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जीवन में एक बार गिरिराज गोवर्धन स्पर्श क्यों जरूरी है?

जीवन में एक बार गिरिराज गोवर्धन स्पर्श क्यों जरूरी है?

जीवनकाल में गिरिराज गोवर्धन का कम से कम एक बार स्पर्श हो जाना सौभाग्य की बात मानी जाती है. गोवर्धन परिक्रमा करने वाले भक्त गोवर्धन जी का पत्थर लाकर घर में भी रखते हैं. इसके पीछे एक बड़ा कारण है.

फेसबुक पेज लाइक करेंबालरूप में भगवान जहां खेले हों, जिसे उंगली पर धारण किया हो उस गोवर्धन की महिमा के क्या कहने! गोवर्धन का स्पर्श हो जाना भी सौभाग्य की बात है. जैसे गंगाजी का जल पवित्र है वैसे ही गोवर्धन का पत्थर पूजनीय. गोवर्धन के पत्थर में ऐसी क्या बात है कि भक्त इसे सहेजकर रखते हैं. आपको गोवर्धन महिमा की ऐसी कथा सुनाऊंगा जो शायद आपने पहले न सुनी हो.

गिरिराज गोवर्धन के स्पर्श की जो महिमा कथा सुनेंगे वह गर्ग संहिता से ली गई है. गोवर्धन की यह माहात्म्य कथा स्वयं नारदजी ने राजा बहुलाश्व को सुनाई थी.

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कथा आरंभ होती हैः

राजा बहुलाश्व ने सेवा करके नारदजी को बहुत प्रसन्न कर लिया. वह नारदजी के शिष्य हो गए और उनसे ज्ञान प्राप्त करने लगे. नारदजी ने एक बार राजा बहुलाश्व ने पृथ्वीलोक के तीर्थों के बारे में चर्चा आरंभ की. नारदजी ने बताया कि वह वर्ष में एक बार गोवर्धनजी को प्रणाम करने अवश्य जाते हैं.

बहुलाश्व ने नारदजी से पूछा- हे देवर्षे! ऐसी क्या खास बात है गोवर्धन जी में? मुझे भी गोवर्धन जी के माहात्म्य कथा सुनने की इच्छा हो रही है. मेरी जिज्ञासा शांत करें.

बहुलाश्व के निवेदन पर नारद जी ने गोवर्धन महिमा सुनानी शुरू की. गौतमी गंगा यानी गोदावरी नदी के तट पर विजय नामक एक ब्राह्मण रहता था. विजय का कुछ कर्ज मथुरा में बकाया था. वही वसूलने वह मथुरा आया हुआ था.दिन में उसने वसूली की और शाम होने से पहले ही अपने रास्ते चल पड़ा. गोवर्धन गिरिराजजी तक पहुंचते-पहुंचते अंधेरा होने लगा. चूंकि विजय के हाथ एक लाठी के सिवा कोई हथियार तो था नहीं. उसे चोरों का डर महसूस हुआ. इसलिए उसने गोवर्धन जी के पास से एक गोल चिकना पत्थर उठाकर साथ रख लिया.

डर भगाने के लिए वह हरेकृष्ण हरेकृष्ण भजता जंगल के बीच से ब्रजमंडल को पार कर गया. वह थोड़ा ही आगे बढा होगा कि उसके सामने एक तीन पैरों वाला राक्षस आ खड़ा हो गया. राक्षस का मुंह उसकी छाती पर था. एक बांस लंबी उसकी जीभ लपलपा रही थी.  वह विजय को निगलने को तैयार था. भूखा राक्षस विजय की ओर लपका.

विजय ने गिरिराजजी के पास से गुजरते समय गिरिराजजी का एक गोल पत्थर उठा लिया था. गिरिराजजी के दर्शन को आने वाले सहज ही ऐसा करते हैं. विजय को कुछ न सूझा तो उसने आत्मरक्षा के लिए वही पत्थर राक्षस को दे मारा.विजय को यकीन था कि विशाल राक्षस का छोटे से पत्थर से कुछ होने जाने वाला नहीं. इसलिए पत्थर चलाने के बाद मारे डर और घबराहट में आंखे मूंद लीं.

