महालक्ष्मी के समक्ष हुआ श्रीहरि का अपमान, ग्लानि में भरी देवी ने किया बैकुंठ का त्यागः तिरूपति बालाजी कथा, भाग-1

अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.आंध्रप्रदेश में स्थित तिरूपति बालाजी के मंदिर और उनके महात्म्य से सभी परिचित हैं. आपने बार-बार सुना होगा कि यह सबसे अमीर मंदिर है. यह सुनकर मन थोड़ा आहत होता है.
भक्तों को उनकी सारी मनोकमानाएं पूरी कर धन-धान्य से पूर्ण करने वाले हमारे प्रभु बालाजी तो स्वयं कुबेर के ऋण बंधे वहां स्थित है. भक्तों को वैभव प्रदान कर उनसे कुछ अंश लेकर कुबेर का कर्ज चुका रहे हैं.
तिरूपति बालाजी पर आने वाले अरबों के दान के पीछे यही कारण है. भगवान भक्तों को जो दे रहे हैं उनमें से कुछ भक्तों से वापस मांग लेते हैं ऋणमुक्ति के लिए. बहुत दिनों से अनुरोध आ रहा था तो आपको आज बालाजी की विस्तृत कथा सुनाता हूं.
एक बार समस्त देवताओं ने मिलकर एक यज्ञ करने का निश्चय किया. यज्ञ की तैयारी पूर्ण हो गई. तभी वेद ने एक प्रश्न किया तो एक व्यवहारिक समस्या आ खड़ी हुई.
ऋषि-मुनियों द्वारा किए जाने वाले यज्ञ की हविष तो देवगण ग्रहण करते थे लेकिन देवों द्वारा किए गए यज्ञ की पहली आहूति किसकी होगी. यानी सर्वश्रेष्ठ देव का निर्धारण जरूरी था जो फिर अन्य सभी देवों को यज्ञ भाग प्रदान करें.
ब्रह्मा-विष्णु-महेश परमात्मा थे. इनमें से श्रेष्ठ कौन है इसका निर्णय आखिर हो तो कैसे. भृगु ने इसका दायित्व संभाला. वह देवों की परीक्षा लेने चले. ऋषियों से विदा लेकर वह सर्वप्रथम अपने पिता ब्रह्मदेव के पास पहुंचे.
ब्रह्माजी की परीक्षा लेने के लिए भृगु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया. इससे ब्रह्माजी अत्यन्त कुपित हुए और उन्हें शिष्टता सिखाने का प्रयत्न किया. भृगु को गर्व था कि वह तो परीक्षक हैं, परीक्षा लेने आए हैं. पिता-पुत्र का आज क्या रिश्ता?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
भृगु ने ब्रह्मदेव से अशिष्टता कर दी. ब्रह्माजी का क्रोध बढ़ गया और अपना कमण्डल लेकर पुत्र को मारने भागे. भृगु किसी तरह वहां से जान बचाकर भाग चले आए. इसके बाद वह शिवजी के लोक कैलाश गए.
भृगु ने फिर से धृष्टता की. बिना कोई सूचना का शिष्टाचार दिखाए या शिवगणों से आज्ञा लिए सीधे वहां पहुंच गए जहां शिवजी माता पार्वती के साथ विश्राम कर रहे थे. आए तो आए, साथ ही अशिष्टता का आचरण भी किया.
शिवजी शांत रहे पर भृगु न समझे. शिवजी को क्रोध आया तो उन्होंने अपना त्रिशूल उठाया. भृगु वहां से भागे. अंत में वह भगवान विष्णु के पास क्षीरसागर पहुंचे. श्रीहरि शेषशय्या पर लेटे निद्रा में थे और देवी लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं.
महर्षि भृगु दो स्थानों से अपमानित करके भगाए गए थे. उनका मन बहुत दुखी था. विष्णुजी को सोता देख उन्हें न जाने क्या हो गया और उन्होंने विष्णुजी को जगाने के लिए उनकी छाती पर एक लात जमा दी.
विष्णुजी जाग उठे और भृगु से बोले- मेरी छाती वज्र समान कठोर है. आपका शरीर तप के कारण दुर्बल. कहीं आपके पैर में चोट तो नहीं आई. आपने मुझे सावधान करके कृपा की है. आपका चरणचिह्न मेरे वक्ष पर सदा अंकित रहेगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
भृगु को बड़ा आश्चर्य हुआ. उन्होंने तो भगवान की परीक्षा लेने के लिए यह अपराध किया था परंतु भगवान तो दंड देने के बदले मुस्करा रहे थे. उन्होंने निश्चय किया कि श्रीहरि सी विनम्रता किसी में नहीं. वास्तव में विष्णु ही सबसे बड़े देवता हैं.
लौटकर उन्होंने सभी ऋषियों को पूरी घटना सुनाई. सभी ने एक मत से यह निश्चय किया कि भगवान विष्णु को ही यज्ञ का प्रधान देवता समझकर मुख्य भाग दिया जाएगा.
लक्ष्मीजी ने भृगु को अपने पति की छाती पर लात मारते देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध आया. परन्तु उन्हें इस बात पर क्षोभ था कि श्रीहरि ने उद्दंड को दंड देने के स्थान पर उसके चरण पकड़ लिए और उल्टे क्षमा मांगने लगे.
क्रोध से तमतमाई महालक्ष्मी को लगा कि वह जिस पति को संसार का सबसे शक्तिशाली समझती हैं वह तो निर्बल हैं. यह धर्म की रक्षा करने के लिए अधर्मियों एवं दुष्टों का नाश कैसे करते होंगे?
महालक्ष्मी ग्लानि में भर गई और मन श्रीहरि से उचट गया. उन्होंने श्रीहरि और बैकुंठ लोक दोनों के त्याग का निश्चय कर लिया. स्त्री का स्वामभिमान उसके स्वामी के साथ बंधा होता है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
उनके समक्ष कोई स्वामी पर प्रहार कर गया और स्वामी ने प्रतिकार भी न किया, यह बात मन में कौंधती रही. यह स्थान वास के योग्य नहीं, पर त्याग कैसे करें, श्रीहरि से ओझल होकर रहना कैसे होगा! वह उचित समय की प्रतीक्षा करने लगीं.
श्रीहरि ने हिरण्याक्ष के कोप से मुक्ति दिलाने के लिए वराह अवतार लिया और दुष्टों का संहार करने लगे. महालक्ष्मी के लिए यह समय उचित लगा. उन्होंने बैकुंठ का त्याग कर दिया और पृथ्वी पर एक वन में तपस्या करने लगीं.
शेष कथा कुछ ही देर में पढें.