घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंगः भक्त घुश्मा के विकाररहित श्रद्धाभाव पर मुग्ध महादेव ने धरा ज्योतिर्लिंग स्वरूप

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श्री शिवमहापुराण में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार बतायी गई है– अद्भुत तथा नित्य परम शोभा सम्पन्न देवगिरि नामक पर्वत दक्षिण दिशा में अवस्थित है.
देवगिरी के समीप में भारद्वाज कुल में उत्पन्न सुधर्मा नामक एक ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण निवास करते थे. उनकी पत्नी सुदेहा भी उत्तम विचारों वाली स्त्री थी. ईश्वर के प्रति भक्तिभाव रखती हुई पति की सेवा करती थी.
स्वयं सुधर्मा शिवभक्त थे और शिवजी की आराधना में लगे रहते थे. सुधर्मा और सुदेहा को कोई सन्तान न थी इसलिए दोनों बहुत व्यथित रहते थे. सुधर्मा से ज्यादा दुखी सुदेहा रहती थी क्योंकि पड़ोसी महिलाएं उसे बांझ होने का ताना देती थीं.
पति-पत्नी ने संतान प्राप्ति के सारे उपाय किए लेकिन कोई लाभ न हुआ. दु:खी सुदेहा को और कोई राह नहीं सूझी तो उसने सुधर्मा से कहा कि वह उसकी छोटी बहन घुश्मा के साथ विवाह कर लें.
सुधर्मा ने पत्नी को बहुत समझाया कि मैं अनुभव से कहता हूं कि अभी अपनी बहन से प्यार करती हो, इसलिए विवाह करा रही हो, किन्तु जब इसे पुत्र उत्पन्न होने के बाद तुम्हें ईर्ष्या होगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सुदेहा ने पति के सामने संकल्प लिया कि वह कभी भी अपनी बहन से ईर्ष्या नहीं करेगी. हारकर सुधर्मा ने घुश्मा से विवाह कर लिया. विवाह के बाद घुश्मा अपनी बड़ी बहन की सेवा करती थी. सुदेहा भी उससे खूब प्यार करती थी.
अपनी बहन की शिवभक्ति से प्रभावित होकर घुश्मा भी शिव आराधना करने लगी. वह प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग (मिट्टी के शिवलिंग) बनाकर पूजा करती थी.
पूजा के बाद उन शिवलिंगों को समीप के तालाब में विसर्जित कर देती थी. भगवान शिव की कृपा से घुश्मा को एक सुन्दर पुत्र हुआ. घर में बालक आने से प्रसन्नता का माहौल हुआ.
सुदेहा भी पुत्र के आने से प्रसन्न थी लेकिन जल्द ही उसे यह लगने लगा कि परिवार में अब घुश्मा का मान बढ़ गया है. पति उससे और उसके पुत्र से ज्यादा स्नेह रखते हैं. सुदेहा को ईर्ष्या हुई.
समय के साथ घुश्मा का पुत्र बड़ा हो गया तो विवाह कर दिया गया. पुत्रवधू भी घर में आ गई. यह सब देखकर सुदेहा की ईर्ष्या पहले से भी ज्यादा बढ़ गई और उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई.
उसने घुश्मा का अनिष्ट करने की ठान ली. एक दिन रात्रि में उसने सोते समय घुश्मा के पुत्र के शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर शव को उसी सरोवर में डाल दिया, जहां घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन करती थी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सुदेहा शव को तालाब में फेंककर आ गई और आराम से घर में सो गई. प्रतिदिन की भांति घुश्मा अपने पूजा कृत्य में लग गई और सुधर्मा भी अपने नित्यकर्म में लग गए.
सुदेहा भी जब सुबह उठी तो उसके हृदय में जलने वाली ईर्ष्या की आग अब बुझ चुकी थी इसलिए वह भी आनन्दपूर्वक घर के काम-काज में जुट गई. जब बहू की नींद खुली तो उसे खून दिखाई पड़ा.
यह दृश्य देखकर बहू विलाप करने लगी. अपनी वधू को रोता देखकर भी घुश्मा विचलित नहीं हुई. वह पार्थिव शिवपूजन व्रत में लगी रही. उसने पुत्र की रक्षा का दायित्व महादेव को सौंप दिया.
उसने बहू को कहा कि चिंता मत करो तुम्हारे पति की रक्षा कालों के भी काल महाकाल के हवाले मैंने कर रखा है. वे ही सर्वेश्वर प्रभु हमारे संरक्षक हैं. वह पंचाक्षर मंत्र ऊं नम: शिवाय का उच्चारण करती पार्थिव लिंगों को लेकर सरोवर के तट पर गई.
जब पार्थिव लिंगों को तालाब में डालकर वह वापस लौटने लगी तो उसका अपना पुत्र उस सरोवर के किनारे खड़ा हुआ दिखाई पड़ा. वह माता के साथ घर की ओर चल पड़ा.
तभी भगवान भोलेनाथ वहां प्रकट हुए और घुश्मा से बोले- मैं तुमपर प्रसन्न हूं. इसलिए तुम वर मांगो. तुम्हारी सौत ने तुम्हारे पुत्र को मार डाला था. अत: मैं भी उसे त्रिशूल से मारकर उसे दंड दूंगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.घुश्मा ने भक्तिभाव से भगवान भोलेनाथ की स्तुति की और कहा- प्रभु सुदेहा मेरी बड़ी बहन है. आप उसे क्षमा कर दें. महादेव ने कहा- सुदेहा ने तुम्हारा बड़ा अनिष्ट किया है फिर तुम उसका उपकार क्यों करना चाहती हो?
घुश्मा हाथ जोडकर प्रार्थना करने लगी– देव! आपके दर्शन मात्र से सारे पातक भस्म हो जाते हैं. हे भोलेनाथ! जो कुकर्म करने वाला है वह अपने कर्म में लगा रहे मैं क्यों अनिष्ट का विचार करूँ? मुझे तो अपकार करने वाले का भी उपकार करना अच्छा लगता है.
सदाशिव घुश्मा के भक्तिपूर्ण और विकाररहित स्वभाव से अत्यन्त प्रसन्न हो उठे. महेश्वर ने कहा– ‘घुश्मा! मैं तुम्हें कोई वर अवश्य दूंगा. तुम जो चाहे वर मांगो.
घुश्मा ने कहा– महादेव! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो लोगों की रक्षा और कल्याण के लिए आप यहीं सदा निवास करें और आपकी ख्याति मेरे ही नाम से संसार में होवे.
घुश्मा से प्रसन्न होकर महादेव ने कहा- मैं मानवकल्याण के लिए हमेशा यहां निवास करूंगा. मेरा ज्योतिर्लिंग घुश्मा के ईश्वर घुश्मेश्वर के नाम से संसार में प्रसिद्ध होगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जिस सरोवर में तुमने शिवलिंगों को विसर्जित किया है वह संसार में शिवालय के नाम से प्रसिद्ध होगा. इस सरोवर के दर्शन से भी सब प्रकार के अभीष्ट प्राप्त होंगे.
सुधर्मा, घुश्मा तथा सुदेहा ने भी उस शिवलिंग की तत्काल एक सौ एक परिक्रमा दाहिनी ओर से की. पूजा करने के बाद परिवार के सदस्यों के मन की मलिनता दूर हो गई.
पुत्र को जीवित देखकर सुदेहा बड़ी लज्जित हुई और उसने अपने पति तथा बहन घुश्मा से क्षमा याचनाकर प्रायश्चित किया. महाराष्ट्र में औरंगाबाद के समीप स्थित घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन-पूजन से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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