कुछ देर तक खामोशी रही. फिर विजय ने जब आंखें खोलीं तो उसने देखा कि राक्षस का तो कहीं अता पता नहीं है. उसके सामने तो साक्षात भगवान श्रीकृष्ण खड़े हैं. अचरज की बात तो यह थी कि भगवान विजय की ओर हाथ जोड़े खड़े थे.इससे पहले कि विजय कुछ कहता, कुछ करता उस वंशीधारी स्वरूप ने विजय से कहा- आप धन्य हैं जो मुझे इस राक्षस योनि से छुटकारा दिला दिया.

विजय ने सोचा यह क्या आश्चर्य है. वंशीधर मुझे कह रहे हैं कि मैंने उनका उद्धार कर दिया. यह कौन सी माया है. वह चकित होकर उसे देखने लगा. वंशीधर ने उसके मन की बात पढ़ ली और उसका कौतूहल कम करते हुए निवेदन किया.

उद्धारगति से गुजरे उस राक्षस ने विजय का बार-बार आभार प्रकट किया.

वह बोला- हे ब्रह्मण! इस पत्थर के शरीर से छू जाने भर से सिर्फ मेरा उद्धार ही नहीं हुआ बल्कि मैंने श्रीकृष्ण का सारूप्य प्राप्त कर लिया. मैं उनके जैसा हो गया. यह सब आपके द्वारा मुझ पर चलाए गए इस पत्थर की महिमा है. इस छोटे से पत्थर के प्रहार से ही मेरे अंदर के शाप का संहार हो गया. आप मेरे उद्धार के माध्यम बने. आपको बारम्बार नमस्कार है.

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विजय बोला- यह क्या बात कह हे हैं आप, मुझमें उद्धार की ताकत कहां! यदि यह चमत्कार इस पत्थर की महिमा से हुआ है तो वह भी मैं नहीं जानता. आप ही मुझे इस पत्थर की महिमा बताकर कृतार्थ करें.ब्राह्मण विजय की बात पर वह कृष्ण जैसा दिखने वाला वंशीधारी बोला- गिरिराज जैसा तीर्थ न पहले कभी हुआ है न भविष्य में कभी होगा. केदारतीर्थ में पांच हजार साल तप से जो पुण्य मिलता है गोवर्धन पर क्षणभर में मिल जाता है.

महेंद्र पर्वत पर अश्वमेध करके मनुष्य स्वर्ग का अधिपति बन सकता है जबकि गिरिराजजी पर यह यज्ञ करने से वह स्वर्ग के मस्तक पर पैर रखकर सीधे विष्णुलोक जाता है. गोवर्धन परिक्रमा करके गोविंद कुंड में स्नान से मनुष्य श्रीकृष्ण जैसे दिव्य हो जाते हैं.उसने विजय को गिरिराजजी की ऐसी हजार महिमा बतायी जो आश्चर्य में डालने वाली थीं.  विजय ने पूछा- तुम दिव्यरूप धारी दिखायी देते हो, पर तुम भगवान कृष्ण तो हो नहीं. तुम हो कौन?

हे स्वामी मैं एक पीड़ित हूं. आप मेरे उद्धार के माध्यम बने हैं इसलिए मैं आपको अपनी आपबीती अवश्य सुनाउंगा. इससे आपको गोवर्धन की महिमा का भी विश्वास हो जाएगा. उद्धारगति को प्राप्त हुए जीव ने अपनी कथा भी बतानी शुरू की.

हे पुण्यात्मा ब्राह्मण मेरी यह कथा कई जन्म पूर्व से से शुरू होती है.

कई जन्मपूर्व मैं एक धनी वैश्य था. मैंने व्यापार कर्म करके अथाह धन जमा किया. मैं नगर का सबसे बड़ा धनिक हो गया पर धन होने से मुझमें एक बुराई आ गई.

मुझे जुए की लत लग गयी. जुआ खेलने की पूरी टोली में मैं सबसे चतुर जुआरी था. मुझे कोई हरा नहीं पाता था. इसी बीच मुझे एक वेश्या से प्रेम हो गया तो शराब पीकर धुत्त रहने लगा. मां-बाप, पत्नी सबने मुझे बहुत दुत्कारा.

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वे मेरा निरंतर अपमान कर देते थे. क्रोध में भरकर मैंने उनकी हत्या करने की सोची और एक दिन अवसर देखकर मां-पिता को विष दे दिया.

अपने मां-बाप को मार डालने के बाद मैंने अपनी पत्नी को लिया और उसे कहीं और चलकर बस जाने के लिए फुसला लिया. वह मान गई तो उसे लेकर मैं चला. रास्ते में मैंने पत्नी की भी हत्या कर दी. अब न तो कोई दुत्कारने वाला था और न ही धन व्यय करने पर रोक-टोक वाला था. धन तथा अपनी प्रेयसी वेश्या को लेकर मैं दक्षिण देश चला गया.

