया. कभी व्रत आदि में न प्रयोग करने वाली चीज को छिपाकर नहीं बेचा.
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