एक समय बाद मेरा धन समाप्त हो गया. धन के अपव्यय की लत थी इसलिए धन की बहुत आवश्यकता हुई तो वहां मैं लूटपाट करने लगा.

कुछ समय बाद मेरा मन उस वेश्या से भी भर गया तो मैंने उससे भी छुटकारा पाने की सोची. एक दिन उसे भी अंधे कुंए में धकेल आया. उसके बाद मैं लूटपाट करता रहा. लूटपाट के लिए मैंने सैकड़ों हत्याएं कीं.एक दिन मैं लूटपाट के नीयत से वन में भटक रहा था. उस दिन में थोड़ा असावधान था. अचानक एक विषैले सांप के ऊपर मेरा पैर पड़ गया. असावधान होने के कारण उस सर्प ने मुझे डस लिया. उस निर्जन वन में कोई मेरी सहायता करने वाला न था. विष के कारण तड़प-तड़प कर मेरी मौत हो गयी.

मेरे कर्म बहुत नीच थे. मेरे कर्मों का दंड मुझे बहुत भयानक निर्धारित हुआ. मरने के बाद चौरासी लाख नरकों में मैंने एक-एक साल की यातना सही. फिर दस बार सूअर बनके पृथ्वी पर जन्मा.

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उसके बाद सौ-सौ साल तक ऊंट, शेर, भैंसा और हजार साल के लिए सांप हुआ. फिर जाकर मैं राक्षस हुआ. राक्षस बनने के बाद मैं एक दिन एक व्यक्ति के शरीर में समा गया. मेरी योजना थी कि रात्रिकाल में एकांत पाकर उसे खा जाउंगा. परंतु संयोग देखिए वह व्यक्ति तो व्रजभूमि जा रहा था. इस तरह मैं अंजाने में व्रज में घुस आया.वृंदावन में प्रवेश के बाद उस व्यक्ति ने यमुना तट पर आकर यमुना को प्रणाम करने के बाद आचमन किया. बस वहां गुप्त रूप में उपस्थिति श्रीकृष्ण के पार्षद मुझे पहचान गए. उन्होंने मुझे पकड़कर खूब पीटा और इस क्षेत्र से दूर रहने को कहा.

किसी तरह बचकर व्रज क्षेत्र से मैं बाहर आया पर तब से आज तक बहुत दिनों से भूखा था.आज तुम्हें देखा तो लगा भूख शांत होगी. तुमको खाने ही जा रहा था कि इसी बीच तुमने मुझे गिरिराज गोवर्धन जी के उस पत्थर से मारा. गिरिराज जी का कण-कण पवित्र है. उस पत्थर के लगते ही साक्षात् भगवान कृष्ण की कृपा मुझ पर हुई और मेरा तत्काल उद्धार हो गया. यह सब आपके प्रयासों से ही हुआ है.

उद्धारगति को प्राप्त वह सिद्ध जीव अपनी कथा सुना ही रहा था कि तभी एक रथ गोलोक से धरती पर उतरा.

ब्राह्मण विजय और सिद्ध दोनों ने उस रथ को नमस्कार किया. सिद्ध को उस रथ में बिठा लिया गया और रथ श्रीकृष्ण के धाम की ओर चल पड़ा.

इतनी कथा सुनाकर नारदजी बोले- हे बहुलाश्व, वह सिद्ध तो श्रीकृष्ण धाम को चला गया. ब्राह्मण भी गिरिराज की महिमा जान गया था. उसने गिरिराज की परिक्रमा की फिर सभी गिरिराज देवताओं के दर्शन किये और घर को लौटा.

हे राजन! जिस गिरिराज जी के स्पर्श से ऐसे पातकी का उद्धार हो जाता हो उस महान गोवर्धन के दर्शन-पूजन का अवसर मैं कैसे छोड़ सकता हूं. जो भी जीवनकाल में कम से कम एक बार गिरिराज की परिक्रमा कर लेते हैं वे श्रीकृष्ण के प्रिय हो जाते हैं.

गिरिराज गोवर्धन का छोटा अंश भी वैसा ही पूजनीय है जैसे मां गंगा के जल की हर बूंद.

आशा है आपको यह कथा पसंद आई होगी.

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